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आधी दुनिया: सौंदर्य उद्योग और स्त्रियां

कोई कह सकता है कि यदि औरतों में सुंदर दिखने की चाह बढ़ी है, तो किसी को क्या तकलीफ। सच बात है। लेकिन यह जरूर जानना चाहिए कि सौंदर्य की यह लाठी औरतों को उसी गड्ढे में धकेलती है जिससे निकलने के लिए वे अरसे से छटपटा रही हैं।

Author Published on: November 10, 2019 5:59 AM

क्षमा शर्मा

गांधीजी की डेढ़ सौवीं जयंती मनाई जा रही है। गांधी जी औरतों की शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। वह पर्दा प्रथा और बाल विवाह के भी खिलाफ थे। लेकिन उन्हें भारतीय स्त्रियों का सजना-संवरना, घर गृहस्थी में जीवन खपा देना और आभूषण प्रेम बिल्कुल पसंद नहीं था। उनका कहना था कि जो स्त्रियां सजती-संवरती हैं वे अपने को पुरुषों की भोग्या बना देती हैं। वह यहां तक कहते थे कि स्त्रियों को अपने पति के लिए भी नहीं सजना-संवरना चाहिए। अब कोई कह सकता है कि गांधी जी कौन होते थे, औरतों को शिक्षा देने वाले। यह औरतों की चुनने की आजादी और पसंद-नापसंद का अपना मामला है कि वे क्या पहनें और कैसे रहें। अगर वे खुद को सुंदर दिखाना चाहती हैं तो भला किसी को कोई शिकायत क्यों होनी चाहिए।

गांधी जी को गुजरे जमाना बीत गया। जिस स्त्री शिक्षा का उन्होंने समर्थन किया था, आज स्त्रियों के लिए यह एक सहज- स्वीकृत तथ्य हो चला है कि स्त्रियों को पढ़ना चाहिए। लेकिन पढ़ने से भी ज्यादा यह बात सर्वमान्य हो चली है कि लड़कियों, महिलाओं को हमेशा सोते-जागते, जिम में जाते, दफ्तर में, बाहर , उत्सव में, त्योहार के वक्त यानि कि हमेशा सुंदर ही सुंदर दिखना चाहिए। स्त्रियों की इसी कामना ने सौंदर्य उत्पादों के बाजार को बेतहाशा बढ़ाया है। बल्कि कहना चाहिए कि स्त्री सशक्तिकरण के हर नारे को सौंदर्य उत्पाद और उपभोक्ता ब्रांडस ने काबू कर लिया है। दुनियाभर में फैला इनका व्यापार अरबों – खरबों डालर का है।

यह पिछले दिनों का ही दृश्य है। दिल्ली की एक मशहूर त्वचा विशेषज्ञ का क्लीनिक। एक बार की फीस बारह सौ रुपए। मरीजों का नम्बर अस्सी तक जा पहुंचा है और अभी दिन के बारह ही बजे हैं। दोपहर में कुछ देर अवकाश के बाद क्लीनिक देर रात तक खुलेगा। तब हो सकता है कि अस्सी मरीजों की संख्या डेढ़ सौ तक जा पहुंचे। इन मरीजों में निन्यानवे प्रतिशत महिलाएं हैं। इनमें भी युवा लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा है। उम्र दराज औरतें भी हैं। बहुत सी लड़कियां अपनी माताओं के साथ भी आई हैं। ये सभी शिक्षित हैं। अंग्रेजी बोल रही हैं। अधिकांश नौकरीपेशा भी हैं। इनमें से अधिकांश को कोई रोग नहीं है। ये सब अपने को और अधिक सुंदर दिखाने और बनाने के लिए यहां आई हैं। कोई अपनी त्वचा पर पड़ गई झुर्रियों को मिटवाना चाहती है। किसी के चेहरे पर एक छोटा काला दाग हो गया है। किसी को आंखों के नीचे आ गए काले गड्ढे या किनारों पर पड़ी क्रो लाइंस को हटवाना है। किसी को अपने चेहरे का मस्सा पसंद नहीं।

जब से चैनल्स ने घर-घर जगह बनाई है, अपने दर्शकों के रूप में औरतों को तलाशा है, तब से उन पर आनेवाले विज्ञापनों ने मामूली लड़कियों के मन में यह बात कहीं गहरे बिठा दी है कि उनके चेहरे पर झुर्रियां नहीं होनी चाहिए। उनके बाल चमकीले लहराते हुए होने चाहिए। उनकी त्वचा रूखी नहीं होनी चाहिए। एक मशहूर लाइन अकसर सुनाई देती है कि उसकी त्वचा से तो उसकी उम्र का पता ही नहीं चलता। हर लड़की चाहती है कि वह सुंदर ही नहीं सबसे सुंदर दिखे। इस सुंदर दिखने में एक चाह यह भी है कि जो देखे खिंचा चला आए। और हर उम्र में बस वह किशोरी ही दिखाई दे।

लड़कियों को सुंदर दिखना चाहिए यह बात आज से नहीं हमेशा से सुनाई देती रही है। सौंदर्य के तथाकथित मानकों ने विवाह के बाजार में लड़कियों की कीमत घटाई- बढ़ाई है। कल भी तथाकथित असुंदर की जगह नहीं थी, आज भी नहीं है। अब सिर्फ चेहरा ही सुंदर नहीं होना चाहिए,हाथ, पांव, बाल, नाखून और सबसे अधिक त्वचा पर जोर है। यही नहीं कोई लड़की सांवली भी नहीं दिखना चाहती। गोरेपन की क्रीमों ने इस रंगभेद को और बढ़ाया है। फिर कॉस्मेटिक उद्योग ने अपने से बड़ी उम्र की औरतों को भी यह बताकर जोड़ा है कि सुंदर दिखना उनका अपना अधिकार है। उम्र से सौंदर्य का कोई वास्ता नहीं। उम्र तो एक नंबर भर है। आप हर उम्र में सुंदर दिख सकती हैं, जैसे कि अभिनेत्री रेखा, हेमामलिनी या पचास से अधिक की माधुरी दीक्षित।

इन दिनों कॉस्मेटोलाजिस्ट के पास सत्तर- पचहत्तर साल की स्त्रियां भी अपने हाथों की झुर्रियों , अपने जबड़े को ठीक कराने के लिए पहुंचती हैं। पेडीक्योर और मेनीक्योर तो हर औरत के लिए जरूरी बना ही दिया गया है। इसीलिए नए नारे चल पड़े हैं कि सेवेन्टी इज न्यू फोर्टी। या कि फिफ्टी इज न्यू टवेंट्ी। कब से यह नहीं सुना कि किसी स्त्री की पहली जरूरत उसका ज्ञानवान होना है। ज्ञान को सौंदर्य से जोड़ दिया गया है। सौंदर्य ही औरतों के जीवन का प्राथमिक कर्तव्य बना दिया गया है। बुद्धिमती स्त्री न भी हो तो चलेगी।

कोई कह सकता है कि यदि औरतों में सुंदर दिखने की चाह बढ़ी है, तो किसी को क्या तकलीफ। सच बात है। लेकिन यह जरूर जानना चाहिए कि सौंदर्य की यह लाठी औरतों को उसी गड्ढे में धकेलती है जिससे निकलने के लिए वे अरसे से छटपटा रही हैं। उत्पादों के विज्ञापन भले ही लगातार उन्हें यह बताएं कि इन चीजों के इस्तेमाल से वे चाहें तो मुक्त होकर आसमान में उड़ सकती हैं लेकिन इसमें महीन रेखा वही छिपी है कि औरतों का काम आसमान में उड़ना नहीं किसी न किसी बहाने पुरुषों को अपनी ओर आकर्षित करना होता है। यानि कि उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य पुरुषों को रिझाना है। जरा बताइए कि पुरानी जमाने की औरतों के मुकाबले आज की औरत की स्थिति में कहां फर्क हुआ। पहले भी वह सौंदर्य की लाठी से पिट रही थी आज भी पिट रही है। हां आज इसे वह अपनी ताकत समझ रही है क्योंकि उत्पाद बनाने वाले इसी को असली महिला सशक्तिकरण (वुमैन एम्पावरमेंट) कहते हैं कि कितनी बड़ी संख्या में औरतें फलां क्रीम, फलां नेल पालिश, फलां ब्लीच इस्तेमाल करके ताकतवर बन रही हैं।

लेकिन सुंदर दिखने की चाहत इतनी ज्यादा है कि ज्ञानवान कोई नहीं बनना चाहता है। सालों पहले इस लेखिका की एक पत्रकार मित्र ने कहा था कि अगर आप किसी इंटरव्यू बोर्ड में हों तो उस लड़की को चुनेंगी जो ठीक से तैयार होकर आई है या उसे जो ठीक से तैयार होकर तो नहीं ही आई फूहड़ भी दिखती है। मैं तो उसे ही चुनूंगी जो ठीक से तैयार होकर आई है। दफ्तर में कौन किसी फटे चीथड़े पहनकर आने वाली को बैठने देगा।

सजने-संवरने के लिए पैसों की जरूरत होती है। यानि कि जो लड़की साधारण परिवार से आई है, जिसकी जेब में इतने पैसे नहीं कि वह इंटरव्यू देने के वक्त खूब सज-संवरकर जा सके, तो क्या उसे नौकरी ही नहीं मिलेगी। कम साधनों के बावजूद उसका पढ़ना लिखना व्यर्थ जाएगा। जिस सौंदर्य के कोड़े से औरतें हमेशा लहू -लुहान हुई थीं, उसी को उन्होंने हार बना लिया है। दरअसल तो स्त्रियों को कॉस्मेटिक उद्योग की प्रयोगशाला बना दिया गया है।

 

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