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कहानी: आखिर क्षमादान

सुंदर के मन में आया कि इस अंगद को कम से कम एक झापड़ तो दे ही दूं, लेकिन उसने अपने को संयमित किया और मोटर साईकिल को किक मारते हुए कहा- ‘इट्स ओके।’

Author Published on: December 15, 2019 4:08 AM
आखिर क्षमादान

विनम्र सेन सिंह

आज फिर वही कर्ण कटु झनझनाती आवाजें किचेन में अस्त व्यस्त वर्तनों में घुल-मिल रही थीं- ‘जल्दी करो! देर हो रही है! …न जाने यह लड़का कब सुधरेगा।’
आखिर इस शोर-शराबे और नींद तोडू कोलाहल से वह कब तक भागता! रोज-रोज की ऐसी ही परिचित मुसीबत! सुंदर अपनी आंखें मींजता हुआ बेपरवाही से उठा। किचेन से बड़बड़ाते शब्दों के नुकीले तीर पीछा कर रहे थे- ‘बेपरवाही देखो, जैसे कहीं के राजकुमार हैं!’ सुंदर नींद की खुमारी में लड़खड़ा रहा था। मगर शब्द लगातार उसे लगातार धक्का मारते-धकेलते जा रहे- ‘जल्दी कर, मुझे भी स्कूल जाना है।’
ऐसे ही रोज होती सुंदर की सुबह। उठो लाल अब आंखें खोलो- उन किताबों वाली मां के जीवन में बड़ा इत्मीनान था। तब माएं नौकरी थोड़े करती थीं! सुंदर की माताजी पूर्णिमा को भी ऐसी ही हड़बड़ सुबह के साथ अपने यातना शिविर का सफर पूरा करना होता।
‘जल्दी करो बेटा!’
‘हां, आया। बस तुरंत अभी।’ सुंदर झुंझलाते हुए पैरों को घसीटता बाथरूम की ओर बढ़ गया। आवाजें यहां भी पीछा कर रही थीं- ‘नाश्ता मेज पर लगा दिया है। खा जरूर लेना। गणित की कॉपी रखना न भूलना, वरना फिर से…।’
बाथरूम से गिरता नल का पानी भुनभुना रहा था- ‘हां ठीक है। रख लूंगा।’ मां के वाक्य का आखिरी टुकड़ा- ‘वरना फिर से’ सुंदर के दिमाग में अटक गया। उसकी एक बड़ी मुसीबत रोज शाम को पढ़ाने चले आते द्रोणाचार्य भी हैं। उन्हें अंगूठा भर नहीं, पूरी की पूरी गर्दन चाहिए। गणित की कॉपी खोल कर सुंदर के गृहविज्ञान का होमवर्क शुरू हो जाता- ‘सुंदर मास्टर साहब को पानी तो पिला दिया करो।’ ‘सुंदर, चाय ले आओ बेटे।’ सुंदर कुढ़ता रहता।
सुंदर की असल समस्या मास्टर जी कम, घर वाले ज्यादा थे। कोई उसकी बात पर यकीन ही नहीं करता कि पढ़ाना इन मास्टर जी के वश का नहीं। वह उनके बारे में कुछ कहना-बताना चाहता, तो सब एक सुर में चिल्ला पड़ते- ‘ये तुम्हें क्यों अच्छे लगेंगे। मारते हैं न। भला ऐसे आदर्श शिक्षक आजकल कहां मिलते हैं।’
सुंदर इसका आदी हो चुका था। नाश्ता निबटा कर बैग सहित उसने अपनी साइकिल उठाई और स्कूल के लिए चल पड़ा। इस बात से बिल्कुल बेखबर कि आज उसके लिए कुछ खास इंतजाम किया जा चुका है स्कूल में। थोड़ी देर के लिए ही सही, अगर उसकी जिंदगी से घर और स्कूल निकाल दिया जाय, तो बाकी बचता है शहर। शहर की खूबसूरत सड़कें। लेकिन यही तो मुश्किल है कि सड़क घर से शुरू होकर स्कूल तक ही जाती है।
फिलहाल इस समय सड़क, सिर्फ सड़क है, जिस पर उसकी साइकिल कुलांचे मार रही है। सुंदर का बचपन घर में मां या स्कूल में गुरु जी लोगों की साया में हर क्षण सजग और डर कर ही बीतता रहता, लेकिन सड़क के इस सुनसान सन्नाटे में जब वह साइकिल को लहराता, कलाबाजियां खिलाता, तरह-तरह से करतब करता, तो देखने वाले दंग रह जाते। घर और स्कूल से अलग साइकिल ही उसकी जान भी थी, और जहान भी। पर स्कूल की चारदीवारी दिखते ही रफ्तार धीमी पड़ जाती।
उसे स्कूल की दीवारें दुख और उदासी के कू्रर संकेतक-सी जान पड़तीं। चेहरे की हंसती हरियाली वीरान और बंजर मैदान में तब्दील होने लगती। बदकिस्मत ऊसर के ढूह-सा वह साइकिल को खड़ी करके क्लास रूम 8 बी में दाखिल होता।
गर्मियों के दिन। वातावरण में एक अदृश्य अनहोनी जैसे फुसफुसा रही हो। सुंदर आचार्य जी से भय मिश्रित अभिवादन के साथ अपनी निर्धारित पिछली सीट की ओर बढ़ गया। अभी क्लास शुरू ही हुई थी कि प्रिंसिपल साहब के खास चपरासी साधू काका का प्रवेश हुआ- ‘साहब सुंदर बाबू को प्रिंसिपल साहब बुला रहे हैं। तुरंत अभी।’
आशंका और अनुमान से भरे पूरे क्लास की निगाहें एकबारगी सुंदर को देखने लगीं। तीसेक कदम की दूरी पर प्रिंसिपल का आॅफिस फांसी घर की तरह लग रहा था। असमंजस और ऊहापोह में सुंदर के पैर लड़खड़ा रहे थे- सुबह-सुबह प्रिंसिपल ने तलब किया है, कहीं घर से कोई शिकायत तो नही आई है? क्लास टीचर की कोई शिकायत तो नहीं, लेकिन होमवर्क तो सब पूरा है। सुंदर खुद को सांत्वना देता- विद्यालय में अनुशासनाधिकारी हूं। हो सकता है वार्षिकोत्सव की ही कोई जिम्मेदारी हो।
इतने में प्रिंसीपल कक्ष की छोटी-सी खिड़की से चंदा की झलक दिखाई दी। चंदा! अरे वाह! तब तो निश्चित ही वार्षिकोत्सव की तैयारी का कोई मामला होगा! सुंदर मन ही मन प्रसन्न।
स्कूल के उस छोटे से आकाश की वह वास्तव में चंदा ही थी। बला की खूबसूरत। कंठ में अमृत! हंसे तो फूलों की झड़ी। नाक-नक्श! अप्सराएं ऐसी ही होती होंगी। सुंदर ही नहीं, पूरा विद्यालय उसकी एक झलक पर डूबता-उतराता। वह सभी के आकर्षण का केंद्र थी।
गंगाधर पांडेय नाम था प्रधानाचार्य जी का। छोटा कद, मोटी काया और ऊंची तोंद। मूछें फिल्म वाले नत्थूलाल की तरह। स्वभाव में भी मूंछों की वही ऐंठ। किसी को सेटते नहीं। जाड़ा, गर्मी, बरसात बस एक ही तरह का लिबास। नील से सराबोर धोती, खद्दर का कुर्ता और कभी-कभार सदरी। बांस की लचकती लहकती छड़ी सदैव उनके हाथों की शोभा बढ़ाती। जिसे भी पड़ जाए, कई दिन तक सीधे बैठने लायक न रहता। उनकी छड़ी का आतंक छठवीं से इंटर तक के लड़कों में चहुंदिस व्याप्त था। खैर!
सुंदर ने दबे कदमों कक्ष में प्रवेश किया। अंदर जाते ही उसके चेहरे की हवाइयां उड़ गर्इं। वह स्तब्ध था। उसने देखा, चंदा की आंखों से गंगा-यमुना की अबाध धारा बह रही है। वह खूबसूरत चेहरा, जो अपनी हंसी और किलक के लिए प्रख्यात है आज किसी श्माशन के उजाड़-सा लग रहा है। वह कुछ समझ पता उससे पहले ही प्रधानाचार्य और चंदा दोनों की निगाहों ने मिसाइल की तरह उसे निशाने पर ले लिया।
अभी तक वह वार्षिकोत्सव के खयालों में ही उलझा था, लेकिन यहां तो मौसम का मिजाज ही बदला-बदला लग रहा। सुंदर भौंचक और भकुवाया कुछ भी समझ नहीं पाया। मगर उसे इतना तो अंदाजा हो गया था कि आज वह किसी बड़ी मुसीबत में है।
गंगाधर पांडेय ने बेहद कड़ी आवाज में संबोधित किया- ‘सुंदर! तुमसे यह उम्मीद न थी… इतने शिष्ट और विख्यात परिवार के होकर भी इस प्रकार की हरकत!…यह अक्षम्य है। तुम्हे तनिक भी अपने परिवार की मर्यादा का खयाल नहीं!…’
जिसके बारे में कुछ पता तक नहीं, उसी अनकिए अपराधबोध में सिर से पांव तक डूब कर बदरंग हो चुका सुंदर का सिर जमीन में धंसा जा रहा था। अब तो उसे खुद भी लगने लगा कि किसी सपने में उसने ऐसा कर तो नहीं दिया है। वह मन ही मन खुद को कोस रहा था। न गलती होती, न आज चंदा के सामने बेइज्जत होना पड़ता।
घर की बात अलग है। स्कूल में सुंदर थोड़ा शिष्ट ही रहता। उसने सिर झुकाए हुए ही कहा- ‘क्षमा चाहता हूं आचार्य जी, अगर मुझसे कोई भूल हुई तो।… मुझे क्षमा करें, आइंदा ऐसा मौका नहीं दूंगा।’
गंगाधर जी गुर्राए- ‘मुझसे नहीं, क्षमा इससे मांगो।’ उनका इशारा चंदा की तरफ था।
सुंदर को कुछ भी समझ नहीं आया।
प्रधानाचार्य जी गुस्से में हांफ रहे थे- ‘आपको शर्म आनी चाहिए। किसी को रात-दिन फोन करना आपको शोभा देता है?’
सुंदर के तो मानों पैरों के नीचे जमीन ही खिसक गई हो!
फिर क्या था, प्रधानाचार्य जी के इतना कहते ही चंदा भी सुंदर पर टूट पड़ी- ‘इसने मेरा जीना हराम कर दिया है। सुबह-शाम हर वक्त इसके फोन की घंटी बजती ही रहती है।’ चंदा इस समय बेहद आवेग में थी- ‘और तो और आचार्य जी, यह कहता है कि तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो। मैं तुम्हारे लिए बहुत अच्छा लड़का हूं।’
‘क्यों? अब मुंह से आवाज नहीं निकल रही?’ प्रधानाचार्य वकील की तरह जिरह कर रहे थे- ‘इतनी छोटी उम्र में इस तरह की हरकत!’
अब सुंदर के सब्र का बांध टूट चुका था। अपनी धीर-गंभीर मुद्रा छोड़ कर वह जोर से फफक पड़ा। आंखें खूनी लाल। विवशता, बेचारगी और क्रोध के कारण। फफकते हुए उसने रुंधे स्वर में प्रधानाचार्य जी से कहा- ‘आचार्य जी मेरा विश्वास मानिए, मैंने किसी को कोई फोन नहीं किया।’
‘नीच! तुमने मेरा जीना हराम कर रखा है, और कहते हो कि नंबर नहीं जानते।’ फिलहाल सुंदर के लिए यह तय कर पाना मुश्किल था कि यह लड़की खूबसूरत ज्यादा है याकि मक्कार और धूर्त। ‘मैं तो तुम्हारा नंबर भी नहीं जानता।’ सुंदर ने घृणा पूर्वक प्रतिवाद किया।
इतना सुनते ही आचार्य गंगाधर और चंदा दोनों फिर से चढ़ बैठे बेचारे सुंदर पर। फिर तो सुंदर की बोलती बंद थी।
वह मजबूर था अपमान सहने को। बार-बार यही सोचता कि अगर घर का डर न होता और बस थोड़ा ताकतवर होता, तो इन आचार्य जी और उनकी चेलिन की आज बल भर हुंकाई करता, स्कूल के इसी मैदान में दौड़ा-दौड़ा कर, ठीक वैसे ही जैसे आचार्य गंगाधर रोज-रोज विद्यार्थियों की किया करते हैं।
उधर आरोपों का सिलसिला जारी था। आचार्य ने अंतिम ब्रह्मास्त्र फेंका- ‘चलो तुम्हारे घर संदेश भेजता हूं।’
अब सुंदर बस एक ही चिंता में डूब गया कि घर पता चला तो क्या होगा? बाबा और मां को तो समझा लूंगा, पर पिता जी? उसके पिता जी एक इंटरमीडिएट कॉलेज में इतिहास के प्रवक्ता हैं। बिना गलती भी झापड़ों की बरसात करते चलते हैं। और यह तो आज साक्षात कुल की प्रतिष्ठा का सवाल है। भला इसमें कैसे कोई कोर-कसर छोड़ देंगे?
एक तरफ प्रधानाचार्य और सारा विद्यालय, तो दूसरी तरफ घरवालों का भय। अब वह चौतरफा परेशानियों में घिर चुका था। इन सारी परेशानियों का कोई कारण भी नहीं। सब कुछ अकारण। न किए अपराध की ऐसी दर्दनाक और जानलेवा पेशी!
आखिर चंदा और आचार्य गंगाधर का आरोप समाप्त हुआ। लंबी लताड़ना के बाद सुंदर को यह कहते हुए विदा किया गया कि- ‘यह तुम्हारी पहली गलती है, इसलिए मांफ करता हूं। जाओ और अब कायदे से रहना।’
सुंदर कमीज की आस्तीन से अपने आंसू पोंछता हुआ प्रधानाचार्य कक्ष से बहार निकला और सिर झुकाए अपनी कक्षा की ओर बढ़ चला।
लंच का समय था। पूरा विद्यालय प्रधानाचार्य कार्यालय के सामने वाले मैदान में जमा होकर यह नजारा देर से देख रहा था। सभी की निगाहें सुंदर की तरफ थीं। सब उस पर मुस्करा रहे थे। उपेक्षा और हिकारत की कुटिल मुस्कान!
वह क्लास में जाकर चुपचाप अपने स्थान पर बैठ गया। उस दिन वह पूरे लंच टाइम बस्ते पर सिर रख कर देर तक रोता रहा। उसे शांत करने या समझने-समझाने वाला, जिसे वह मित्र कह सके, ऐसा कोई नहीं। वे भी नहीं, जिनके साथ वह रोज अपना टिफिन साझा करता। सब दूर-दूर मुस्करा रहे लड़कों के झुंड का हिस्सा हो चुके थे। आज पीछे वाली बेंच पर अपनी बेचारगी के साथ वह सबसे अलग और अकेला पड़ा रहा।
आज विद्यालय को एक नया रसिया मिला। सबने मिल कर सुंदर को आवारा घोषित कर दिया। गनीमत कि गंगाधर की कृपा से बात घर तक न पहुंच पाई। इतनी-सी बात का गंगाधर जी बाद में बहुत दिनों तक एहसान भी जताते रहे।
इस घटना ने सुंदर को भीतर से तोड़ डाला। उसका आत्मविश्वास जाता रहा। अब वह हर रोज आठवीं की फाइनल परीक्षा का इंतजार करने लगा। पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता। बचे रह गए छह महीने उसे उपहास का पात्र बन कर किसी जोकर की भूमिका में बिताना पड़ा। मित्रों के कटाक्ष और तानों से वह त्रस्त हो चुका था। वह बताता कि उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया। सब झूठ। पर लोग भी भला सुंदर जैसे ‘सॉफ्ट टारगेट’ को क्यों खो दें?
उसने अब जवाब देना भी बंद कर दिया और मुस्कुराकर बात को टाल जाता।
परीक्षा का अंतिम दिन था। परीक्षा खत्म हुई। सुंदर निकला। घृणा से स्कूल की तरफ देखा और निकलते-निकलते गेट पर खखार कर थूक दिया। साधू वहीं बगल में खड़ा था- ‘देख के बाबू’, साधू ने कहा।
‘छह महीने से देख ही रहा था।’ सुंदर ने बेफिक्री से कहा और आगे बढ़ गया। जैसे कह रहा हो कि तुम्हें फिर कभी नहीं देखूंगा।
आज उसकी साइकिल, जो कभी तूफान की रफ्तार से शहर की सड़कों को रौंदा करती थी, आज उसकी चाल में मैदानी नदी की मस्ती लहरा रही थी। नदी की यह धार सुंदर को कहां ले जा रही है, यह तो वह नहीं जानता था, पर इतना जरूर चाहता था कि वह इतनी दूर जाए, जहां इस कलंक के धब्बे उसे कभी न दिखें। अकारण किए गए उस सामाजिक बहिष्कार की कोई चर्चा तक न रह जाए।
यही सब सोचते सुंदर घर पहुंच गया। आज उसका मूड उखड़ा हुआ था। बाबा को परीक्षा के बारे में बताया और सीधे अपने कमरे में चला गया। एकांत में सुंदर घंटों देर तक रोता रहा।
फिर कई वर्षों बाद एक दिन।
शहर में सुंदर अपनी बाइक को पूरी रफ्तार से भगाता हुआ गुजर रहा था। तभी किसी ने उसे पुकारा। आवाज कुछ-कुछ परिचित-सी लगी। सुंदर ने बाइक की रफ्तार कम की और मुड़ कर देखा, अंगद था। अंगद! जो सुंदर के साथ उसी विद्यालय में उसी की कक्षा में पढ़ता था। सुंदर के साथ ही बेंच पर बैठा करता था। सुंदर अनमने से रुका और सोचते हुए कि जब भी मेरी जिंदगी की गाड़ी रफ्तार पकड़ती है, तो उस विद्यालय की कोई न कोई पापछाया रफ्तार को जैसे रोक दिया करती है।
दोनों कई वर्षों बाद मिल रहे थे। लिहाजा अंगद बातों में मशगूल था, पुराने दिन, पुरानी ढेरों बातें। पर सुंदर बार-बार घड़ी को निहारता रहा। अंगद समझ गया कि सुंदर का मन नहीं लग रहा। ‘तो ठीक है सुंदर, फिर कभी इत्मीनान से मिलते हैं।’ अंगद ने कहा।
‘हां ठीक! अभी मुझे भी कुछ जरूरी काम से जाना है। निकलता हूं।’ सुंदर ने कहा।
दोनों एक-दूसरे से हाथ मिला कर जाने लगे, तभी अंगद ने कहा- ‘सुंदर…!’
सुंदर ठिठका और पीछे मुड़ा।
‘मुझे एक बहुत जरूरी बात कहनी है तुमसे…’
‘कह दो।’ सुंदर अन्यमनस्कता से बोला।
‘स्कूल के दिनों में वो चंदा थी न…’
सुंदर का पारा चढ़ गया। उसे लगा कि अंगद आज इतने दिन बाद भी उसका मजाक बना रहा है। अभी इसकी खोपड़ी में चंदा ही अटकी है। ‘जल्दी बोलो, मेरे पास टाइम नहीं है।’ सुंदर का मन हो रहा था कि इसे दो झापड़ लगा दे।
‘यार! चंदा को मैं ही फोन किया करता था।’ अंगद के स्वर में थोड़ी झिझक, थोड़ा प्रायश्चित भी था। ‘आई एम वेरी सॉरी सुंदर…’
सुंदर के पैरों से जमीन खिसक गई। एक बारगी उसे विश्वास ही नहीं हुआ। जिसके कारण स्कूल के दिनों में उसे इतनी जलालत झेलनी पड़ी थी, मित्र सब छूट गए थे। अध्यापकों की निगाह में गिरना पड़ा। रोज-रोज अपने भीतर न जाने कितनी बार, कितनी मौतें मरनी पड़ी थीं, उन सबका अपराधी आज सामने है, अपने कबूलनामे के साथ।
जी तो यही किया कि सुंदर अभी उसे खून से लथपथ कर दे। जमीन में दफना दे। पर कहा, ‘लेकिन यार, मुझे क्यों बता रहे हो। उसके बाप गंगाधर पांडे से बताओ न जाकर।’ सुंदर के मन में आया कि इस अंगद को कम से कम एक झापड़ तो दे ही दूं, लेकिन उसने अपने को संयमित किया और मोटर साईकिल को किक मारते हुए कहा- ‘इट्स ओके।’

 

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