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सेहत: सफाई से भी होती है बीमारी

जीवाणु दो प्रकार के होते हैं- एक बुरे जीवाणु, जिनके कारण शरीर को तरह-तरह की बीमारियां होती हैं और दूसरे अच्छे जीवाणु जो परोक्ष रूप से शरीर को स्वस्थ रखने में हमारी मदद करते हैं।

Author Published on: September 15, 2019 6:11 AM
लोगों में साफ-सफाई की हद तक सनक दिखाई देती है।

अपने आसपास सफाई रखना अच्छी बात है। इस तरह बहुत सारे हानिकारक बैक्टीरिया को पनपने और उनसे पैदा होने वाली बीमारियों को रोका जा सकता है। मगर कई लोगों में साफ-सफाई एक सनक का रूप ले लेती है। वे बार-बार हाथ धोते, दिन में कई बार नहाते और कपड़े बदलते, घर में कई बार पोंछा लगाते, धूल-मिट्टी साफ करते, बार-बार उंगलियों से रसोई की फर्श, खाने की मेज वगैरह पर धूल के कण जांचते देखे जाते हैं। यह दरअसल, एक प्रकार का मनोविकार है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जब व्यक्ति के मन में साफ-सफाई का विचार घर कर लेता है, तो वह एक आदत का रूप ले लेता है और वह उसे बार-बार दुहराता रहता है। ऐसे मनोविकार को आॅब्सेसिव कंपल्सिव डिसॉर्डर यानी ओसीडी कहते हैं।

ऑब्सेसन यानी आवेश और कंपल्सन यानी विवशता या मजबूरी। ऐसे मनोरोगी एक विचार से इस कदर बंध जाते हैं कि वे उसे दोहराते रहते हैं। उनमें संक्रमण का भय, अपने या दूसरों को नुकसान पहुंचने का भय, आक्रामकता, इच्छाओं पर नियंत्रण न होना, यौन संबंध के बारे में जरूरत से ज्यादा सोचना, अत्यधिक धार्मिक निष्ठा आदि इस मनोविकार के लक्षण हैं। एक अध्ययन के मुताबिक भारत में एक करोड़ से ऊपर लोग इस मोनविकार के शिकार हैं।

हालांकि बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जिन्हें पता ही नहीं कि अधिक साफ-सफाई से हमारे स्वास्थ्य के लिए जरूरी अच्छे बैक्टीरिया भी नष्ट हो जाते हैं और फिर उसकी वजह से बीमारियां पैदा होती हैं। एक नए शोध में यह जानकारी सामने आई है कि अधिक साफ-सफाई और संक्रमण आदि से बचने के एहतियाती उपायों के चलते बच्चों में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां पैदा हो रही हैं। आदिवासी इलाकों में रहने वाले बच्चों की अपेक्षा ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बच्चों में बीमारियां अधिक देखी गई हैं। इसी तरह शहरी बच्चों में ग्रामीण बच्चों की अपेक्षा अधिक बीमारियां देखी गई हैं। इसकी वजह है कि हमारे पेट में पाचन संबंधी गतिविधियों में मदद करने के लिए जिन बैक्टीरिया की जरूरत होती है, वे भी सफाई के कारण समाप्त हो जाते हैं।

सफाई से बीमारियों का खतरा

हर जीवाणु और बैक्टीरिया नुकसानदेह नहीं होता। मगर आमतौर पर लोग मान लेते हैं कि बैक्टीरिया का मतलब बीमारी फैलाने वाला होता है। इसलिए खासकर शहरी जीवन में रोज फिनायल आदि से पूरे घर की सफाई होती है। तरह-तरह के कीटाणुनाशक सुगंधित पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। मगर एक नए शोध में बताया गया है कि ‘जर्म फ्री लाइफस्टाइल’ की वजह से बच्चों में कई तरह के कैंसर का खतरा बढ़ रहा है।

यह अध्ययन ब्रिटेन के कुछ प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने किया है। यह तो सभी को पता है कि रोगों से लड़ने में हमारे शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली यानी इम्यून सिस्टम काम आता है। व्यक्ति की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, उसकी प्रतिरोधक प्रणाली तरह-तरह के वायरस और बैक्टीरिया से लड़ कर और जीत कर मजबूत होती रहती है। इंस्टीट्यूट आॅफ कैंसर रिसर्च के प्रोफेसर मेल ग्रीव्स के अनुसार साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखने के कारण जब आप बच्चों को जीवाणु और बैक्टीरिया की पहुंच से बिल्कुल दूर रखते हैं, तो बच्चों की प्रतिरोधक प्रणाली जरूरी जीवाणु और बैक्टीरिया से लड़ने की क्षमता नहीं विकसित कर पाती है।

दो तरह के जीवाणु

जीवाणु दो प्रकार के होते हैं- एक बुरे जीवाणु, जिनके कारण शरीर को तरह-तरह की बीमारियां होती हैं और दूसरे अच्छे जीवाणु जो परोक्ष रूप से शरीर को स्वस्थ रखने में हमारी मदद करते हैं। शोध के मुताबिक समाज के उन्नत और उच्च श्रेणी के लोगों में ब्लड कैंसर के ज्यादा मामले पाए गए हैं। जाहिर है कि आधुनिक जीवन-शैली इस रोग का कारण हो सकती है। प्रो. ग्रीव्स के अनुसार जन्म के पहले साल में अगर शिशु का वास्ता अच्छे जीवाणु और कुछ बुरे जीवाणु से नहीं पड़ता है, तो उसकी प्रतिरोधक प्रणाली इस तरह के वायरस से लड़ने के लिए तैयार नहीं हो पाती है।

इसी वजह से जब अचानक बच्चे किसी जीवाणु के संपर्क में आते हैं, तो उनकी प्रतिरोधक प्रणाली काम करना बंद कर देती है या सक्षम साबित नहीं हो पाती। इस तरह उसे कई तरह की परेशानियां शुरू हो जाती हैं। प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने से सबसे ज्यादा खतरा रक्त कैंसर यानी ल्यूकीमिया का होता है। यह कई तरह के संक्रमण फैलने की वजह से हो जाता है। इसका सबसे ज्यादा खतरा बीस साल से कम उम्र के बच्चों को होता है। इससे हर साल हजारों बच्चे मर जाते हैं।

ध्यान रखें

इस अध्ययन में भले बताया गया है कि साफ-सफाई के कारण बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है, उसका श्रीर कई तरह के बैक्टीरिया से नहीं लड़ पाता है। मगर इसका मतलब यह नहीं कि बच्चों की साफ-सफाई पर बिल्कुल ध्यान न दें। दरअसल, इसका खतरा उन लोगों को होता है जो जीवाणु और बैक्टीरिया के प्रति हद से ज्यादा सचेत रहते हैं और बच्चों पर कई तरह की पाबंदियां लगाते हैं। इसलिए बच्चों के पालन-पोषण में अतिरिक्त सफाई का खयाल रखना भी ठीक नहीं।
’बच्चों को दिन भर घर में ही बंद करके न रखें। उन्हें आउटडोर गेम यानी प्रकृति के संपर्क में रह कर खेलने-कूदने का अवसर जरूर उपलब्ध कराएं। उन्हें पार्कों, खेल के मैदानों में अवश्य खेलने को भेजें। पर बरसात के दौरान थोड़ा सचेत रहें। बरसात के समय खराब बैक्टीरिया का हमला कुछ अधिक बढ़ जाता है।
’बाग-बगीचों, पार्कों, खुले मैदानों में खेलने-कूदने से विटामिन एन मिलता है, जो बच्चों के मानसिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
’धूप से विटामिन डी मिलता है, जो हड््िडयों की मजबूती और विकास के लिए जरूरी है।

ओसीडी का निदान

जिन लोगों में साफ-सफाई की हद तक सनक दिखाई देती है, उनका इलाज संभव है। इसके लिए मनोवैज्ञानिकों से सलाह ली जा सकती है। परिवार के लोगों और मित्रों को भी ऐसे लोगों को उनके मनोविकार से बाहर निकालने का प्रयास करना चाहिए।

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