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कहानी: चैन

ऐसी ही एक अंजान सी बुझी-बुझी सी शाम को वह अपने घर से निकलकर बाहर सड़क पर आ गई थी। उसे नहीं पता था कि जाना कहां है। वह तो बस घर से निकल आई थी।

Author December 30, 2018 1:16 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रितपाल कौर

ऐसी ही एक अंजान सी बुझी-बुझी सी शाम को वह अपने घर से निकलकर बाहर सड़क पर आ गई थी। उसे नहीं पता था कि जाना कहां है। वह तो बस घर से निकल आई थी। उस घर से, जहां जाते हुए उसका मन हमेशा ही बुझने लगता था। उस घर में वे सारे ऐशोआराम थे, जिनकी किसी अक्लमंद आदमी को जरूरत हो। मगर उस घर में चैन नहीं था। चैन उस घर की देहरी लांघकर अंदर आते हुए अक्सर डर जाता था और बाहर से ही उलटे पांव लौट जाता था।
कई बार उसने भी कोशिश की कि दफ्तर से घर लौटते हुए रास्ते में मेट्रो के दरवाजे से सटा पसरा हुआ चैन का एक लम्हा तोड़कर अपने साथ घर ले चले।
वहां से तो वो उखड़कर उसके हाथ में आ जाता था। रास्ते भर जब वो पैदल चलती हुई प्लेटफार्म से निकलती थी, मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियां उतरती थी। उसके बाद घर तक का रास्ता कभी ऑटो से तो कभी रिक्शे से तय करती थी, चैन उसके हाथों में सधा हुआ बैठा इंतजार करता था उसके घर पहुंच जाने का।
रिक्शे या ऑटो से उतरकर जब वो अपनी सोसायटी के अंदर आती तो उसके हाथों में बैठे चैन को खलबली सी महसूस होने लगती। चैन का दिल धड़कने लगता और उसके हाथों में कंपन होने लगता। यहां तक कि उसके हाथों में पड़ी चार सोने की चूड़ियों तक भी ये कंपन पहुंच जाता। लिफ्ट तक पहुंचते-पहुंचते यह कंपन बढ़ जाता। और फिर जैसे ही वो अपने घर का ताला खोलने लगती, ये कंपन इतना तेज हो जाता कि उसके लिए चैन को अपने हाथों में समेटे रखना मुश्किल हो जाता। अक्सर तब तक उसका पति घर नहीं आया होता है। तो ताला खोलते-खोलते चैन एक तेज कंपन के साथ उसके हाथों से छूट जाता और लिफ्ट के सामने की बालकनी से उड़कर हवा में कहीं विलीन हो जाता।

जिस दिन पति घर पर होता तब उसे ताला नहीं खोलना पड़ता था। ऐसे में चैन को संभलने का मौका ही नहीं मिल पाता। वह उसके हाथों में बसा-बसा घर के अंदर तो दाखिल हो जाता मगर जैसे ही पति को सामने सोफे पर बैठा हुआ देखता और उसका सवाल हवा को चीरता हुआ सामने की हवा को कुरेदता वहां पहुंचता, ‘आज फिर देर से आई तुम? कहां थी अब तक? कहां गुलछर्रे उड़ा रही थी?’इस सवाल के जवाब में हर बार उसका एक ही जवाब होता था, ‘मैं कहां थी? ऑफिस से सीधे ही आ रही हूं। मेट्रो छूट गई थी।’ या फिर, ‘देर से ऑफिस से निकल पाई। सीधे घर ही आ रही हूं। आपको अभी नाश्ता देती हूं।’ घबराई हुई सी वह तेजी से बैग लिए ही रसोई की तरफ बढ़ जाती। जो इस ‘टू बीएचके’ में ओपन ही था। ऐसे में उसके स्वर में जो दीन-हीन भाव और घबराहट समाई होती उसे महसूस करके कुछ देर को तो चैन द्रवित होकर उसके पास रुकता। उसके हाथों से निकलकर रसोई के स्लैब पर माइक्रोवेव अवन के ऊपर जाकर टांगे फैलाकर बैठ जाता। उसे उस अबला नारी पर खासी दया आती और कुछ गुस्सा भी आता कि आखिर क्यों वह इस तरह दब्बू बनकर डर के जीती है। मगर जल्दी ही पति की तरफ से हो रही बाणों की बौछार से उकताकर चैन रसोई की खिड़की से उड़कर हवा में गायब हो जाता। उसके लिए शीशा बंद हो या न हो, कोई फर्क नहीं पड़ता था। चैन की फितरत ऐसी है कि वो कहीं से भी कभी भी उड़कर कहीं भी जा सकता है। दरअसल चैन ही इस दुनिया का एक ऐसा बाशिंदा है जो अपनी मर्जी का मालिक है। बाकी तो सब उसके गुलाम हैं। कम से कम चैन तो यही सोचता और समझता है। तो आज शाम वह लगभग उसी वक्त घर से निकल आई है जब चैन ने खिड़की की राह पकड़ी थी। और दिनों की तरह आज भी मेट्रो से चैन उसके साथ-साथ घर तक आया था। बदकिस्मती से आज पति के दफ्तर में पूरे दिन की छुट्टी थी। पति दिनभर घर में पड़ा सोफा तोड़ता रहा था। सुबह जो कुछ भी वो दफ्तर जाने से पहले पकाकर गई थी, वो सब भी खा-पचा चुका था। ऐसे में पति को अपनी मां की याद शिद्दत से आती थी। जो एक कस्बे में रहती थीं पिता के साथ। वे दिनभर घर में ही रहती थीं। शायद इसी वजह से दिनभर उसकी और उसके पिता की फरमाइशों पर तरह-तरह के खाना और नाश्ता बनाकर खिलाती थीं। इसमें उनको आनंद भी आता था। इसके अलावा वे थक भी जाएं तो इसे अपनी ड्यूटी मानते हुए थकान और बीमारी की भी परवाह नहीं करती थीं। थकना तो शायद उनके लिए कुछ मायने रखता ही नहीं था। पति का आज का पूरा दिन तो अच्छा कट गया। मगर शाम होते-होते जब उसे दूसरी बार भी चाय खुद बनानी पड़ी और नाश्ते के रूप में सिर्फ बिस्कुट ही मिले तो वह झल्ला उठा। उठकर रसोई में कुछ नमकीन नाश्ता या कुछ और तलाश करने की सोच ही रहा था कि तभी बाहर के दरवाजे में चाबी घूमने की आवाज सुनाई दी।

सुबह जब वो दोनों के लिए खाना-नाश्ता बनाकर और घर के बाकी काम निपटाकर अपने दफ्तर के लिए निकली थी तो वह सो ही रहा था। उसका छुट्टी को पूरी तरह तफरीह के साथ मनाने का इरादा था। सो वह उसको उठाए बिना उसकी नींद में खलल डालने की जुर्रत किए बिना, ताला लगाकर ही चली गई थी। पति दिन भर सोफे और बिस्तर के आसपास ही रहा सो ताला खोलने की उसे जरूरत ही महसूस नहीं हुई। आज जब दफ्तर से निकलने का समय हुआ तो बॉस ने एक जरूरी लेटर के लिए उसे बुला लिया। हालांकि लेटर छोटा सा ही था और पंद्रह मिनट में ही उसने उसकी हार्ड कॉपी बॉस के सामने रखकर जाने की इजाजत ले ली थी मगर तब तक भी देर तो हो ही चुकी थी। उसने फोन में टाइम देखा तो अंदाजा लगा लिया कि इसी वक्त सीधे मेट्रो स्टेशन की तरफ लपक लेगी तो मेट्रो पकड़ पाएगी। इसी हड़बड़ी में उसने बाथरूम जाना भी मुल्तवी कर दिया, हालांकि उसे पेशाब जाने की जरूरत महसूस हो रही थी। अब जब वो हड़बड़ी में बाथरूम जाना भी छोड़कर मेट्रो स्टेशन पहुंची तो उसकी नजरों के सामने ही उसकी रोज वाली ट्रेन के दरवाजे बंद हो गए। अब उसके पास अगले दस मिनट इंतजार करने के सिवा कोई रास्ता नहीं था। डर के मारे स्टेशन का बाथरूम भी इस्तेमाल करने नहीं गई कि कहीं वहां देर हो गई तो अगली ट्रेन भी छूट जाएगी। अब जब वह घर का ताला खोल रही थी तो हाथों में इत्मीनान से रखे चैन को सहलाते हुए पहला खयाल यही था कि भीतर जाते ही सीधे बाथरूम जाना है और अपना ब्लैडर खाली करना है। मगर अंदर तो पति था और थी बेचारगी और बेइज्जती। ब्लैडर चीख-चीख कर कह रहा था, ‘मुझे खाली करो।’ मगर कान पति का एकालाप सुन रहे थे। जो सुदूर कस्बे में रहने वाली मां के व्यंजनों की गाथा गाते हुए शायद कई हजारवीं बार दोहरा रहे थे कि वहीं की कोई लड़की ले आता तो ये दिन न देखना पड़ता। मेम साहब के दफ्तर से आकर नाश्ता बनाकर देने का इंतजार न करना पड़ता।आज भी जब पति ने देर से आने की वजह पूछी थी, तो उसने बता दी थी और उसके साथ ही बाथरूम जाना मुल्तवी करसीधे रसोई की तरफ लपकी थी तो अंदर बैठा एक कोई सिर उठाकर पूछ बैठा था, ‘जाहिल औरत। शर्म होती तेरे अंदर तो इस चैन के साथ ही तू भी किसी खिड़की-दरवाजे में सेंध लगाकर निकल लेती।’

‘नहीं ऐसी बात नहीं है। मुझे ही खयाल रखना चाहिए था कि देर हो सकती है शाम का नाश्ता भी बनाकर ही रख जाती सुबह ही।’
‘अच्छा! उससे मसला हल हो जाता? वो नहीं पूछता फिर कि देर से क्यों आई? कहां गुलछर्रे उड़ा रही थी?’
‘अब पति है न। कह लेने दो। क्या फर्क पड़ता है?’ ‘अच्छा है। नहीं फर्क पड़ता तुम्हें। गैंडे की खाल मढ़ी हो न तुम।’
‘अब तुम भी मुझे खदेड़ो। सब मिलकर मुझे लताड़ो।’ वह रुआंसी हो आई थी।
अब तक ब्लैडर फटने को हो आया था। पति का एकालाप जारी था। उधर भीतर बैठा ये चैन का हितैषी अपना अलग ही राग अलापे हुए था।
इतना प्रेशर आज नहीं झेल पाई। दिन में एक सहयोगी से भी काम के बंटवारे को लेकर खासी बहस हो गई थी। वहां भी उसके दब्बू स्वभाव की वजह से उसने उसे दबाकर ज्यादा और मुश्किल काम उसके मत्थे मढ़ दिया था।
अचानक उसने पकौड़ों के लिए जो बेसन घोला था, उसे उठाकर बेसिन में जोर से पटक दिया। हाथ में आलू था जिसे छील रही थी। प्याज पहले ही गोल-गोल लच्छों में काट लिया था। अधछिले आलू और प्याज के लच्छों को उठाकर डस्टबिन में डाला। बैग उठाया और खिड़की की तरफ बढ़ी। दिल किया कि इसी खिड़की से कूद जाए। मगर फिर खुद को संभाला। सोचा कि इस तरह नीचे लहूलुहान पड़ी उसकी लाश को देखकर उसके मां-पापा को बहुत तकलीफ होगी। सो तेज कदमों से ब्लैडर के दबाव को झेलते हुए दिमाग की फट-फट जाती नसों को किसी तरह संभालते हुए अभी तक एकालाप में लगे पति के बगल से होती हुई दरवाजे की तरफ बढ़ गई। ये नहीं देखा कि भौचक सा हुआ पति उसे जाते हुए देख रहा था। उसका वाक्य अधूरा ही उसके मुंह में धरा रह गया था। उठकर उससे जाने की वजह तक नहीं पूछ पाया था। यकीनन उसके मन की आग की आंच आज पति तक पहुंच गई थी। मगर अब वो चैन की तलाश में सड़क पर भटक रही थी। सोसायटी से बाहर निकलते ही पेशाब जाने का बंदोबस्त यों हो गया था कि वहां पास ही सुलभ शौचालय था। पांच रुपए का सिक्का देकर एक साफ-सुथरा बाथरूम उसे मिल गया था। सोसायटी में किसी से इतनी जान-पहचान नहीं थी कि बाहर आने से पहले किसी का बाथरूम इस्तेमाल कर सके। घर से निकल तो आई है। मगर अब उसे बार-बार छूटकर उड़ जाने वाले चैन की शिद्दत से तलाश है। इस वक्त सिर्फ यही एक काम है जो उसे करना है। चैन के बगैर जीना उसे दूभर लग रहा था। तभी खयाल आया कि चैन उसे अक्सर मेट्रो के दरवाजे पर पसरा हुआ मिलता है। वहीं चलकर उसे साथ लिया जाए। फिर आगे के बारे में सोचा जाए। लेकिन आज जिस तरह वह गया है क्या वहां भी मिलेगा उसे?

अक्सर ऐसा होता था कि जब वह खुद से, अपनी जिंदगी से उकता जाती थी तो कई दिनों तक चैन उसे मेट्रो के दरवाजे से लगा हुआ नहीं मिलता था। वह मायूस घर लौटती थी। कुछ मिनटों का चैन का साथ भी तो नहीं मिल पाता था। आज तो चैन खासा उचाट होकर लगभग भागता हुआ खिड़की से उड़ा था। उसके मेट्रो के दरवाजे से लगा होने की उम्मीद भी कम ही थी।
यही सोचती हुई वह चली जा रही थी। जाना कहां था ये मालूम नहीं था। वर्ना रिक्शा या ऑटो ही कर लेती। उसे तो बताना ही पड़ेगा न कि जाना कहां है। ये अब खुद को ही न पता हो तो आदमी क्या करेगा? पैदल ही तो चलेगा, जब तक चल सके। अजनबी सड़कों पर आज जिस तरह वह भटक रही है। वो नहीं जानती उसकी इस भटकन का अंजाम क्या होने वाला है। चैन उसे कहीं मिलेगा भी? और अगर मिला भी तो क्या उसके उस घर में उसके साथ जाने को राजी होगा जहां से वो हर बार उसके हाथ से निकलकर उड़ जाता है।
आज एक बात तो उसके मन में बिल्कुल शीशे की तरह साफ हो गई है कि चैन के साथ न होने की सूरत में उसका जी पाना लगभग असंभव सा है। वो हर रोज बेचैनी से करवटें बदलते हुए रात-रात भर जागते हुए, आने वाले दिन के आतंक के साए में जीते-मरते हुए जीवन नहीं काट सकती। उसे चैन की संगत हर हाल में चाहिए। इसके लिए उसे जो करना पड़ेगा वो करेगी।
मिसाल के तौर पर आज इस वक्त घर से निकल आई है। भटकते हुए कई घंटे हो गए हैं। फोन कई बार बजा। उसने बैग से निकालकर देखा ही नहीं। अब फोन भी चुप हो गया है। शायद बैटरी खत्म हो गई है। या फिर पति को समझ आ गया है कि वो नहीं आएगी। मगर जाएगी कहां?
प्यास लग रही है। भूख भी लगनी शुरू हो गई है। पांव थककर चूर हो गए हैं। पीठ और कमर अकड़ गई है। एक-एक कदम चलना दूभर हो गया है। ऐसा नहीं कि किसी जंगल में है। चारों तरफ खाने-पीने के खोखे और रेस्तरां हैं। कहीं भी रुककर खा-पी सकती है। अंदर जाकर बैठ भी सकती है। मगर कब तक? आखिर में एक घर तो चाहिए होगा ही। हां! होटल में जा सकती है। कमरा ले सकती है। के्रडिट कार्ड से या डेबिट कार्ड से पेमेंट कर सकती है। नौकरी करने का इतना तो फायदा है। मगर बाद में जब घर जाएगी। जब पति हिसाब मांगेगा तो कितनी लानत-मलानत होगी इस बात को लेकर। ये भी भान है। चैन तब तक मिल भी गया तो फिर उड़ जाएगा खिड़की से।
क्या करे? कहां जाए? कैसे जिंदा रहे?

भूखी-प्यासी सड़क पर चल तो रही है मगर दिमाग कई स्तरों पर घूम रहा है किसी और ही राह पर। दिल तो है ही नहीं कहीं। दिल को चैन की तलाश है। उसके बिना मरगिला सा होकर उजड़ा हुआ पड़ा है। शायद पुराने से बैग की ही किसी लिजलिजी सी पॉकेट में। या फिर सस्ती ब्रा के स्ट्रैप में उलझा है। कितना शौक था उसे महंगी डिजाइन वाली ब्रा पहनने का। मगर शादी के बाद से उसके लिए तरस गई है।
पति का कहना है, ‘पहनकर किसको दिखाना है वो सब? मुझे ही तो। मुझे पता है जो खजाना है तुम्हारे पास। मुझे रिझाने की कोशिश करनी बेकार है। पत्नी हो तो सो लेता हूं तुम्हारे साथ, वर्ना इस ठंडी शिला को छुए तक न कोई।’
बर्फ से नहा जाती है ऐसे में। याद आते हैं कॉलेज में आगे-पीछे घूमते लड़के। उनमें से ही किसी एक के साथ घर बसा लेती तो शायद चैन होता बगल में। अब तो सिर्फ सोच ही सकती है। कर तो कुछ नहीं सकती।
शाम कब की खत्म हो गई है। रात के इस पहर में सड़क पर आवाजाही तो है मगर कम। एनसीआर के इस इलाके में भीड़-भाड़ खासी होती है देर रात तक। मगर अब साढ़े बारह बज चुके हैं। रौनक कम हो गई है। दुकानें लगभग बंद हैं। 24 घंटे चलने वाली कुछ दुकानें खुली हैं और खुली है देसी शराब के ठेके की एक दुकान, जहां लोग बाग कतार में खड़े भीड़ लगाए हैं। उसी ठेके के सामने दो खोखे हैं, जहां रात भर ऑमलेट, ब्रेड, कबाब और रोटी मिलती है। यहां भी जवान लड़कों और एकाध लड़की ने डेरा लगा रखा है। ये लोग खुलेआम शराब पीते हैं और साथ में चटपटा भोजन करते हैं।
उसे लगता है शायद यहां उसे चैन का ठिकाना मिल जाए। यही सोच कर वह इधर चली आई है।
अभी वह कुछ ही कदम दूर थी इस खोखे से कि एक तेज आवाज उसके कानों में पड़ी, ‘ओए, तूने समझ क्या रखा है? मैं क्या डरता हूं तेरे से? साले। तेरी औकात ही क्या है? साले शराब तो रोज मेरे पैसे की पीता है। मुझसे ही पंगा लेगा? मुझे धौंस दिखाएगा?’
दो युवक आमने-सामने खड़े हैं। एक के पास एक युवती भी खड़ी है। उसे रोक रही है मगर दोनों ही गाली-गलौज करते हुए गुत्थम-गुत्था होने को उतारू हैं।
एकाएक सब तरफ शोर उठ गया है।

‘रोको-रोको सालों को। यहां दंगा नहीं करने का।’
‘साले पीते क्यों हैं, अगर पचानी नहीं आती।’
‘पीते क्यों हैं अगर संभाली नहीं जाती?’
‘निकलो यहां से सालों। हमारा मूड मत खराब करो।’
‘अरे यार लड़ने दो न। मजा रहेगा। देखेंगे मुफ्त का तमाशा।’
‘हां यार। मजा आएगा। करने दो इनको कुश्ती। हमारा क्या है? मजा लेंगे। मुफ्त की पिक्चर।’
‘अरे नहीं यार। पंगा हो जाएगा। पुलिस आ जाएगी।’
मगर पुलिस तो आ चुकी थी। उसने देखा पास ही एक पीसीआर आ खड़ी हुई थी। उसमें से दो पुलिसकर्मी निकल आए थे और इन सब की तरफ बढ़ रहे थे।
वो रुक गई। उसे यकीन हो चला कि हो न हो अब चैन आएगा ही आएगा। पुलिस जरूर निकाल लाएगी उसे कहीं से। न हो तो पीसीआर वैन से ही।
वह सोच ही रही थी कि उसने देखा चैन ने यहां से भी एक लंबी छलांग ली और सड़क के दूसरी तरफ बढ़ चला। वो भी लपक ली उसके पीछे। किसी ने भी उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया, न ही चैन की तरफ।
वे तो पुलिस और उन शराबी लड़कों और बीच-बचाव करती लड़की के बीच कहीं गुम हो गए थे। उसने सड़क पार करते हुए एक बार पीछे मुड़कर देखा। वहां कुछ लोग नहीं, बल्कि गालियों और दुर्भावनाओं का एक बड़ा सा बवंडर उठा हुआ था। आंधी-तूफान की तरह। उसमें सब कुछ बह गया था। उस बवंडर के अंदर ही वे दो लड़के, उनका बीच-बचाव करती हुई लड़की, तमाशाई भीड़ और पुलिस अधिकारी सहित पीसीआर वैन और लड़कों की गाड़ी के साथ-साथ ऑमलेट और ब्रेड वाला ठीया भी गुम हो गया था। उसने अपने सिर को झटका दिया। वो तो चैन की तलाश में निकली थी। इस तरफ ध्यान देना बेकार था। उसने जल्दी से खुद को सड़क पार करवाई। ऐसा कहना ही सही होगा क्योंकि सड़क पार करना इस वक्त इतनी रात गए भी खतरे से खाली नहीं है। चारों तरफ देखना-भालना होता है। खासकर रात के वक्त तो गाड़ी चलाने वालों को यह भ्रम रहता है कि उनके सिवा कोई और है ही नहीं सड़क पर। सो जैसे चाहो चलाओ। पुलिस से आजकल डरता कौन है भला? ऐसा होता तो उसे रात के इस वक्त चैन कहीं भी मिल ही जाता। मगर वो खुद मारा-मारा इधर-उधर घूम रहा था। कुछ इस कदर कि जहां उसे दिखता और वहां जब तक पहुंचती तो वो और आगे के लिए निकल चुका होता। चैन की तलाश में वह बेतरह थक चुकी थी। मगर चैन के बिना जीना भी तो दूभर था। उसे साथ लिए बगैर घर नहीं लौट सकती थी। उसे मिले बिना जी नहीं सकती थी। ये और बात थी कि देर रात यंू सड़क पर घूमने के लिए उसे कई तरह की सफाई देनी होगी अपने पति को। पति का खयाल एक बार फिर आ गया। उसके साथ ही बेसन का घोल और डस्टबिन में फेंके प्याज और आलू भी याद आ गए। दिल ने कहा घर लौट जाओ और नए सिरे से पकौड़े बनाकर पति को खिला दो। न हो तो हलवा भी बना लेना। उसका और अपना पेट भर जाए तो फिर खुद को भी उसके सामने परोस देना। वो नरम पड़ जाएगा। चैन तो सिर्फ एक छलावा है। ये कहां मिलने वाला है? उसके साथ उसके घर में तो किसी हाल में नहीं रहने वाला। शराब की दुकान के सामने से निकलकर वो आगे बढ़ गई। उसने नहीं देखा वहां लाइन में पति खड़ा था। अपने आगे खड़े हुए आदमी से कह रहा था, ‘यार कहीं चैन नहीं। न दफ्तर में, न घर में। शाम को बीवी नाराज होकर मायके चली गई। फोन भी नहीं उठा रही। कल तक गुस्सा शांत होगा तो लौट आएगी। मगर तब तक क्या करूं? उसके बिना घर में चैन नहीं।’

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