ताज़ा खबर
 

कविता: गीदड़ की शामत

गीदड़ भाई! शामत जिसकी आई... गया शहर को...मेरी मानो... लौट चलो... तुम भी संग वापस घर को।

Author Published on: November 3, 2019 6:13 AM

सूर्यकुमार पांडेय

काम न धंधा कुछ जंगल में, रोटी कैसे खाए,
गीदड़ चला शहर को, शायद रोजगार पा जाए।

सोच रहा था खड़ा किनारे, घुसूं किस तरह अंदर,
तभी दिखाई दिया शहर से वापस आता बंदर।

गीदड़ बोला, “बंदर भाई! कितना माल कमाया,
मुझको भी कुछ काम मिलेगा, यही सोचकर आया।

बंदर बोला, “शहर न जाओ, वरना पछताओगे,
काम न ठेंगा वहां मिलेगा, भूखों मर जाओगे।

सुना नहीं क्या, बुरे हाल, चल रही उधर मंदी है।
और शहर की हर फैक्टरी में अब तालाबंदी है।

गीदड़ भाई! शामत जिसकी आई, गया शहर को,
मेरी मानो, लौट चलो तुम भी संग वापस घर को। “

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 नन्ही दुनिया: ऐसे हुई बिजली की बचत
2 पारंपरिक परिधानों में इतरा कर चलें
3 सेहत: थाइराइड की समस्या
जस्‍ट नाउ
X