ताज़ा खबर
 

नन्ही दुनिया: गोलू का सपना

बच्चे हाथ की कलाइयों में केसरिया, सफेद, हरे रंग के रिबन छल्ले बना कर पहने हुए थे। कुछ विद्यार्थी सिर पर सफेद रंग की टोपी भी पहने थे। उनका उत्साह देखते ही बन रहा था।

Author August 11, 2019 6:44 AM
गांव की ही एक दिव्यांग लड़की मुख्य अतिथि बन कर आई थी।

राधेश्याम भारतीय

विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था। विद्यालय के मुख्य द्वार से लेकर मंच तक जाने वाले रास्ते के दोनों ओर जहां सफेदी डाली गई थी, वहीं अलग-अलग रंग के झंडे भी लगाए गए थे। मंच के साथ बनी सुंदर रंगोली सबका ध्यान अपनी ओर खींच रही थी। बच्चे हाथ की कलाइयों में केसरिया, सफेद, हरे रंग के रिबन छल्ले बना कर पहने हुए थे। कुछ विद्यार्थी सिर पर सफेद रंग की टोपी भी पहने थे। उनका उत्साह देखते ही बन रहा था।

इस बार समारोह की सबसे खास बात यह थी कि गांव की ही एक दिव्यांग लड़की मुख्य अतिथि बन कर आई थी। उसे ही झंडा फहराना था। बच्चों को उसके बारे में कम ही जानकारी थी, क्योंकि आजकल वह शहर में रह कर पढ़ाई जो कर रही थी।
समारोह प्रारंभ हुआ।
सर्वप्रथम मुख्य अतिथि के रूप में पहुंची शिवानी ने झंडा फहराया। हालांकि वह अपनी वीलचेयर पर ही बैठी थी। खड़ी तो वह हो ही नहीं सकती थी। उसने तिरंगे को सलामी दी। साथ ही राष्ट्रगान की धुन बज उठी। सभी विद्यार्थी सावधान की मुद्रा में पहले से ही थे। उन्होंने भी राष्ट्रगान गाया।
मैडम संगीता मंच संचालन कर रही थीं।
उन्हें पहले तो देश की आजादी के लिए लड़ी गई जंग में कुर्बान हुए शहीदों की गौरवगाथा बताते हुए आगे कहा कि यह लहराता हुआ झंडा उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है। उन्हें कोटि-कोेटि नमन।
उसके बाद जहां छात्राओं ने देशभक्ति के गीतों पर मनमोहक नृत्य किया, वहीं छात्रों ने देशप्रेम से ओतप्रोत कविताएं सुनार्इं।
अब मैडम ने मुख्य अतिथि के बारे में बताया कि ‘शिवानी पढ़ाई के साथ-साथ एक अच्छी खिलाड़ी भी हैं। इन्होंने अभी तक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में चार स्वर्ण पदक जीते हैं…।’
‘क्या! यह लड़की खेलती भी है? यह तो चल भी नहीं सकती, फिर खेलती कैसे होगी? कहीं मैडम वैसे ही इसकी तारीफ के पुल तो नहीं बांध रहीं।’ वहीं बैठा गोलू सोच में डूबा था। वह कभी उसके पतले पड़ चुके पैरों की ओर देखता, तो कभी मैडम की ओर। उसकी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।
इसी बीच मैडम ने शिवानी को अपने संबोधन के लिए आमंत्रित किया।
शिवानी ने अपनी वीलचेयर पर बैठे-बठे ही सबका अभिवादन कर संबोधित करते हुए कहा- ‘तिरंगा फहराना बड़े गौरव की बात है और ये गौरव के पल आज बेटियों को मिले हैं… हम बेटियां किसी से कम नहीं। यहां जितनी भी मेरी बहनें बैठी हैं, वे खूब मन लगा कर पढ़ें। फिर देखना सपने कैसे साकार होते हैं। मैंने चार स्वर्ण पदक जीते हैं। मैं यहां बताना चाहती हूं कि सरकार दिव्यांगों के लिए अलग से खेल कराती है, जिसमें केवल दिव्यांग भाग ले सकते हैं।’
गोलू, जिसका सही नाम गौरव था, वह छठी कक्षा में पढ़ता था, खेलों की बात सुन कर उसे बड़ी खुशी हुई। मन ही मन सोचने लगा- ‘…खेलों में स्वर्ण पदक… मैं मम्मी से कहूंगा, देखो मम्मी, खेलने के कितने लाभ हैं और एक आप हैं कि मुझे खेलने नहीं देतीं। अब तो मैं भी खूब खेलूंगा। देखूंगा, मम्मी अब कैसे रोकेंगी? वाह! अब तो खूब मजा आयेगा।’ गोलू किसी दूसरी ही दुनिया में खो गया था।
‘… मैं एक बात और बताना चाहूंगी कि मैंने बीए में भी अपनी कक्षा में अव्वल आई थी। अब मैं कॉलेज से अंगे्रजी में एमए कर रही हूं।’
‘शिवानी पढ़ती भी है! कैसे पढ़ती होगी। नहीं नहीं, यह भी मैडम की तरह झूठ बोल रही है। भला कोई खेलते हुए कैसे पढ़ सकता है!’ गोलू उधेड़बुन में फंस गया था।
कार्यक्रम समाप्त हुआ तो छात्रों ने शिवानी का घेर लिया। बच्चे प्रश्न पर प्रश्न किए जा रहे थे। कोई उसकी पढ़ाई के बारे में पूछ रहा था, तो कोई उसके खेलों के बारे में। लेकिन गोलू की समस्या कुछ और ही थी।
गोलू भी प्रश्न करना चाहता था। पर किया नहीं, क्योंकि वह जानता था कि सब उसका मजाक उड़ाएंगे, इसलिए उसने कोई प्रश्न नहीं किया।
जब सब चले गए तो गोलू ने पूछा- ‘दीदी! आप खेलती भी हैं और फिर पढ़ती भी हैं… क्या यह बात सच है?’
‘तुम्हें क्या लगता है?’
‘मुझे तो झूठ लगता है।’ कहना तो वह यही चाहता था, पर मन की बात मन में रख गया।
उसे चुप देख शिवानी बोली- ‘भइया, मैं सुबह उठ कर खेल की प्रैक्टिस करती हूं। आराम करती हूं। फिर पढ़ाई करती हूं। ऐसे ही शाम के समय करती हूं। मेरा सपना है कि मैं पढ़-लिख कर अध्यापिका बनूं। मुझे अध्यापिका बनना पसंद है। आपको क्या पसंद है…?’
‘बड़ी कार चलाना।’
‘अभी से कार! लाखों रुपए में आती है कार।’
‘दीदी, वो कार नहीं, खिलौना कार। पर मम्मी कहती हैं कि अगर मैं अच्छे नंबर लेकर आऊंगा तभी कार मिलेगी।’ ऐसा कहते हुए गोलू की आवाज दबती चली गई।
‘तो कार का सपना है। पर भइया, इसके लिए तो खूब पढ़ना पड़ेगा। तभी तुम्हारा सपना पूरा हो सकता है। अब आप सोच लो, आपको कार चाहिए या नहीं।’
‘मुझे कार जरूर चाहिए… बिल्कुल चाहिए।’
‘यही तो मैं भी कहती थी कि मुझे स्वर्ण पदक चाहिए। पर बिना अभ्यास किए तो पदक कहां मिलते हैं। तुम भी अच्छी तरह पढ़ाई करोगे, तो तुम्हें भी मिल जाएगी कार।
गोलू को उसके प्रश्नों का उत्तर मिल गया था। अब वह एक दृढ़ निश्चय के साथ घर की ओर दौड़ गया था।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App