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शख्सियत: चक्रवर्ती राजगोपालाचारी

1937 में राजाजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने कौंसिल का चुनाव जीता। इन्हें कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी के रूप में भी चुना गया। अंतिम गवर्नर माउंटबेटन के बाद राजगोपालाचारी भारत के पहले गवर्नर बने थे।

1937 में राजाजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने कौंसिल का चुनाव जीता।

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को सब राजाजी कहते थे। वे स्वतंत्रता सेनानी, वकील, लेखक, राजनीतिज्ञ और दार्शनिक थे। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भारत के द्वितीय गर्वनर और पहले भारतीय गर्वनर जनरल थे।

जीवन और शिक्षा
इनका जन्म मद्रास के थोरापल्ली गांव में वैष्णव ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम नलिन चक्रवर्ती था। पांच साल के होने पर इनका परिवार होसूर चला आया। इनकी प्राथमिक शिक्षा होसुर के सरकारी स्कूल से हुई। 1894 में बेंगलुरु के सेंट्रल कॉलेज से स्नातक किया। फिर 1897 में मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज से कानून की पढ़ाई। 1897 में इनका विवाह अलामेलू मंगलम्मा से हुआ। वकालत से इन्होंने खूब नाम कमाया। फिर राजनीति में आए और इसके बाद स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए।

राजनीतिक जीवन
अठाईस साल की उम्र में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े। गांधी के छुआछूत आंदोलन और हिंदू-मुस्लिम एकता के कार्यक्रमों ने इन्हें बहुत प्रभावित किया। इसलिए स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय होने पर राजाजी गांधी जी के अनुयायी बन गए।1930 में जब गांधी जी ने दांडी मार्च किया तो इन्होंने नागपट्टनम के पास वेदरनयम में नमक कानून भी तोड़ा। इसके लिए इन्हें जेल भी हुई। मंदिरों में जहां दलित समुदाय का जाना मना था, इसका इन्होंने जमकर विरोध किया। इन्हीं के फलस्वरूप मंदिरों में दलितों का प्रवेश संभव हो सका।

1937 में राजाजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने कौंसिल का चुनाव जीता। इन्हें कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी के रूप में भी चुना गया। अंतिम गवर्नर माउंटबेटन के बाद राजगोपालाचारी भारत के पहले गवर्नर बने थे। 1950 में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार में इन्हें गृहमंत्री भी बनाया गया। 1952 में राजाजी को मद्रास प्रांत का मुख्यमंत्री बनाया गया। वे 1952-1954 तक मुख्यमंत्री रहे। राजाजी दक्षिण भारत के कांग्रेस के प्रमुख नेता थे। किंतु पंडित नेहरू से कई मसलों पर असहमति होने के कारण वे कांग्रेस पार्टी से अलग हो गए। कांग्रेस से अलग होकर 1959 में ‘स्वतंत्र पार्टी’ का गठन किया।

हिंदी प्रेम
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान रहा। देश के गैर-हिंदीभाषी राज्यों में से एक तत्कालीन मद्रास प्रांत में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य कराने का श्रेय उन्हें जाता है। राजाजी का मानना था कि हिंदी ही एकमात्र भाषा है, जो देश को एक सूत्र में बांध सकती है।

राजनीतिज्ञ के साथ लेखक भी
राजगोपालाचारी तमिल के साथ-साथ अंग्रेजी के भी बेहतरीन लेखक थे। जेल में रहने के दौरान इन्होंने 1922 में ‘मेडिटेशन इन जेल’ के नाम से एक किताब भी लिखी। वे सलेम लिटरेरी सोसायटी के संस्थापक थे। इन्होंने कई कहानियां भी लिखी। इतना ही नहीं कुछ दिनों तक महात्मा गांधी के अखबार ‘यंग इंडिया’ का संपादन भी किया। 1951 में, राजाजी ने अंग्रेजी में महाभारत का एक संक्षिप्त वर्णन लिखा, इसके बाद 1957 में रामायण का। 1961 में, इन्होंने कांबर के तमिल रामायण का अंग्रेजी में अनुवाद किया था। 1958 में, इन्हें ‘रामायण- चक्रवर्ती थिरुमगम्’ के तमिल भाषा में काम करने के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

भारत रत्न
स्वतंत्रता संग्राम से लेकर बाद तक देश की सेवा करने के लिए चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को 1954 में भारत के सर्वश्रेष्ठ नागरिक पुरस्कार ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया।

निधन : बीमारी के चलते बानवे वर्ष की उम्र में निधन हो गया।

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