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कविता: जिद्दी और मिन्नत

खत्म हुई तब रूठारूठी... जिद्दी-मिन्नत खूब हंसी मिल।

जिद्दी बोली नहीं मानती चाहे मिन्नत जो भी कर लो!

दिविक रमेश

जिद्दी बोली नहीं मानती
चाहे मिन्नत जो भी कर लो!
मिन्नत बोली तुम मानोगी
मैं भी पक्की जरा समझ लो!

‘मानो मिन्नत मानो वरना
कुट्टी दोस्त बुला लूंगी मैं।’
‘अच्छा, धमकी देती है तो
अब्बा दोस्त बुला लूंगी मैं।’
‘देखो मुझको रोना आया
मिन्नत अपने घर अब जाओ!’
‘और हंसी जो छिपी हुई है
उसको भी तो गले लगाओ!’

खत्म हुई तब रूठारूठी
जिद्दी-मिन्नत खूब हंसी मिल।
आसपास जो भी था सच्ची
हंसा जोर से वह भी खिलखिल।

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