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अनुवाद का बढ़ता बाजार

अनुवाद की व्यापकता बताती है कि अनुवाद कर्म अब सिर्फ व्यक्तिगत रुचि का विषय नहीं रह गया है, सामाजिक-राजनीतिक, आर्थिक और व्यावसायिक आवश्यकताओं पर आधारित अनिवार्य गतिविधि हो गई है। इस स्थिति में अनुवाद, व्यक्ति परिधि से निकलकर सामाजिक आवश्यकता की जरूरत बन गई है।

Author Published on: November 10, 2019 4:51 AM
अनुवाद एक नए कलेवर के साथ विकसित हो रहा है।

हरीश कुमार सेठी

आज के दौर में बाजारवादी व्यवस्था ने विभिन्न देशों के बीच उत्पादों को खरीदने-बेचने या फिर सेवाएं देने-लेने की सुविधा पहले की तुलना में ज्यादा बढ़ा और सरल भी कर दी है। इस व्यवस्था को विस्तार देने में कंप्यूटर-इंटरनेट जैसी सूचना प्रौद्योगिकी अपनी केंद्रीय भूमिका निभा रही है। पर यह तब तक संभव नहीं, जब तक कि वह भाषा के साथ सार्थक रूप से न जुड़े। भाषा और बाजार एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। भाषा का बाजार के साथ नया और अनिवार्य संबंध अनुवाद के माध्यम से ही संभव हो पा रहा है। उत्पाद की जानकारी देनी हो, उसका प्रचार-प्रसार करना या फिर किसी भी प्रकार की आउटसोर्स सहायता-सेवाओं का लेन-देन ही क्यों न हो, यह सब भाषा के बिना संभव नहीं। यह स्थानीयता की सीमाएं लांघ कर प्रदेश ही नहीं, विदेशों तक भी चला जाता है। बाजार को सही दिशा में विस्तार तब मिल पाता है जब वह भाषा की बाधा को पार पाने के लिए अनुवाद को माध्यम बनाता है। एक से अधिक भाषा-क्षेत्रों में कारोबार के सार्थक तरीके से फैलाव में अनुवाद की अनिवार्य रूप से जरूरत होती है। इसके लिए, उत्पादक सबसे ज्यादा विज्ञापनों और अन्य प्रचार सामग्री का सहारा लेकर उपभोक्ता तक पहुंचता है, जिसमें वह अनुवाद को शस्त्र बनाता है।

एक से अधिक भाषाभाषी क्षेत्रों के बाजार तक पहुंच बनाने के कारण अनुवाद सिर्फ आधुनिक समय की जरूरत नहीं है। अनुवाद का आरंभ तभी हो गया होगा जब दो अलग-अलग भाषा-भाषियों में किसी प्रकार का संपर्क और संवाद स्थापित हुआ होगा। यह संवाद मौखिक या लिखित, किसी भी स्तर पर संभव है। इसीलिए अनुवाद का मौखिक और लिखित रूपों में अस्तित्व प्राचीनकाल से ही माना जा सकता है। आधुनिक समय में इसका विस्तार बहुत मुखर रूप में सामने आ रहा है।

वैश्विक बाजारवादी व्यवस्था ने इंटरप्रेटरों की सेवाओं में बहुत बड़े पैमाने पर इजाफा किया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपसी संबंधों को बनाने-मजबूत करने में अनुवाद एक अनिवार्य आवश्यकता है। इसके अलावा, इंटरप्रिटेशन के रूप में मौखिक अनुवाद संबंधी यह कार्य राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, संगोष्ठियों, संयुक्त राष्ट्र की सभाओं, भारतीय संसद आदि में भी किया जाता है। आधुनिक विकास के चलते कॉल सेंटरों जैसी अवधारणाओं का मूर्त हो पाना और कारगर तरीके से काम कर पाना मौखिक अनुवाद पर भी निर्भर करता है।

भारत जैसे बहुभाषिक समाज में तो यह अनिवार्य आवश्यकता है। हमारे जीवन-व्यवहार के प्रत्येक नए-पुराने क्षेत्र में अनुवाद का महत्त्व है। यही महत्त्व इसे विभिन्न क्षेत्रों तक व्यापक विस्तार देता है। आज वाणिज्य-व्यापार, शासन-प्रशासन, न्यायपालिका, ज्ञान-विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, पर्यटन, जनसंचार माध्यम, विज्ञापन, बैंक, बीमा आदि मानव जीवन के विभिन्न कार्य-क्षेत्रों में इसकी पैठ बढ़ती जा रही है। भारत में राजभाषा संबंधी द्विभाषिक व्यवस्था के कारण प्रशासन के विभिन्न क्षेत्रों और उसकी कार्य-प्रणाली में अनुवाद की अनिवार्य उपस्थिति बनी हुई है।

अनुवाद के कारण विभिन्न भाषाएं एक-दूसरे के निकट आती हैं। सृजनात्मक साहित्य का अनुवाद, स्वयं में एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इससे राष्ट्रीय साहित्य की अवधारणा मूर्त हो पाती है। अनुवाद द्वारा तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन में भी बड़ी मदद मिलती है। धर्म के प्रचार-प्रसार में तो अनुवाद का महत्त्व निर्विवाद है, जो धार्मिक साहित्य के अनुवाद से संभव हो पाता है। वस्तुस्थिति यह है कि आज अनुवाद भी बाजारोन्मुखी होता जा रहा है। बाजार को ध्यान में रखते हुए अनुवाद कार्य एक राजनीति के तहत भी हो रहे हैं ताकि उपयोग के साथ-साथ चिंतन जगत में भी अपने यहां के विमर्शों का विस्तार हो। इतिहास साक्षी है कि साम्यवाद-मार्क्सवाद के विस्तार में अनुवाद की अपनी भूमिका रही है।

अनुवाद की दृष्टि से जनसंचार माध्यम एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। नव-इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों ने कंप्यूटर अनुवाद जैसे ‘अनुवाद के नवीनतम क्षेत्र’ को हमारे सामने उभारा है। जन-सामान्य तक गूगल आदि द्वारा इसे व्यवहार में ला रहा है। इसके अलावा, जनसंचार माध्यमों में उल्लेखनीय स्थान रखने वाला ‘विज्ञापन’ का क्षेत्र तो अनुवाद से ही आॅक्सीजन लेता है। एक से अधिक भाषाओं में विज्ञापन तैयार करते समय अक्सर अनुवाद का ही सहारा लिया जाता है।

मीडिया और खासकर फिल्म जगत और टेलीविजन धारावाहिकों आदि में अनुवाद एक नए कलेवर के साथ विकसित हो रहा है। यह कलेवर डबिंग, सबटाइटलिंग, वॉयस ओवर आदि के रूप में नजर आता है। इन्हें व्यवहार में लाकर किसी की भी अपनी भाषा में जो कुछ परोसा जा रहा है, उसके मूल में भाषा की सीमा तोड़ते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने की कोशिश काम करती है। इन आयामों ने अनुवाद को एक नई दिशा दी है। इसकी महत्ता का अंदाजा लगाते हुए पाश्चात्य चिंतक निकोलस बूरियो ने तो यहां तक घोषणा कर दी है कि आने वाला युग डबिंग-सबटाइटलिंग का है, अनुवाद के इस प्रकार के अन्य रूपों को विशेष महत्त्व प्राप्त होगा।

अनुवाद के संदर्भ में सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार ने ‘भाषा प्रौद्योगिकी’ जैसी अवधारणा को भी विकसित किया है। इसने विश्व पटल पर अंग्रेजी रूपी भाषायी साम्राज्यवाद के फैलाव को सार्थक चुनौती दी है। भाषा प्रौद्योगिकी, आज की भाषा और तकनीकी संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद करने वाला महत्त्वपूर्ण विषय क्षेत्र बन रहा है, जो मूलत: प्रौद्योगिकी में भाषिक नियम-व्यवस्था के प्रयोग से संबंधित है। यह ‘प्रौद्योगिकी को माध्यम भाषा के रूप में अपनी भाषा से जोड़ने’ और ‘प्रौद्योगिकी का अपनी भाषा के संदर्भ में उपयोग करने’ जैसे दो आयामों को व्यक्त करता है।

अनुवाद का बढ़ता व्यवहार-क्षेत्र और नए-नए आयाम, भाषा के विकास में भी सहायक हो रहे हैं। यह विकास नए शब्दों-अभिव्यक्तियों का लक्ष्य भाषा की प्रकृति के अनुसार होने, उनके माध्यम से भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता बढ़ने पर आधारित होना चाहिए। अगर नए शब्द या अभिव्यक्तियां लक्ष्य भाषा की प्रकृति के अनुरूप नहीं हैं और वे उसके सहज विकास में बाधक हैं, तो ऐसे में भाषा का विकृत विकास होगा। अगर अनुवाद के माध्यम से लक्ष्य भाषा कृत्रिम भाषा का रूप ले लेती है, तो वह भाषिक विकास का नकारात्मक पक्ष माना जाता है। इसलिए गुणवत्ता के स्तर पर समझौता नहीं होना चाहिए।

वास्तव में आज की बाजारवादी व्यवस्था में अनुवाद की अनिवार्य स्थिति बन गई है और व्यवसाय की ‘रीढ़’ बनते जा रहे अनुवाद का महत्त्व दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। पर, हमें इतने से संतोष करके नहीं बैठ जाना चाहिए। वास्तविकता यह है कि आज के बाजारवादी दौर में अनुवाद को अभी और अधिक विस्तार देने की जरूरत है। भारत के संदर्भ में इसे हिंदी भाषा तक सीमित रखना ही काफी नहीं है। भारत की विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं तक इसकी पहुंच को बढ़ाने से बाजार के आकार और आयाम में वृद्धि होगी। जैसे, उत्पादों के विज्ञापन, उसकी पैकिंग सामग्री आदि तक में दिए गए निर्देशों में भाषायी परिवर्तन नजर आए। हालांकि इस दिशा में कुछ कोशिशें भी हुई हैं। जैसे, पैंफलेट और पोस्टर आदि बाजार की प्रचार सामग्री को प्रादेशिक भाषा के साथ-साथ द्विभाषिक बना कर तैयार किया जाता है।

भाषायी परिवर्तन लाने के लिए बेहतर प्रयास तो यह कहा जा सकता है कि देश-भर के लिए हिंदी में तथा जिस राज्य में उत्पाद भेजा जा रहा हो, उसकी प्रादेशिक भाषा को माध्यम बनाया जाए ताकि उपभोक्ताओं से सार्थक संवाद स्थापित किया जा सके। इससे उपभोक्तावादी बाजार का विस्तार होगा और उसे मजबूती प्राप्त होगी। ई-मार्केटिंग के क्षेत्र में भी अब भाषा के प्रति और अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है, ताकि अनुवाद के माध्यम से गतिशील संवाद स्थापित करने की स्थिति बन सके।

अनुवाद की व्यापकता बताती है कि अनुवाद कर्म अब सिर्फ व्यक्तिगत रुचि का विषय नहीं रह गया है, सामाजिक-राजनीतिक, आर्थिक और व्यावसायिक आवश्यकताओं पर आधारित अनिवार्य गतिविधि हो गई है। इस स्थिति में अनुवाद, व्यक्ति परिधि से निकलकर सामाजिक आवश्यकता की जरूरत बन गई है। इस पर अपरिहार्य निर्भरता के कारण समाज में अनुवाद कर्म को अब संगठित रूप में किया जाने लगा है, उसका स्वरूप संगठित व्यवसाय के रूप में उभर कर सामने आ रहा है। यही कारण है कि आज अनुवाद एक व्यवसाय बन गया है। अनुवाद एजेंसियों की स्थापना या फिर आउटसोर्सिंग इसके उदाहरण हैं। लेकिन, इसकी यही व्यावसायिकता चुनौती भी खड़ी कर रही है। जरूरत अनूदित पाठों की गुणवत्ता की ओर ध्यान देने की भी है। बाजारवाद के इस दौर में अनुवाद को सशक्त बनाना, आज के समय की जरूरत है। वैसे, सभ्यता के विकास के साथ-साथ लगातार व्यापक और विस्तृत होते जा रहे अनुवाद के क्षेत्र, वास्तव में हमें यह संकेत दे रहे हैं कि अनुवाद आज की जरूरत है और कल का स्वाभाविक विकास-उपकरण। ऐसे में वह दिन दूर नहीं जब हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुवाद का ही वर्चस्व होगा।

 

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