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लहरों पर तैरती रोशनी

7 अक्तूबर, 1843 को पहली दफा लालटेन जलाई गई और उस लालटेन को समुद्र की सतह से 112 फीट की ऊंचाई पर रखा गया। हालांकि मई से सितंबर के बीच उन इलाकों में तेज आंधियां चलती थीं, इसलिए उससे बचाव के लिए लाइट हाउस की ऊंचाई पचासी फीट तक कर कम कर दी जाती थी।

Author Published on: November 3, 2019 5:26 AM
जहाजों में अचल प्रकाश लैंप लगे होते हैं

अरब सागर की ओर के समुद्री तट पर पहले लाइट हाउस का निर्माण केरल के तेलचेर्री पोर्ट पर 1835 ई में हुआ। लेकिन व्यापारियों और जहाजियों ने ब्रिटिश हुकूमत से आग्रह करना शुरू किया कि एक लाइट हाउस की स्थापना कुन्नुर में होना चाहिए। मद्रास प्रेसीडेंसी ने 14 दिसंबर, 1842 को कुन्नुर में लाइट हाउस बनाने का फैसला किया। भारतीय लाइट हाउस के लिए प्रकाश यंत्रों का निर्माण ग्रैंड आर्सेनल मद्रास में किया जाता था। लेकिन नए किस्म के प्रकाश यंत्र बनाने में समय लगना था और तेलीचेर्री लाइट हाउस के लिए नया यंत्र बन चुका था तो तय किया गया कि नए संयंत्र के आने तक तेलीचेर्री के सरप्लस लालटेन का इस्तेमाल कुन्नुर में किया जाना चाहिए। इस तरह तेलचेर्री से लाई गई लालटेन से कुन्नुर लाइट हाउस की शुरुआत हुई।

7 अक्तूबर, 1843 को पहली दफा लालटेन जलाई गई और उस लालटेन को समुद्र की सतह से 112 फीट की ऊंचाई पर रखा गया। हालांकि मई से सितंबर के बीच उन इलाकों में तेज आंधियां चलती थीं, इसलिए उससे बचाव के लिए लाइट हाउस की ऊंचाई पचासी फीट तक कर कम कर दी जाती थी। लालटेन की ऊंचाई तीस इंच थी तथा उसमें बीस इंच ऊंचाई का शीशा चढ़ा दिया जाता, ताकि बाती की लौ तेज हवाओं से बुझे नहीं। यह रोशनी समुद्र में बारह नॉटिकल मील तक देखी जा सकती थी। प्रकाश के असर और उसकी तीब्रता बढ़ाने के लिए लालटेन के पीछे एक चांदी का वर्क चढ़ा धातुई कनकेव कवर लगा दिया जाता। प्रकाश-व्यवस्था साल भर शाम से सुबह तक रहती। लालटेन की रोशनी बराबर तेज चमके, इसके लिए मजदूर रात भर बाती के ऊपरी हिस्से को दुरुस्त करते और लालटेन के शीशे को साफ करते रहते। लेकिन ऐसी लालटेनें हमेशा ठीक से काम नहीं करती थीं, जिसकी वजह से प्रकाश व्यवस्था चरमरा जाती। लालटेन में नारियल तेल इस्तेमाल किया जाता और एक लालटेन में रात भर में ढाई किलोग्राम नारियल तेल की खपत होती।

पर समय के साथ-साथ वैज्ञानिक विकास के साथ लाइट हाउस का भी कायाकल्प हुआ। समुद्र तटीय इलाके में राजाओं ने अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में लाइट हाउस की स्थापना कराई, क्योंकि उन्हें समुद्री रास्ते से आयात-निर्यात के फायदे दिखने लगे। भारतीय समुद्री तटों पर अवस्थित सौ साल से भी पुराने प्रकाशगृहों ने समुद्री यात्राओं का मार्गदर्शन और आसान किया है, उन दिनों जब मार्गदर्शन के कोई अन्य उपाय जहाजी बेड़ों के लिए उपलब्ध नहीं था। फॉल्स पॉइंट लाइटहाउस लगभग एक सौ बयासी साल पुराना है। इसकी स्थापना और उसके विकास का इतिहास जानना दिलचस्प होगा।

ओडीशा प्रांत 1803 में अंग्रेजों के कब्जे में चला गया। उन दिनों बंगाल की खाड़ी से गुजर कर कोलकाता पोर्ट पर जाने वाले जहाजों को हुगली नदी के मुहाने तक पहुंचना पड़ता था, लेकिन वहां तक पहुंचने में जहाजों की यात्राएं प्रकाशगृहों के आभाव में कठिन लगता था। ओडीशा प्रांत की पूर्वी सीमा बंगाल की खाड़ी पर है। कोलकाता पोर्ट के पहले महानदी मुहाना पड़ता है, जहां वह बंगाल की खाड़ी में समुद्र में मिलती है। कोलकाता पोर्ट की ओर जाने वाले जहाजी बेड़े अक्सर महानदी के मुहाने को हुगली नदी का मुहाना समझ कर उस तरफ मुड़ जाया करते। जहाजी बेड़ों को इस भ्रम से बचाने के लिए अंग्रेज सरकार ने महानदी के मुहाने पर एक प्रकाशगृह के निर्माण की योजना बनाई। इस प्रकाशगृह का नाम रखा गया फॉल्स पॉइंट लाइटहाउस। सैंतीस मीटर ऊंची मीनार का निर्माण हुआ, जो 16 अक्तूबर, 1837 को पूरा हुआ और प्रकाशगृह से प्रकाश निर्गमन 1 मार्च, 1838 को शुरू हुआ। मीनार के ऊपर बना बनाया लालटेनरूम स्थापित किया गया, जो इंग्लैंड से आयात हुआ।

लालटेनरूम के साथ ही प्रकाश संयंत्र और पीतल का प्रकाश-परावर्तक भी आयात हुआ। प्रकाशगृह में ही लालटेन रखी जाती है, जिसकी रोशनी समुद्री जहाजियों को दिखाई देती है। नारियल तेल से जलने वाली लालटेन या लैंप, जो घूमता नहीं था, लालटेन रूम में स्थापित कर दिया गया। चूंकि उस लालटेन की रोशनी मद्धिम थी और जहाजीबेड़ों तक पहुंचते-पहुंचते धूमिल पड़ जाती, तो उस प्रकाशगृह की छत से हर चार घंटे पर गोले दागे जाते, ताकि जहाजियों को प्रकाशगृह का पता चले। लैंप से निकलने वाली प्रकाश किरणों की क्षीणता को ध्यान में रखते हुए इस प्रकाशगृह के प्रकाश-यंत्रों को बदलने की प्रक्रिया की शुरुआत हुई।

1 फरवरी, 1880 में फॉल्स पॉइंट लाइटहाउस में नया प्रकाश संयंत्र लगा दिया गया। इस प्रकाश संयंत्र से निकलने वाली श्वेत किरणें समुद्र में उन्नीस मील की दूरी तक ठीक-ठीक देखी जा सकती थीं। जहाजियों को एक सार्वजानिक सूचना दी गई कि फॉल्स पॉइंट लाइटहाउस से नीली रोशनी अब नहीं निकलेगी और गोले भी नहीं दागे जाएंगे। प्रकाशगृह में प्रकाश संबंधित जो भी बदलाव होते थे उसकी सार्वजनिक सूचना देना अनिवार्य था, ताकि जहाजियों को कोई भ्रम न हो।

प्रकाशगृह की विशिष्ट पहचान

हर प्रकाशगृह की विशिष्ट पहचान है, जिसकी वजह से जहाजी कप्तान उसे पहचान लेता है। इस पहचान के अंतरराष्ट्रीय मानक हैं। उन दिनों प्रकाशगृह के संयंत्र और उपकरण भारत में नहीं बनते थे, इसलिए उनका आयात इंग्लैंड से होता। फॉल्स पॉइंट लाइटहाउस के नए उपकरण इंग्लैंड की कंपनी चांस ब्रदर्स ने 1878 में बनाई थी। वह लालटेनरूम आज भी फॉल्स पॉइंट लाइटहाउस में उपयोग हो रहा है। हालांकि प्रकाश संयंत्र में अनेक बार बदलाव हुआ। पैंतालीस हजार रुपए फॉल्स पॉइंट लाइटहाउस के प्रकाश संयंत्र के आधुनिकीकरण पर उस समय खर्च हुए थे, लेकिन इसके बावजूद जहाजियों ने अपर्याप्त रोशनी की शिकायत की। इस लालटेन के बर्नर में छह बत्तियां होती थीं, जिनमें से पांच बत्तियों को जलाया जाता और एक बत्ती को सुरक्षित बचा के रखा जाता, ताकि आपातकालीन स्थिति में उसका उपयोग हो सके। छठी बत्ती को धुंध और कुहासे के मौसम में जलाया जाता।

एक खामी समझ में आई कि उधर से होकर गुजरने वाले जहाजों में अचल प्रकाश लैंप लगे होते हैं और फॉल्स पॉइंट लाइटहाउस के लालटेन रूम में भी अचल प्रकाश लैंप लगे हुए हैं तो जहाजियों को लाइट हाउस की रोशनी और जहाजों की रोशनी में फर्क महसूस नहीं होता था। अचल प्रकाश व्यवस्था को एक ऐसी प्रकाश-व्यवस्था से बदला गया जिससे रोशनी एक नियमित अंतराल के बाद अलोप हो जाती। उसे आॅकॉल्टिंग प्रकाश व्यवस्था कहा गया। प्रकाश को अलोप करने के लिए एक धातुई ट्युब का इस्तेमाल किया गया, जो लालटेन के सामने ऊपर-नीचे होता रहता। तीस सेकेंड में छब्बीस सेकेंड तक रोशनी दिखाई देती और चार सेकेंड के लिए रोशनी ओझल हो जाती। यह क्रम लगातार दोहराया जाता। रात में इसको अंजाम देने के लिए लाइट कीपरों को हाथ से काम करना पड़ता। वह एक मुसीबत थी, जो यंत्रचालित उपकरणों के आने के बाद दूर हुई।

1931 में चांस ब्रदर्स ने एक नए प्रकाश संयंत्र का निर्माण किया, जिसमें छह बत्तियों वाले बर्नर लैंप की जगह पचासी मिमी का पेट्रोलियम वैपर लैंप और धातुई ट्युब की जगह अपने आप घूमने वाला पर्दा था। इस समय यह अर्द्ध-स्वचालित प्रकाशगृह बन गया है। लेकिन यह भी एक सच है कि इस प्रकाश-गृह की स्थापना के समय से ही यहां के कर्मचारियों को नाना प्रकार की मुसीबतों का सामना करना पड़ा था। सुंदरवन के बगल में होने के कारण वहां से बाघ प्रकाशगृह में घुस आते थे। बाघों से रक्षा के लिए प्रकाशगृह के कर्मचारियों को बंदूकें और छर्रे दिए गए। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय प्रकाशगृह को युद्ध से तबाही से बचाव के लिए तोपें भी दी गई थीं। अस्पताल और डॉक्टर के अभाव में लोगों की जानें भी गर्इं। वहां तक पहुंचने का रास्ता केवल समुद्र था, तो उनको नावें दी गर्इं।
वह जमाना अब लद गया। 1958 में फॉल्स पॉइंट लाइटहाउस का विद्युतीकरण किया गया। फ्रांस की कंपनी बीबीटी ने नए प्रकाश संयंत्रों की आपूर्ति की। घूमने वाला प्रकाश यंत्र लगाया गया, जिससे फ्लैश प्रकाश निकलता। दो फ्लशों के बीच बीस सेकेंड का फासला रहता। प्रकाश प्रदीपक एक हजार वाट का विद्युतीय उद्दीप्त लैंप है, जो क्लॉकवर्क पद्धति से काम करता है और प्रकाश की परिक्रमा करता है। प्रकाश प्रदीपक एक चार सौ वाट का मेटल हैलाइड लैंप है और प्रकाश परिक्रमण का नियंत्रण इलेक्ट्रॉनिक पल्स-मोटर से किया जाता है। दिन में फॉल्स पॉइंट लाइटहाउस की पहचान है मीनार की दीवार पर गुदा हुआ बड़ा-सा सफेद रंग का स्टार और लालटेनरूम के गुंबद का नारंगी रंग। प्रकाशगृहों का निर्माण समुद्री तटों पर किया जाता था, जहां घने जंगल होते, बिजली नहीं होती, आवागमन के साधनों का आभाव रहता, जंगली जानवरों से बचाव का उपाय नहीं होता, डॉक्टर और दवाओं का इंतजाम नहीं होता । लाइटहाउस कीपरों ने कठिन परिस्थितियों में रह कर लाइट हाउसों का रखरखाव संभाला था। फिर लाइटहाउस के इर्दगिर्द धीरे-धीरे सुविधाएं उपलब्ध कराई गर्इं। मगर अब भी अनेक लाइट हाउस हैं जहां पर्याप्त सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं।

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