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शख्सियत: चितरंजन दास

चितरंजनदास के व्यत्तित्व के कई पहलू थे। वे उच्च कोटि के राजनीतिज्ञ तथा नेता तो थे ही, वे बंगला भाषा के अच्छे कवि तथा पत्रकार भी थे। इनके समय के बंग साहित्य के आंदोलनों में इनका प्रमुख हाथ रहा।

Author Published on: November 3, 2019 5:59 AM
चितरंजन दास

सी आर दास यानी चितरंजन दास एक भारतीय राजनीतिज्ञ, वकील, कवि और पत्रकार थे। उन्होंने बंगाल में स्वराज पार्टी की स्थापना की। वे लोगों के बीच ‘देशबंधु’ या ‘राष्ट्र मित्र’ के रूप में लोकप्रिय थे। उनका जन्म कोलकाता में एक उच्च मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता भुबनमोहन दास कलकत्ता उच्च न्यायालय के जाने-माने वकीलों में से एक थे।

वकालता से मिली प्रसिद्धि
वकालत दास ने 1890 में कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की। उसी साल वे आइसीएस में उत्तीर्ण होने के लिए इंग्लैंड गए, लेकिन वे फेल हो गए और उन्होंने कानूनी पेशे का चुनाव किया। दास ने लंदन में ‘द आॅनरेबल सोसाइटी आॅफ द इनर टेम्पल’ में कानून की पढ़ाई की। दो साल बाद वे भारत आ गए और कोलकाता उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। यहां उन भारतीयों का मुकदमा लड़ने लगे जिन पर राजनीतिक अपराधों का आरोप था। इसे उन्हें पहचान मिलने लगी। 1908 में चितरंजन दास को व्यापक प्रसिद्धि मिली, यह प्रसिद्धि उन्हें अलीपुर बम कांड में अरबिंदो घोष का बचाव करने में सफलता मिलने की वजह से पाई।

राजनीतिक करिअर
दास का राजनीतिक करिअर केवल छह साल का था, लेकिन उस संक्षिप्त अवधि में भी वे अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे। 1917 में वे राजनीति में आए। उन्होंने कलकत्ता कांग्रेस के अध्यक्ष का पद श्रीमती एनी बेसंट को दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह ‘स्वदेशी’ में विश्वास रखते थे इसलिए उन्होंने पश्चिमी देशों की प्रचारित विकास की धारणा को खारिज कर दिया था। 1920 में, दास ने अपने सभी सुखसाधनों का त्याग किया और ‘खादी’ का समर्थन किया। उसी साल उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले असहयोग आंदोलन में भाग लिया। कांग्रेस के कहने पर उन्होंने वकालत छोड़ दी और अपनी सारी सपत्ति मेडिकल कॉलेज और महिला अस्पतालों को दान कर दिया। इनके इस महान त्याग को देखकर जनता इन्हें ‘देशबंधु’ कहने लगी। असहयोग आंदोलन में जिन विद्यार्थियों ने स्कूल कॉलेज छोड़ दिए थे उनके लिए इन्होंने ढाका में ‘राष्ट्रीय विद्यालय’ की स्थापना की।

स्वराज पार्टी की स्थापना
1921 में आंदोलन में भाग लेने के लिए दास को उनकी पत्नी और बेटे के साथ छह महीने के लिए जेल में डाल दिया गया था। उसी साल उन्हें अहमदाबाद कांग्रेस के लिए चुना गया था। दिसंबर 1922, दास को कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में चुना गया था, लेकिन बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। मोतीलाल नेहरू के साथ, दास ने कांग्रेस के भीतर स्वराज पार्टी की स्थापना की।

कवि और पत्रकार
चितरंजनदास के व्यत्तित्व के कई पहलू थे। वे उच्च कोटि के राजनीतिज्ञ तथा नेता तो थे ही, वे बंगला भाषा के अच्छे कवि तथा पत्रकार भी थे। इनके समय के बंग साहित्य के आंदोलनों में इनका प्रमुख हाथ रहा। ‘सागरसंगीत’, ‘अंतयार्मी’, ‘किशोर किशोरी’ इनके काव्यग्रंथ हैं। ‘सांगरसंगीत’ का इन्होंने तथा श्री अरविंद घोष ने मिलकर अंग्रेजी में ‘सांग्ज आव दि सी’ नाम से अनुवाद किया और उसे प्रकाशित किया। ‘नारायण’ नामक वैष्णव-साहित्य-प्रधान मासिक पत्रिका इन्होंने काफी समय तक चलाई। 1906 में प्रारम्भ हुए ‘वंदे मातरम ्’ नामक अंग्रेजी पत्र के संस्थापक मंडल तथा संपादकमंडल दोनों के ये प्रमुख सदस्य थे । इतना ही नहीं इन्होंने बंगाल स्वराज्य दल के मुखपत्र ‘फार्वर्ड’ की पूरी जिम्मेदारी उठाई।

निधन : दास ने ‘इंडिया फार इन्डियन’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना भी की थी।
चितरंजन दास का राजनैतिक जीवन चरम था लेकिन काम के बोझ को उनका शरीर झेल न सका और उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। 1925 में वो स्वास्थ्य लाभ लेने के लिए दार्जिलिंग चले गए, लेकिन उनका स्वास्थ्य बिगड़ता ही चला गया और उनका निधन हो गया।

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