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कहानी: आशीर्वाद तो दीजिए

जब हम किसी के अच्छे काम से प्रसन्न हो कर उसे आशीर्वाद देते हैं तो वह तुरंत पाने वाले को मिल जाता है, कह कर रामदास ने हौले से अमर के कपोल थपथपा दिए, फिर बाहर चले आए।

Author Published on: November 17, 2019 4:11 AM
रामदास ने हंस कर कहा, आखिर अमर की मेहनत रंग ले आई।

देवेन्द्र कुमार

मदास थक गए थे। सोसाइटी की लिफ्ट ऊपर कहीं अटकी हुई थी, इसलिए सीढ़ियों की पैडी पर बैठ गए। तभी कानों में आवाज आई ‘लीजिए पानी पीजिए’ रामदास चौंक गए, देखा सामने एक बच्चा पानी का गिलास लिए खड़ा है। सचमुच प्यास से गला सूख रहा था। उन्होंने पानी पी लिया फिर पूछा ‘तुम्हें कैसे पता कि मुझे प्यास लगी है!’ ‘मुझे बाबा ने बताया’, वह बोला और पार्क की ओर इशारा किया। रामदास ने उधर देखा तो एक व्यक्ति पार्क की रेलिंग के पास खड़ा नजर आया। नजरें मिलते ही उसने हाथ हिला दिया। रामदास ने सोचा इस बच्चे के बाबा से जरूर मिलना चाहिए। उस तरफ बढ़ते हुए उन्होंने बच्चे से पूछा ‘तुम्हारा नाम क्या है।’ ‘मेरा नाम अमर है, मैंने आपकी प्यास बुझाई लेकिन आपने आशीर्वाद तो दिया ही नहीं।’ उसने कहा तो रामदास ने उसका सिर सहला कर कहा ‘ जिस पल तुमने मुझे पानी का गिलास थमाया था तब से तुम्हें आशीर्वाद ही तो दे रहा हूं’ और ठठा कर हंस पड़े। बोले, ‘अच्छा काम करने वाले को आशीर्वाद अपने आप मिल जाता है, मांगना नहीं पड़ता।’

वह पार्क में जाकर अमर के बाबा अविनाश से मिले। रामदास कुछ पूछते इससे पहले ही अविनाश ने कह दिया, आप को आश्चर्य हो रहा होगा अमर के व्यवहार पर लेकिन… ‘लेकिन क्या!’ रामदास ने जानना चाहा। अविनाश ने बताया अमर की मां आरती बहुत दिनों से बीमार चल रही है। इधर कई हफ्ते से अस्पताल में भर्ती है। मां के अस्पताल जाने के बाद से अमर बहुत उदास रहने लगा था। बार-बार मां से मिलने की जिद करता था, लेकिन बच्चों का अस्पताल जाना मना है। सुबह नींद खुलते ही इसका सबसे पहला सवाल यही होता था कि मां अस्पताल से कब वापस आएगी। बस यही रट लगाए रखता था, न ठीक से खाता, न दोस्तों के साथ खेलता! ‘लेकिन इसका इस तरह अनजान व्यक्ति को पानी पिलाना और फिर…’ ‘और फिर आशीर्वाद मांगना, इसी बारे में पूछना चाहते हैं न आप। रामदास ने हां में सिर हिला दिया। अमर की उदासी से पूरा घर परेशान था। हमलोग सोच रहे थे कि इसकी उदासी कैसे दूर की जाए। आखिर मुझे एक उपाय सूझ ही गया। ‘कैसा उपाय।’ अविनाश ने अमर को अपनी गोद में भर लिया फिर कहा, जाओ खेलो। अविनाश उसके सामने रामदास से कुछ नहीं कहना चाहते थे। अमर झट पार्क में खेलते बच्चों की ओर दौड गया। हां तो आपको कौन सा उपाय सूझा, रामदास ने पूछा। अविनाश बताने लगे, एक सुबह जब अमर ने अपनी मां के बारे में पूछा तो मैंने कहा,‘अमर, तुम्हारी मम्मी की तबियत पहले से ठीक है,लेकिन अगर तुम चाहते हो कि वह और भी जल्दी स्वस्थ होकर तुम्हारे पास आ जाए तो तुम्हें भी कुछ करना होगा।’

‘क्या?’ अमर ने पूछा था। तब मैंने उसे समझाया कि उसे अपनी मां के लिए आशीर्वाद इकट्ठे करने चाहिएं। इलाज और लोगों के आशीर्वाद उसकी मां को और जल्दी स्वस्थ कर देंगे। फिर मैंने बताया कि आजकल गर्मी का मौसम है। अगर वह प्यासे लोगों को पानी पिलाएगा तो वे उसे आशीर्वाद देंगे। बस तभी से मैं उसे लेकर शाम को पार्क में आ जाता हूं। साथ में एक बड़े थर्मस में ठंडा पानी रखता हूं। वह घूम-घूम कर लोगों को ठंडा पानी पिलाता है। पानी पीकर लोग उसे आशीर्वाद देते हैं। घर लौट कर मैं पूछता हूं ‘आज कितने आशीर्वाद मिले?’ तो वह कहता है कि उसने चार लोगों को ठंडा पानी पिलाया। तो मैं कहता हूं ‘वाह,तुमने चार आशीर्वाद इकट्ठे कर लिए अपनी मां के लिए। देखना वह और भी जल्दी ठीक हो जाएगी।’ सुन कर वह खुश हो जाता है। बस इस तरह अमर की उदासी दूर हो गई। अब वह मां की बीमारी के बारे में नहीं पूछता, आशीर्वाद इकट्ठे करने की धुन में रहता है। वाह! अमर की उदासी दूर करने की क्या खूब तरकीब निकली आपने। कह कर रामदास हंस पड़े। अविनाश भी मुस्करा दिए।

रामदास सारी बात समझ गए। उन्होंने मन ही मन उसके शीघ्र स्वस्थ होने का आशीर्वाद दिया। फिर अविनाश से बोलें ‘मैं भी अमर की मां को देखना चाहता हूं। आपके साथ चल सकता हूं क्या।’ आप क्यों तकलीफ करेंगे। आरती मेरा मतलब अमर की मां पहले से काफी ठीक है। मुझे उम्मीद कि उसे कुछ ही दिन में अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी। फिर मिलने की बात कह कर रामदास लौट आए।

अगली शाम रामदास पार्क जा पहुंचे पर अविनाश और अमर नहीं दिखाई दिए। उन्होंने सोसाइटी के गार्ड से उनके फ्लैट का पता लिया और जाकर दरवाजे की घंटी बजा दी। रामदास को देख कर अविनाश अचरज में पड़ गए। रामदास ने कहा ‘अमर और आपको पार्क में नहीं देखा तो पता करने चला आया। मैं आज आपके साथ अस्पताल चलना चाहता था।’ ‘आज मैं अस्पताल नहीं जाऊंगा। अमर की तबियत ठीक नहीं है। इसके पापा और दादी गए हैं।’ कहते हुए अविनाश उन्हें कमरे में ले गए। अमर पलंग पर लेटा था। उसकी आंखें बंद थी। रामदास पलंग के पास खड़े हुए कुछ देर उसकी ओर देखते रहे। फिर अविनाश के साथ बाहर आ गए।

उनसे कहा आजकल मौसम बहुत गरम है, बीमार मां के लिए आशीर्वाद जुटाने के उत्साह में इसने बहुत भागदौड कर डाली है, इसीलिए ज्वर आ गया है। अब इस सब की जरूरत नहीं है। मैं भी यही सोच रहा हूं। ऐसे भी अब आरती की तबियत में काफी सुधार हो गया है। हो सकता है कि उसे जल्दी छुट्टी मिल जाए। तभी अमर की आवाज आई ‘बाबा।’ अविनाश के साथ रामदास भी कमरे में चले गए। रामदास ने बढ़ कर अमर के सिर पर हाथ रख दिया, तुम्हारा एक आशीर्वाद मेरे पास रह गया था, वही देने आया हूं।’ तो क्या उस दिन आप आशीर्वाद देना भूल गए थे,अमर ने पूछा। भूला नहीं था। तुम्हारी मम्मी के लिए आशीर्वाद तो उस दिन दे दिया था, तुम्हारे लिए आज देने आया हूं, रामदास ने हंस कर कहा। पर आशीर्वाद मुझे दिखाई तो नहीं देता? क्या तुम हवा को देख सकते हैं? ‘नहीं’ ‘और फूलों की सुगंध’ वह भी नहीं दिखाई देती। उसी तरह आशीर्वाद होता है। वह हमारे मन में रहता है।

जब हम किसी के अच्छे काम से प्रसन्न हो कर उसे आशीर्वाद देते हैं तो वह तुरंत पाने वाले को मिल जाता है, कह कर रामदास ने हौले से अमर के कपोल थपथपा दिए, फिर बाहर चले आए। अविनाश और रामदास हर शाम पार्क में मिलते रहे। और फिर एक शाम अविनाश ने रामदास को बताया कि आरती को अस्पताल से छुट्टी मिल गई है। रामदास ने हंस कर कहा, आखिर अमर की मेहनत रंग ले आई। दोनों हंस पड़े। अमर ने उन दोनों के बीच दोस्ती का पुल बना दिया था।

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