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आभासी दबंगई

एक भारतीय फाउंडेशन ने अपने अध्ययन में यह बताया कि कमजोर शैक्षणिक व्यवस्था और शिक्षा के निचले स्तर के कारण भारतीय बच्चे पश्चिमी समाज के बच्चे की तुलना में कम्प्यूटर आधारित खेलों में बहुत कमजोर हैं।

Author Published on: November 10, 2019 5:25 AM
बच्चों के अनुभव व्यापक बनाए जाएं।

एक अध्ययन बताता है कि आठ साल से लेकर अठारह साल तक के बच्चे तकरीबन सात घंटे से अधिक डिजिटल मीडिया की दुनिया में रहते हैं। जिसमें से डेढ़ घंटे से अधिक वक्त कम्प्यूटर गेम में बिताते हैं। किशोरों में डिजिटल खेल के असर भी गंभीर रूप से पड़ रहे हैं। उनकी संज्ञाणात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। वे वास्तविक पारिवारिक-सामाजिक संबंधों से काफी कट जाते हैं और आभासी दुनिया में ही अपने संबंध बनाते रहते हैं। वास्तविक दुनिया में उनके पास उनका अकेलापन घेरता है।

हिंसात्मक वीडियो गेम उन्हें अपना शिकार बनाता है। ऑनलाइन गेम ‘ब्लू व्हेल’ ने बच्चों को आत्महंता बनने पर विवश किया। खेल के कुचक्र में एक बार शामिल हो जाने के बाद बच्चों को कई बार डिजिटल चुनौतियों, धमकियां आदि का भी सामना करना पड़ता है। उन्हें उसके इशारे पर चलना होता है। वे ब्लैकमेल के भी शिकार होते हैं। साइबर ‘बुलिंग’ आभासी दुनिया का ‘अंधेरा’ है। तकनीक का दुरुपयोग भी कह सकते हैं। जिसमें तकनीक बच्चे या किशोरों को उत्पीड़ित करते हैं, लज्जित एवं जलील करते हैं, धमकी देते हैं। अपने से कमजोर को चिढ़ाना, धमकाना, डराना वास्तविक दुनिया में भी होते हैं, कार्टून की दुनिया में भी हैं।

मगर आॅनलाइन दुनिया में होने वाली ‘बुलिंग’ कई बार त्रासदी की तरह होती हैं। यह एक किस्म से आपराधिक गतिविधि है। यह कई बार चैट की दुनिया में मजाक की तरह होता है जो व्यक्तिगत रूप से शुरू होकर सभी परिचित मित्रों और समूह में भेज कर खिल्ली उड़ाने, मजाक बनाने और लोगों की निगाहों में गिराने, अपमानित करने, हर्ट करने, मानसिक शोषण करने की हद तक जाता है। साइबर ‘बुलिंग’ चौबीस घंटे में कभी भी किसी भी स्थिति में किया जा सकता है। लोगों के बीच में उसकी विश्वसनीयता और भरोसे को खंडित किया जा सकता है। भावनात्मक रूप से उसे तोड़ा जा सकता है। उसे गुनाहगार की तरह पेश किया जाता है। जाहिर है, इसके दुष्परिणाम बहुत गहरे होते हैं। वह गुनहगार की तरह जीने लगता है।

बहुत वक्त मोबाइल, कम्प्यूटर, आईपैड या टीवी के साथ गुजारने के कारण उनकी दिनचर्या प्रभावित होती है। तकनीक से अलग होने के बाद भी वे मनोवैज्ञानिक रूप से उस अवस्था में होते हैं। नींद पूरी न होने के कारण वे चिड़चिड़े होने लगते हैं। डिप्रेशन के गहरे शिकार होते हैं। परंपरागत खेल में बच्चे या खिलाड़ी अपने वरिष्ठ साथियों और सहयोगियों से सीखते हैं। खुद अपने अनुभवों से भी जानते हैं। जबकि यांत्रिक खेल व्यक्तिवाद को बढ़ावा देते हैं।

विज्ञापन का तिलिस्म

विज्ञापनों में चाकलेट, टॉफी, बैग, टिफिन बॉक्स, पेंसिल या जूते आदि के जो विज्ञापन आते हैं, अक्सर बच्चे उसी की मांग करते या शॉपिंग मॉल या स्टोर से उन्हीं चीजों को खरीदते हैं। जिन कार्टून को ज्यादा पसंद करते हैं उसके चित्र या चरित्र जिन उत्पादों पर छपे या अंकित होते हैं, उन्हीं को पसंद करते हैं। विज्ञापन बच्चों की उपभोग की क्षमता को सक्रिय करते हैं। उनके अंदर उन वस्तुओं, उत्पादों या सेवाओं को खरीदने की ललक पैदा करते हैं। ये माध्यम बच्चों के अंदर दोहरे उपभोक्तावाद को पैदा करते हैं। किशोर उम्र की लड़कियां अपने सौंदर्य को उसी स्टाइल में ढालती हैं जैसा टीवी में दिखने वाली स्त्रियां होती हैं। वे बाजार के लिए एक ‘शक्तिशाली उपभोक्ता’ की तरह उभरती हैं।

शिक्षा-शिक्षक-बच्चे और परिवार

डिजिटल गेम्स के एक दूसरे पहलू भी हैं। वीडियोगेम एक शक्तिशाली शैक्षणिक उपकरण है। आजकल ऐसे वीडियोगेम बन रहे हैं जो मुश्किल सवालों को आसानी से हल करने के तरीके सिखा रहे हैं। शिक्षा से जुड़े एप्प और गेम बच्चों को औपचारिक और अनौपचारिक तरीके से पढ़ने में मदद कर रहे हैं। ये वीडियो कई मायनों में क्लासरूम टीचिंग से बेहतर भी साबित हो रहा है। खासकर विज्ञान की पढ़ाई के मामले में। शब्द, दृश्य, ध्वनि आदि के संयोजन कक्षा को आकर्षक, आसान, एटेंटिव बना रहे हैं। आजकल स्कूलों से दिया जाने वाला होमवर्क, बच्चों की गतिविधियां, सूचनाएं एक साथ ही बच्चे, शिक्षक और माता-पिता के साथ शेयर किया जा रहा है। इस प्रविधि ने अध्ययन को नए पंख दिए हैं। जरूरत इस बात की है कि शिक्षा से जुड़े इन वीडियो में सामाजिक-सांस्कृतिक-भौगोलिक परिवेश को भी जोड़ा जाए ताकि बच्चों के अनुभव व्यापक बनाए जाएं।

एक भारतीय फाउंडेशन ने अपने अध्ययन में यह बताया कि कमजोर शैक्षणिक व्यवस्था और शिक्षा के निचले स्तर के कारण भारतीय बच्चे पश्चिमी समाज के बच्चे की तुलना में कम्प्यूटर आधारित खेलों में बहुत कमजोर हैं। ग्रामीण और शहरी झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले बच्चे बहुत पीछे हैं। उनकी शैक्षणिक स्तर को ऊपर उठाने के लिए कारगर तरीका यह है वे डिजिटल गेम्स में दक्षता हासिल करें। डिजिटल खेल की खासियत यह होती है कि आप उसके ‘आंतरिक खिलाड़ी’ बन जाते हैं। आपका प्रदर्शन और सफलता वर्चुअल वातावरण तैयार करता है, जिसमें आप चुनौतियों का सामना करते हैं और दक्ष होते हैं। यह तर्क कमजोर वर्ग के हितों का पोषण करने वाला है। इसके खतरे सिर्फ ये हैं कि केवल कारपोरेट घरानों, पूंजी, तथा तकनीक के बाजारवादी रूप न बनें। डिजिटल गेम्स का बाजार मुनाफाखोरी के लिए न हो। यह सर्वविदित है कि ग्रामीण क्षेत्र का बाजार बहुत बड़ा है, जहां बाजार की शक्तियां सेंध लगाए बैठी हैं।

 

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