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कविता: पिचक पिचक जाता फुकना

कहती है जब आई हूं, कुछ दिन तो होगा रुकना!

ठंडी होकर गैस सिकुड़ती, पिचक-पिचक जाता फुकना!

नए साल पर मस्ती में,
शीतलहर है बस्ती में!

कहती है जब आई हूं,
कुछ दिन तो होगा रुकना!
बरफ जमेगी जब तरु पर,
डाली को होगा झुकना!
बुला रहे हैं सब सूरज को,
जोड़े हाथ परस्ती में!

ठंडी होकर गैस सिकुड़ती,
पिचक-पिचक जाता फुकना!
वही निकले बाहर जिसको,
शीतलहर से है ठुकना!
नाक करेगी सूं-सूं-सड़-सड़,
ठिठुरन भरी समस्ती में!

रावेंद्र कुमार रवि

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