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हिंदी सिनेमा में विदेशी कलाकार

जैकी चैन ‘रश आवर’ से चर्चित हुए और कई फिल्मों में मार्शल आर्ट्स का हुनर दिखाने के बाद खुद भी फिल्में बनाने लगे। अपनी फिल्म ‘द मिथ’ में उन्होंने न सिर्फ मल्लिका सहरावत को लिया, बल्कि कुछ दृश्य भारत में फिल्माए भी।

हिंदी फिल्मों में भी काम करने से नहीं हिचकते विदेशी कलाकार।

देशी हीरोइनों के लिए हिंदी फिल्मों के दरवाजे खुलने की सिर्फ यही मिसाल नहीं है। पिछले दो दशक में हिंदी फिल्मों में दर्जन से ज्यादा विदेशी हीरोइनें दिखाई दी हैं। भारतीय कलाकारों को सही भूमिका देने में विदेशी फिल्मकारों ने भले ही उदासीनता बरती हो, भारत में विदेशी कलाकारों और खास कर हीरोइनों का इस्तेमाल करने का उत्साह कभी नहीं थमा। इसका इतिहास काफी पुराना और दिलचस्प है। हालांकि बीते सालों में इस तरह की कोशिश छिटपुट ही हुई। 1954 में किशोर साहू ने ‘मयूर पंख’ बनाई। इसमें विवाहित राजकुमार एक विदेशी लड़की से प्यार करने लगता है। ओडेट फर्ग्युसन वह विदेशी लड़की थीं। राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में रूस की बैले नर्तकी रॉबिन किना नजर आर्इं, तो देव आनंद ‘स्वामी दादा’ के लिए अमेरिका की क्रिस्टीन ओ नील को ले आए।

पिछले कुछ समय से हिंदी फिल्मों में विदेशी हीरोइनों को प्रमुख भूमिकाओं में लेने का रिवाज कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। कुछ तो कथित रूप से कहानी की मांग के हिसाब से किया गया, तो कुछ फिल्म में अतिरिक्त आकर्षण जोड़ने की नीयत से। ‘लगान’ में आमिर खान की टीम को क्रिकेट सिखाने वाली रैशेल शैली स्वीडिश थीं। ‘रंग दे बसंती’ में आर्इं एलिस पैटन ब्रिटिश राजनीतिज्ञ और हांगकांग के अंतिम गवर्नर क्रिस पैटन की बेटी थीं। अमेरिकी अभिनेत्री एली लॉटर ‘मैरी गोल्ड’ में सलमान खान की नायिका बनीं। ऋतिक रोशन के साथ ‘काइट्स’ में मुख्य भूमिका करने वाली बारबरा मोरी मैक्सिको से आर्इं। तो सैफ अली खान की ‘लव आजकल’ में खालिस पंजाबी लड़की लगने वाली जिसेली मांटिरियो ब्राजील से। कनाडा मूल की लीसा रे को सबसे पहले महेश भट्ट ने ‘कसूर’ में लिया और फिर दीपा मेहता ने ‘वाटर’ में।

इन सभी हीरोइनों में यह समानता रही कि एक फिल्म के बाद वे फिर नजर नहीं आर्इं। टेक्सास (अमेरिका) में जन्मीं लिंडा आर्सेन्को भी लंबी पारी खेलने के मूड में हैं। देखना है कि ‘काबुल एक्सप्रेस’, ‘आलू चाट’ और ‘मुंबई सालसा’ के बाद उन्हें और फिल्में मिल पाती हैं या नहीं। यही सवाल एरिका और कैटरीना के सामने उनकी पहली फिल्म के बाद खड़ा हो गया है। तत्कालीन चेकोस्लोवाकिया की याना गुप्ता और इटली की रोजा कैटिलानो फिलहाल आइटम नंबर करने तक सीमित हैं। ‘बाबू जी जरा धीरे चलो’ गीत से विख्यात हुई याना इन दिनों योग गुरु की भूमिका में हैं। पिछले कुछ समय से फिल्मों के समूह नृत्यों में विदेशी बालाओं की मौजूदगी बढ़ती जा रही है। ये ज्यादातर विघटन की शिकार हुए पूर्वी यूरोप के देशों की है। गोरा रंग, नाचने की अनुभवी और जिस्म उघाड़ने में कोई संकोच नहीं। लिहाजा आईपीएल में चीयर्स लीडर्स के अलावा टीवी शो और फिल्म पुरस्कार समारोह आदि में उनकी मांग बढ़ती जा रही है। उन्हें अंधाधुंध पैसा भी दिया जा रहा है।

पिछले कुछ सालों से सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर सहयोग देने के लिए कई हस्तियां भारत आई हैं। हॉलीवुड की कुछ हस्तियों ने इन उद्देश्यों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए फाउंडेशन बना रखे हैं। भारत में उन्हें खासा समर्थन मिल जाता है। इस नाते भारत उनका प्रिय गंतव्य बन गया है। आॅस्कर विजेता मैट डेमन के फाउंडेशन ने स्वच्छ जल अभियान की शुरुआत हालांकि अफ्रीका से की, लेकिन 2009 में भारत की पहली यात्रा में उन्हें अपने अभियान की सफलता की ज्यादा गुंजाइश दिखी। लिहाजा अगस्त 2013 में वे फिर भारत आए। पुडुचेरी, चेन्नई और बंगलूर में लोगों से मिले। उनकी राय जानी। उनके अनुभव साझा किए और अब उनकी योजना एक बड़ा प्रोजेक्ट शुरू करने की है। उनका कहना है कि भारत आकर उन्हें काफी सुकून मिलता है।

जैकी चैन ‘रश आवर’ से चर्चित हुए और कई फिल्मों में मार्शल आर्ट्स का हुनर दिखाने के बाद खुद भी फिल्में बनाने लगे। अपनी फिल्म ‘द मिथ’ में उन्होंने न सिर्फ मल्लिका सहरावत को लिया, बल्कि कुछ दृश्य भारत में फिल्माए भी। जून 2013 में वे भारत आए। युवा लड़कों और लड़कियों को मार्शल आर्ट्स के गुर सिखाने के अलावा स्माइल फाउंडेशन के बच्चों को अपना सपना पूरा करने की दिशा दी। खुद अभावग्रस्त बचपन बिताने वाले जैकी चैन ने उस मौके पर एक प्रेरणादायक भाषण दिया, जिसमें उन्होंने अगली पीढ़ी को उनके बेहतर और सम्मानजनक भविष्य के लिए शिक्षित और प्रशिक्षित करने को सबकी जिम्मेदारी बताया। लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए सक्षम बनाने पर उन्होंने विशेष जोर दिया। रिचर्ड गेरे को भारत ने खींचा महात्मा बुद्ध के प्रति उनके आकर्षण ने। बौद्ध धर्म को जानने के बाद उसमें उनकी इतनी गहरी आस्था हो गई कि उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। इस सिलसिले में वे कई बार भारत आए और उन्होंने हर बार स्वीकार किया कि भारत आकर उन्हें सबसे ज्यादा आत्मिक शांति मिली। रिचर्ड गेरे अरसे से तिब्बत की आजादी की आवाज उठा रहे हैं। जनवरी 2015 में उन्होंने बौद्ध धर्म, दलाई लामा और तिब्बत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से करीब एक घंटे तक विचार विमर्श किया।

मिशेल येहों सड़क सुरक्षा अभियान की वैश्विक एंबेसडर के रूप में 2008 में भारत आर्इं और चार दिन सड़कों पर घूम कर उन्होंने सुझाया कि बढ़ते सड़क हादसों से बचने के उपाय कैसे किए जाएं। 2013 में हॉलीवुड की दो अभिनेत्रियों- शैरन स्टोन और हिलेरी स्वाक मुंबई आर्इं। मकसद लोगों को एड्स के लिए जागरूक करना और साधनविहीन मरीजों को इलाज के लिए मदद मुहैया कराना था। उन्होंने ही यह तथ्य सामने रखा कि एड्स के इलाज की ज्यादातर दवाइयां भारत में बनने के बावजूद पचास फीसद से ज्यादा मरीजों को अपने देश में बनी दवाएं ही उपलब्ध नहीं हो पातीं।

यह सही है कि किसी फाउंडेशन या अभियान के तहत ही आमतौर पर हॉलीवुड की ज्यादातर हिस्तयां पिछले कुछ सालों में भारत आई हैं। यह उनकी मानवीय और सामाजिक प्रतिबद्धता का हिस्सा रहा और इसके लिए किसी ने भी भारत आने में हिचक नहीं दिखाई। भारत प्रवास के बाद सभी ने इस देश और लोगों के बारे में फैलाई गई भ्रांतिपूर्ण धारणाओं को उन्होंने गलत पाया। भारत आकर उन्हें लगा कि वे अपने देश में अपने लोगों के बीच ही हैं। पॉप गायिका और अभिनेत्री मैंडी मूर, सात साल से लिंग आधारित हिंसा के खिलाफ अभियान चला रही धर्मार्थ संस्था ‘पापुलेशन सर्विस इंटरनेशनल’ से जुड़ी हुई हैं। सितंबर, 2015 में वे भारत आर्इं। न भाषण दिया और न ही किसी सेमिनार का हिस्सा बनीं। पटना और लखनऊ के आसपास के गांवों का उन्होंने दौरा किया। दिल्ली की स्लम बस्तियों में भी वे गर्इं।

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