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योग दर्शन: ईश्वर की स्तुति आवश्यक

जीवन में स्वाभाविक रूप से अनेक उतार-चढ़ाव आते हैं, जिससे कि मनुष्य कभी-कभी घबरा जाता है और असंतुलित होकर कर्म करता है, जिसका परिणाम दुख होता है। इसलिए बुद्धि पूर्वक कर्म करके, पुरुषार्थ के बाद ईश्वर से प्रार्थना करें।

Author Published on: October 6, 2019 5:39 AM
ईश्वर से प्रार्थना हम मनुष्यों को करनी चाहिए।

डॉ. वरुण वीर

ईश्वर दयानिधे, आपने ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड का निर्माण किया है। आपके सामर्थ्य से ही यह दिन, रात, पृथ्वी, चंद्र, सूर्य तथा नक्षत्रों का घूमना हो रहा है। जो भी कुछ दिखाई दे रहा है या जो भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। इस जगत में सब कुछ आपके सामर्थ्य के कारण ही गतिमान हो रहा है। हे सर्वशक्तिमान प्रभु, आपकी दया तथा कृपा दृष्टि जिस पर हो जाती है वह धन्य हो जाता है। हम सभी मनुष्य तथा जीव-जंतु आपके पुत्र-पुत्री के समान हैं। आप तो सभी को समान रूप से सुख दिए जाते हैं। आप न्यायकारी हैं। हे ईश्वर, अपनी दया-दृष्टि हम पर सदैव बनाए रखें यही आपसे प्रार्थना है। इस प्रकार की प्रार्थना प्रतिदिन हम सभी को ईश्वर से करनी चाहिए। हमें यह ध्यान देकर अनुभव करना चाहिए कि अगर कोई किसी को कुछ भी देता है, तो उसके पीछे उसका कुछ न कुछ स्वार्थ होता है। अगर आपसी संबंधों को भी देखें तो कहीं न कहीं स्वार्थ होता है। कर्मचारी वेतन पाता है, तो मालिक उससे काम लेता है। यहां दोनों का स्वार्थ है। माता-पिता बच्चों को पालते हैं, तो कहीं न कहीं भविष्य में बेटा उनकी सेवा करेगा, यह विचार रहता है।

पति-पत्नी, मित्र तथा नौकर, मालिक सभी में कुछ न कुछ स्वार्थ और लेन-देन है। सभी को सभी से कुछ न कुछ चाहिए, लेकिन परमात्मा ही एक ऐसा है, जिसने अनगिनत सुख हमें दिए हैं और बदले में हमसे अपने लिए कुछ नहीं चाहता है। बिना स्वार्थ के वह हम पर निरंतर सुख की वर्षा करता रहता है। अगर ध्यान से देखा जाए तो हम उसे कुछ दे भी नहीं सकते, क्योंकि दिया उसे जाता है जिसके पास किसी वस्तु की कमी हो। वह तो पूर्ण है। सच्चिदानंद है। वह सत् भी है, चित भी और आनंद भी। स्वामी दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में कहते हैं- ‘यो मिमीते मानयति सर्वान्जीवान् स माता।’ जैसे पूर्ण कृपा युक्त जननी अपनी संतानों का सुख और उन्नति चाहती है वैसे परमेश्वर भी सब जीवों की बढ़ती चाहता है। इससे परमेश्वर को ‘माता’ कहा गया है।

‘य: पितामहानां पिता स प्रपितामह:’- जो पिताओं के पितरों का पिता है। इससे परमेश्वर का नाम पिता कहा है।
‘य आचारं ग्राह्यति सर्वा विधा बोधयति स आचार्य ईश्वर:।’

जो सत्य आचरण का ग्रहण कराए और सब विद्याओं की प्राप्ति का कारण है। इससे परमेश्वर का नाम आचार्य है। जो सब प्रकृति के अवयव आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी भूत परमाणुओं को यथायोग्य मिला कर शरीर के साथ जीवों का संबंध करके जन्म देता और स्वयं कभी जन्म नहीं लेता है, इससे ईश्वर का नाम ‘अज’ है।

अगर विवेक पूर्वक विचार किया जाए तो पृथ्वी पर आज जितने भी मत-मतांतर हैं, वे कुछ शुद्धता और कुछ अशुद्धता लिए हुए हैं। सत्य कहने का साहस होना बड़ी बात है और मनुष्य को सत्य कहने का साहस रखना ही चाहिए। इन सभी मत-मतांतरों ने अपनी सुविधा, समय तथा स्वार्थ के कारण ईश्वर को भिन्न-भिन्न रूपों में ढाल लिया है। हालांकि हिंदू, मुसलमान ईसाई आदि सभी का ईश्वर एक ही है। यदि ईश्वर भी अलग-अलग होंगे तो वह भी इन सबकी तरह आपस में लड़ते रहेंगे। इस समस्या का मूल और मुख्य कारण है ईश्वर को ठीक प्रकार से न समझ पाना। ईश्वर के कर्म, स्वभाव, गुण तथा उसके स्वरूप को न जानने के कारण आज ईश्वर के नाम पर पूरी दुनिया में हिंसा, घृणा तथा द्वेष का माहौल बना हुआ है। सभी अपने धर्म तथा विचारों को श्रेष्ठ बता कर दूसरों को गिराना या समाप्त करना चाहते हैं, जो मानवता के लिए अत्यंत हानिकारक है।

धर्म वह है जहां धैर्य, क्षमा, इंद्रिय निग्रह, सत्य, अक्रोध, चोरी न करना, निराभिमान तथा अहिंसा है। इसके विपरीत यदि कोई भी आचरण या कर्म करें तो वह धर्म नहीं हो सकता। धर्म के नाम पर पशु बलि, कुर्बानी, हिंसा तथा प्रकृति का हनन करना मनुष्यता नहीं है। ईश्वर को हमसे कुछ नहीं चाहिए। वह तो यही चाहता है कि मनुष्य अपना जीवन सुख शांति तथा आनंद से व्यतीत करे। परम आनंद परमात्मा के निकट रहने में ही है। उसकी स्तुति प्रार्थना तथा उपासना में ही है। इसलिए ईश्वर की स्तुति भी बहुत आवश्यक है। जब हम किसी की प्रशंसा करते हैं, किसी को अपने से अधिक योग्य, दयालु, शक्तिशाली तथा पूज्य मानते हैं तब हम अहंकार शून्य हो जाते हैं, स्वभाव में विनम्रता तथा सात्विकता आती है, जो कि बुद्धि को संतुलित रख कर कर्म करने की प्रेरणा देती है। विवेक पूर्वक किया गया कर्म तथा अहंकार रहित प्रार्थना ईश्वर के निकट पहुंचाती है।

ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।
यद् भद्रं तन्न आ सुव॥

हे प्रभु सब सुखों के दाता, शरीर को स्वास्थ्य, प्राण को शुद्ध, मन को संतुलित तथा मन को प्रसन्नता देने वाले प्रभु। जीवन में सभी भौतिक सुख, सुविधा, समृद्धि, लोक में नाम और परिवार का सुख देने वाले ज्ञान के प्रकाशक, सत्य असत्य, धर्म, अधर्म, जन्म, मृत्यु तथा प्रकृति का मूल सत रज तम का ज्ञान देने वाले परमात्मा। जिसने यह संपूर्ण जगत बनाया है। सभी दुर्गुणों, दुर्व्यसन को दूर करने वाला है। जो भी हमारे लिए कल्याणकारी, गुण कर्म स्वभाव और पदार्थ हैं, उनको हमें दीजिए। जैसे पुत्र पिता से मांगता है, गुरु शिष्य से पूछता है, उसी प्रकार हमें भी ईश्वर से मांगना चाहिए। शुद्ध सात्विक भावना से मांगा गया ईश्वर अवश्य प्रदान करता है। ईश्वर द्वारा दी गई बुद्धि हम मनुष्यों पर बहुत बड़ा उपकार है। जो भी ईश्वर ने हमें दिया है उसके बदले में हमसे कुछ भी नहीं लिया, उसकी इतनी बड़ी दया के लिए सदैव उसकी उपासना तथा प्रार्थना कर धन्यवाद देना चाहिए। जिसका आश्रय ही मोक्ष सुखदायक है और जिसको न मानना, भक्ति न करना कृतघ्नता है। उस श्रेष्ठ दिव्य सामर्थ्य प्रकाश स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति के लिए योगाभ्यास तथा विशेष भक्ति करनी चाहिए।
‘अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम।।’

हे ज्ञान प्रकाश स्वरूप, सच्चे मार्ग को दिखाने वाले, दिव्य सामर्थ्य युक्त हमें ज्ञान विज्ञान ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति कराने के लिए धर्मयुक्त कल्याणकारी मार्ग पर चलाएं। आप समस्त ज्ञान और कर्मों को जानते हैं। हमसे कुटिलता युक्त पाप रूपी कर्म को दूर कीजिए। हम आपकी विविध प्रकार की और अधिक से अधिक स्तुति, प्रार्थना, उपासना, सत्कार नम्रता पूर्वक करते हैं। हमारा जीवन पाप से दूर हो और जो भी भाव हमें पाप करने की प्रेरणा दे उसे हमसे दूर कीजिए। ईश्वर से प्रार्थना करते समय अत्यंत विनम्र भाव से बुद्धि की प्रार्थना करें। ऐसे दुर्व्यसन दुर्गुणों को अपने पास न आने दें, जिससे कि हमारे कर्मों पर उसका प्रभाव पड़े। जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए नियम की जरूरत है।

जीवन में स्वाभाविक रूप से अनेक उतार-चढ़ाव आते हैं, जिससे कि मनुष्य कभी-कभी घबरा जाता है और असंतुलित होकर कर्म करता है, जिसका परिणाम दुख होता है। इसलिए बुद्धि पूर्वक कर्म करके, पुरुषार्थ के बाद ईश्वर से प्रार्थना करें। उसके बाद जो कुछ भी मिले उसमें संतोष कर अपरिग्रह की भावना से जीवन व्यतीत करें, अन्यथा जीवन में अशांति और दुख ही बना रहेगा। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि भावनात्मक स्तर पर मन शांत और सुखी बना रहे, जीवन में कष्ट भले ही कितने आएं संघर्ष का साहस कम न हो और बुद्धि में संतुलन बना रहे, यही ईश्वर से प्रार्थना हम मनुष्यों को करनी चाहिए।

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