ताज़ा खबर
 

संस्कृति: रथ चढ़ि आए जगन्नाथ

मंदिर के पास हवा की दिशा हैरान करती है। समुद्री तटों पर हवा समुद्र से जमीन की तरफ चलती है लेकिन, पुरी में हवा जमीन से समुद्र की तरफ चलती है। मंदिर के शिखर की कोई छाया या परछाई कभी नहीं होती है।

Author July 7, 2019 4:50 AM

पुराणों ने जिन सात नगरियों को मोक्ष देने वाली माना है, उनमें एक है पुरी यानी जगन्नाथ पुरी। पुरी में परमात्मा श्रीकृष्ण ही जगन्नाथ स्वरूप में विराजमान हैं। स्कंद पुराण कहता है, ‘यह भूमि धन्य है, जहां संसार के स्वामी स्वयं शरीर धारण करके न केवल बैठे हैं, बल्कि उन्होंने इसे अपने ही नाम से ‘जगन्नाथ पुरी’ के रूप में प्रसिद्ध कर दिया है।’ अथर्ववेद से लेकर ब्रह्म पुराण तक सारे ग्रंथों में भगवान जगन्नाथ की अनुपम महिमा का वर्णन है। जगन्नाथ शब्द का तात्पर्य है, संसार के स्वामी। वे भगवान जगन्नाथ ही प्रतिवर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष यानी उजियाले पखवाड़े की द्वितीया तिथि को बड़े भाई बलराम और छोटी बहन सुभद्रा के साथ रथ में विराजमान होकर जीव और ईश्वर की दूरी को पाट देते हैं। हर कोई उनके लकड़ी से बने रथ को अपनी शक्ति के अनुसार खींच कर उसे आगे बढ़ाता है। वे कभी रुक जाते हैं तो कभी आगे बढ़ जाते हैं। खुले आसमान के नीचे वर्षा में भीगते हैं तो कभी तेज धूप में गहरे चमकते हैं। फूल-पंखुड़ियों के सौरभ के बीच भगवान जगन्नाथ प्रतिवर्ष अपनी यात्रा पर निकलते हैं और मानव समाज को आनंद प्रसाद बांटते हैं।

भक्ति संवेदना में भगवान की प्रतिमा को ‘ठाकुरजी’ कहा जाता है, जो शताब्दियों पुरानी परंपरा है। भक्ति पंरपरा के महान संत रामानुजाचार्य ने ईश्वर के पांच भेद बताए, जिनमें एक ‘अर्चावतार’ है। अर्चावतार का मतलब घर-मंदिरों में विराजमान भगवान की प्रतिमा से है। ये अर्चावतार विग्रह भक्त के अधीन होते हैं। भक्तों के इनसे बोलने-सुनने और खाने-खिलाने जैसे सारे संबंध होते हैं। अर्चावतार भक्तों से साक्षात सेवा ग्रहण करते हैं। इसी भक्ति धारा में भगवान जगन्नाथ अर्चावतार रूप में रथ पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देते हैं।

रथ यात्रा महोत्सव की शुरुआत में देवताओं को मंदिर से बाहर लाया जाता है और उन्हें संबंधित रथों में विराजमान किया जाता है। देवताओं को मंदिर के गर्भगृह से बाहर लाकर पारंपरिक धार्मिक विधान से रथों तक ले जाया जाता है। सबसे पहले चक्रराज सुदर्शन, उसके बाद हलधर बलभद्र फिर सुभद्रा और सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ।

तीन रथ, तीन नाम
तीन रथों के भिन्न-भिन्न नाम हैं। जिस रथ में भगवान जगन्नाथ विराजते हैं, वह ‘नंदीघोष’ नाम से जाना जाता है। भगवान बलभद्र के रथ को ‘तालध्वज’ कहते हैं। सुभद्रा ‘देवदलन’ रथ में विराजती हैं। चक्रराज सुदर्शन के विग्रह को सुभद्रा के साथ उनके रथ में विराजमान किया जाता है। भगवान जगन्नाथ के प्रतिरूप में मदनमोहन भगवान को जगन्नाथ के रथ में स्थान दिया जाता है। धातु से बने भगवान श्रीराम और कृष्ण के दो मधुर यानी छोटे विग्रह बलभद्र के रथ में बिठाए जाते हैं। इस प्रकार वास्तव में सात देवता जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा, सुदर्शन, मदनमोहन, राम और कृष्ण को तीन रथों पर बैठाया जाता है और उन्हें ‘गुंडिचा घर’ तक ले जाया जाता है। यह जगन्नाथ मंदिर से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बलभद्र का रथ सबसे पहले खींचा जाता है, बाद में सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ।

पांचवें दिन हेरा पंचमी
अगर पहले दिन रथ ‘गुंडिचा घर’ तक नहीं पहुंच पाते हैं, तो उन्हें अगले दिन फिर से खींचा जाता है। सप्ताह भर तक ‘गुंडिचा घर’ में विराजे रहने के बाद नौवें दिन देव विग्रह फिर से जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार क्षेत्र में लाए जाते हैं। इस बीच पांचवें दिन एक महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान होता है, हेरा पंचमी। यह पर्व अपने भाई-बहन के साथ रथारूढ़ होकर मंदिर छोड़ आए भगवान से नाराज हुई माता महालक्ष्मी से जुड़ा है। महाप्रभु से नाराज महालक्ष्मी सखियों के संग शरधा बाली (श्रद्धावलि) तक आती हैं। लक्ष्मी की उत्सव प्रतिमा को गाजे-बाजे के साथ गुंडिचा मंदिर तक ले जाया जाता है, जहां भगवान जगन्नाथ द्वारा रथयात्रा में अपने को साथ न ले जाने से गुस्साई लक्ष्मी प्रतीक के तौर पर नंदिघोष रथ का एक हिस्सा तक तोड़ देती हैं। मानवीय लीला के लिए प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ से जुड़ा हेरा पंचमी महत्त्वपूर्ण उत्सव है। रथ को तोड़ने के बाद महालक्ष्मी पुन: श्रीमंदिर लौट आती हैं। महालक्ष्मी का विमान हेरा साही होते हुए मंदिर लौटने के कारण इस तिथि को ‘हेरा पंचमी’ कहा जाता है।

देवशयनी एकादशी पर आराधना भोग
दसवें दिन आषाढ़ की शुक्ल पक्ष एकादशी होती है। इस दिन शाम को देवताओं को सोने के आभूषणों से सुसज्जित किया जाता है। उन्हें सिंहद्वार क्षेत्र में लाने के लिए भव्य और आकर्षक कपड़े पहनाए जाते हैं। इसी दिन वैदिक और पौराणिक अनुष्ठान होता है। यह दिन हरिशयनी एकादशी है, जिसे आम बोलचाल में देवशयनी एकादशी बोलते हैं। ‘शतपथ-ब्राह्मण’ के अनुसार इस दिन से चातुर्मास व्रत-अनुष्ठान शुरू होता है। देवताओं का शयन काल प्रारंभ होता है, जो चार महीने चलता है। बारहवें दिन भगवान जगन्नाथ को ‘आराधना भोग’ भेंट किया जाता है। इसमें उन्हें मीठा पेय चढ़ाया जाता है। अगले दिन की शाम को अनगिनत भक्तों की भीड़ के बीच पारंपरिक जुलूस में देवताओं को मंदिर में ले जाकर स्थापित किया जाता है।

भिन्न-भिन्न रंगों में रंगे रथ
वंशानुगत विशेषाधिकार प्राप्त लोगों द्वारा बलभद्र, सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ के लिए तीन रथों का निर्माण हर साल नई लकड़ी से किया जाता है। भगवान जगन्नाथ का रथ पैंतालीस फीट ऊंचा और पैंतालीस फीट चौड़ा होता है, जिसमें सोलह पहिए होते हैं। प्रत्येक का फैलाव सात फीट का है। यह रथ लाल और पीले कपड़ों से अलंकृत होता है। भगवान जगन्नाथ को कृष्ण ही माना जाता है, इस नाते उन्हें ‘पीतांबर’ नाम से पुकारा जाता है। वे रथ में सुनहरे पीले वस्त्र धारण कर विराजमान होते हैं। यहां तक कि रथ की छतरियों को पीली बंदनवारों और ध्वजा-पताकाओं से सजाया जाता है। इस मनोहारी उत्सव का नजारा कई दिनों पहले से जम जाता है। भगवान बलभद्र के तालध्वज रथ पर लगे झंडे में वृक्ष की आकृति होती है। चौदह पहिए होते हैं। प्रत्येक का व्यास सात फीट होता है। रथ लाल और नीले कपड़े से ढंका होता है, जिसकी ऊंचाई चौवालीस फीट होती है। बारह पहियों वाला सुभद्रा का रथ तिरालीस फीट ऊंचा होता है। इस रथ को लाल और काले कपड़े से सुसज्जित किया जाता है, जिसे पारंपरिक रूप से लोग शक्ति और मातृका देवी के साथ जोड़ते हैं। शक्ति का रंग लाल और योगिनियों का वर्ण काला है। प्रत्येक रथ में भिन्न-भिन्न सारथी होते हैं। भगवान जगन्नाथ के सारथी मातलि हैं। बलभद्र के दारुक और सुभद्रा के सारथी अर्जुन होते हैं।

बारह साल में नवशरीर-उत्सव
रथयात्रा आने-जाने वाला काल मात्र नहीं है, बल्कि यह पूरा अनुष्ठान है, जो लगभग वर्ष भर चलता है। परंपरागत रूप से माघ शुक्ल पंचमी को मनाई जाने वाली बसंत पंचमी के दिन से रथ निर्माण के लिए लकड़ियों का आना शुरू हो जाता है। शगुन के तौर पर मंदिर में लकड़ी का पहला गुरु वसंत पंचमी को ही आता है। पर रथों का निर्माण अक्षय तृतीया से शुरू होता है। इस प्रकार पूरे दो महीनों में रथ बन कर तैयार हो जाते हैं। यात्रा के लिए हर साल नए रथ बनाए जाते हैं। पर रथों में लगने वाले लकड़ी के घोड़े, सारथी और रथों को सजाने वाले छोटे देवताओं को बारह वर्षों में एक बार बनाया जाता है। भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की लकड़ी की प्रतिमा बारह सालों में एक बार बनाई जाती है। इस प्रकिया के अनुष्ठान को ‘नवशरीर-उत्सव’ कहा जाता है। यह समारोह पिछली बार 2015 में मनाया गया था। इन लकड़ियों की व्यवस्था सरकारी स्तर पर होती है। पर यह अलौकिक चमत्कार है कि भगवान जगन्नाथ समेत दूसरी प्रतिमाओं के निर्माण के लिए उपयोग में आने वाली काष्ठ समुद्र में बह कर खुद ही यथासमय किनारे लग जाती है।

मंदिर के रहस्य
’ मंदिर के पास हवा की दिशा हैरान करती है। समुद्री तटों पर हवा समुद्र से जमीन की तरफ चलती है लेकिन, पुरी में हवा जमीन से समुद्र की तरफ चलती है।
’ मंदिर के शिखर की कोई छाया या परछाई कभी नहीं होती है।
’ जगन्नाथ मंदिर के ऊपर कोई भी पक्षी उड़ता हुआ नहीं देखा गया। मंदिर के ऊपर से विमान उड़ाना भी निषेध है।
’ जगन्नाथ मंदिर के रसोईघर को दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर माना जाता है। मान्यता है कि कितने भी श्रद्धालु आ जाएं, यहां अन्न कभी खत्म नहीं होता।
’ मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए सात बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं। यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी से पकाया जाता है। इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है फिर नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है।
’ इस मंदिर के शिखर पर लगे सुदर्शन चक्र को कहीं से भी देखें तो वह सीधा ही नजर आता है।
’ मंदिर के ऊपर लगा ध्वज हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता रहता है।
’ मंदिर में मूर्तियां काष्ठ की बनी हुई हैं। हर बारहवें वर्ष में ये नई बनाई जाती हैं, लेकिन इनका आकार और रूप वही रहता है।
’ मंदिर सातवीं सदी में बनवाया गया, जो अब तक तीन बार खंडित हुआ है। 1174 ईस्वी में महाराज अनंगभीम देव ने इसका जीर्णोद्धार करवाया।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App