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समाज: आधुनिकता और नई पीढ़ी

भारतीय संस्कार, सच्चाई, ईमानदारी की सीख, जो परिवार के बड़े-बुजुर्गों यानी दादी-नानी से मिलती थी। उनकी कहानियों के माध्यम से बच्चों के भीतर मानवीयता, सहिष्णुता, साहस और वीरता की भावनाएं भरी जाती थीं।

कहानियां बच्चों को जीवन जीने की कला सिखाती थीं।

वंदना शर्मा

जीवन यापन के साधनों के लिए पहले जहां हमें काफी मशक्कत करनी पड़ती थी, आज विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने इसे बहुत आसान कर दिया है। मगर हमने उसका सदुपयोग न करके दुरुपयोग करना आरंभ कर दिया है। इसलिए एसी की ठंडक में मोबाइल गेम खेलने वाले, वाट्सऐप और मोबाइल की दुनिया में अपना जीवन व्यतीत करने वाले आज के बच्चे संवेदनहीन होते जा रहे हैं, उनमें मानवीय भावनाएं लुप्त हो रही हैं। माता-पिता के संघर्ष से वे जानबूझ कर अनभिज्ञ रहना चाहते हैं। उनके लिए माता-पिता और दादी-नानी के प्यार-दुलार और अनुभव की कोई कीमत नहीं। दादा-दादी, नाना-नानी को जानने-समझने की न तो उनमें कोई इच्छा है, और न ही चाह। संयुक्त परिवार को दूर छोड़ आए एकाकी परिवार के बच्चों को न तो अपने रिश्तों की पहचान है, न ही जानने की इच्छा। अपनी ही धुरी पर घूम रही उनकी जिंदगी ने उन्हें पारिवारिक प्रेम से विलग कर दिया है।

भारतीय संस्कार, सच्चाई, ईमानदारी की सीख, जो परिवार के बड़े-बुजुर्गों यानी दादी-नानी से मिलती थी। उनकी कहानियों के माध्यम से बच्चों के भीतर मानवीयता, सहिष्णुता, साहस और वीरता की भावनाएं भरी जाती थीं। वे कहानियां बच्चों को जीवन जीने की कला सिखाती थीं। आज वे भी लुप्त हो रही हैं। प्रश्न उठता है कि उनके प्यार-दुलार और कहानियों से हमारा बचपन क्यों वंचित है? दरअसल, प्रौद्योगिकी ने हमें इतना गुलाम बना दिया है कि हम स्वयं एक यंत्र बन गए हैं। मानसिक रूप से खोखले हो गए हैं। इसका नकारात्मक प्रभाव बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। बच्चे मानसिक अवसाद, आंखें और याददाश्त कमजोर होने जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं और इसके साथ-साथ भावनात्मक और संवेदनात्मक रूप से वे खोखले होते जा रहे हैं। भावशून्यता, उत्तेजना और बड़ों के प्रति संवेदनशून्यता, निरादर आज विध्यार्थी स्तर तक के बच्चों की स्वाभाविक प्रकृति एवं प्रवृति बनती जा रही है। ईर्ष्या, द्वेष और आपाधापी के कारण बढ़ते बाल अपराध बच्चों के सुनहरे बचपन को दलदल में धकेल कर उनके भविष्य की नींव को खोखला कर रहे हैं।

नतीजतन, बच्चों की मासूमियत, माता-पिता से प्राप्त संवेदनात्मक सुरक्षा का अभाव उन्हें कुंठाग्रस्त बना रहा है। बचपन की कड़वी सच्चाइयों की यही अमिट छाप उन्हें जीवन भर कचोटती है। सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण घर उन्हें घर जैसी भावना का अहसास नहींं देता, क्योंकि उनकी भावनाओं को साझा करने का उस घर में किसी के पास वक्त ही नहीं है, न ही उस घर में कोई है, जो उसकी भावनाओं को महत्त्व दे। माता-पिता की अपने कैरियर के प्रति महत्त्वाकांक्षाएं, धन की अंधी दौड़, आपाधापी के कारण उनके पास बच्चों के लिए समय ही नहींं है। इसकी भारी कीमत तब चुकानी पड़ती है, जब वही बच्चा अपने भीतर अनेकानेक असमंजस, असुरक्षाबोध को समेटे बड़ा होता है, युवा होता है। उसके भीतर अपने माता-पिता के प्रति आदर और सम्मान कैसे आएगा, जिसका उसे अहसास ही नहींं हुआ। वह संवेदनात्मक प्रेम कैसे जागेगा, जिससे उसे वंचित रखा गया। पर इस बात को आज का अभिभावक वर्ग समझने को तैयार नहींं। आज अगर युवाओं को अपनी ही संस्कृति रूढ़िवादी और पिछड़ी हुई प्रतीत हो रही है, तो हमें इसके कारणों को भी समझना होगा।

हमें आधुनिकता और प्रौद्योगिकी से प्राप्त साधनों के साधक न बन कर इनका साधन की तरह उपयोग करना होगा। ऐसी आधुनिकता और प्रौद्योगिकी का क्या फायदा, जिसके उपयोग में हम इतना खो जाएं कि लाभ के स्थान पर हानि और प्रगति के स्थान पर बर्बादी की ओर बढ़ते चले जाएं। इससे बेहतर तो हमारा वह कल था, जिसमें सुख-सुविधाएं चाहे कुछ कम रही हों, पर संतोष, सुकून, सुरक्षा और खुशहाली के साथ प्रेम, अपनत्व, आदर जैसी भावनाओं के अहसास से बच्चे और बुजुर्ग सरोबार रहते थे।

यह कैसा बदलाव आया है, जिसने न केवल मासूम बच्चों, बल्कि युवाओं को भी अपने माता-पिता, अपने रिश्तों से दूर किया है। एक ओर युवा अपने भीतर निराशा और कुंठा का सामना कर रहा है, तो दूसरी और अभिभावक भी अंतरतम में पीड़ा का अनुभव कर रहे हैं। दरअसल, आज न तो हमारे संयुक्त परिवार रहे हैं, न ही परिवारों के बीच आपसी प्रेम। एकाकी परिवार ने हम सभी को एक-दूसरे से रिश्तों की दूरी तो दी ही है, हमें मानसिक रूप से भी खोखला कर दिया है। निकले तो थे हम सुख की तलाश में, सुकून और आत्मसंतोष की खोज में, लेकिन उसके बदले हमें मिला है संघर्ष, असुरक्षा और असंवेदनशील परिवेश। आज का युवा जीवन की वास्तविकताओं से बेखबर, अनजान रास्तों की भूलभुलैया में भटक गया है। पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकता की अंधी दौड़ में वह अपनी अस्मिता से दूर होता जा रहा है। एक भटकाव भरा जीवन जी रहा है। इसका दुष्परिणाम पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है।

फिर क्यों हम इस पाश्चात्य संस्कृति का नकली आवरण ओढ़ कर अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं! आश्चर्य की बात तो यह है कि जिस सभ्यता, संस्कृति की अंधी दौड़ में हमारा युवा लगा हुआ है वह संस्कृति हमारी संस्कृति का बिगुल बजा रही है। वहां के एकाकी परिवार, टूटे हुए परिवार, जीवन का एकाकीपन, बच्चों की माता-पिता से दूरी आज उन्हें एक ऐसे मोड़ पर ले आई है, जहां वे खुद को अवसादग्रस्त पाते हैं।

दरअसल, अपनी अस्मिता को खोकर उधार ली हुई संस्कृति को अपनाना संगत नहीं। हमें ज्ञान-विज्ञान की खिड़िकयां तो खुली रखनी हैं, पर पांव जमीन पर रखने होंगे। आज हमारे पैर अपनी जड़ों से उखड़ते से नजर आ रहे हैं। हम जागरूक तो हुए हैं, पर भीतर ही भीतर भय और कुंठा से ग्रस्त होकर अपनी असलियत और वास्तविकता को भूल रहे हैं। हमारे भीतर गर्व की भावना नहींं, जिंदादिली नहींं है, बल्कि भावनाहीन हो गए हैं। बात चाहे खानपान या स्वास्थ्य की हो, नैतिक मूल्यों या शिक्षा की हो या फिर जीवन शैली की ही क्यों न हो, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हम अपने मूल को त्याग रहे हैं।

पर अति हर चीज की बुरी होती है और इसी अति के कारण अब शायद समय की दहलीज पर प्राचीन संस्कार अपने पुन: पदार्पण का संकेत दे रहे हैं। शायद हम वापस पीछे की ओर जाएंगे। इसका प्रमाण है- विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत में प्रौद्योगिकी के बढ़ते प्रयोग से होने वाली हानियों और दुष्परिणामों को देखते हुए इसे गहन चिंता का विषय बताया है और कुछ दिशा-निर्देश भी दिए हैं, जो प्रेरित करते हैं हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए। इस प्रौद्योगिकी का उपयोग नियंत्रण में रह कर करने की सलाह दी गई है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक उम्र के बच्चे के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग की एक निश्चित समयावधि या घंटे निर्धारित किए गए हैं।

प्राचीन संस्कृति के संस्कारों को आत्मसात करते हुए अगर बच्चे प्रौद्योगिकी के साथ नियंत्रण में रह कर, मर्यादा में रह कर उसका उपयोग करें तो वे मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहेंगे और अपने संस्कारों से जुड़े रह कर वक्त के साथ, युग के साथ कदम से कदम मिला कर भी चलेंगे। इस कार्य में न केवल बच्चों की, बल्कि अभिभावकों, अध्यापकों और समाज की साझा जिम्मेदारी हो जाती है। हमें अपनी युवा पीढ़ी और बच्चों को बर्बादी की ओर जाने से रोकना होगा। सहयोग, प्रेम और मित्रतापूर्ण रवैए के साथ उनके सम्मुख उदाहरण बनना होगा, ताकि पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकता की मार से उन्हें बचाया जा सके। उन्हें मानसिक अवसाद, संवेदनात्मक असुरक्षा के घेरे से निकाल कर अपनी अस्मिता की पहचान कराते हुए उनमें आपसी रिश्तों की महत्ता, आत्मविश्वास और अपनत्व का संचार करना होगा और इससे न केवल वर्तमान पीढ़ी के बचपन और युवावस्था को बर्बादी से बचाया जा सकता है, बल्कि इसका सदुपयोग निश्चित रूप से व्यापक स्तर पर देश हित में भी किया जा सकेगा।

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