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कहानी: मुख्यालय

पुलिस दस्ते के साथ सेक्टर मजिस्ट्रेट साहबान अपने-अपने क्षेत्र में पहुंचेंगे। कानून और शांति-व्यवस्था हर सूरत में बनाए रखनी है। किसी भी तरह का कोई अंदेशा हो तो जिला निर्वाचन अधिकारी को अविलंब सूचित किया जावे।

Author December 9, 2018 6:11 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

रमेश चंद्र मीणा

नींद आने के बजाय दूर चली गई थी। रात करवटें बदलते बीती। सारे उपाय कर लेने के बावजूद नींद नहीं आ रही थी। प्रोफेसर राघवेंद्र वर्मा के साथ ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है, पर यह रात सामान्य नहीं थी। चिंता हो दिमाग में तो नींद कहां आ पाती है। सरकारी कर्मचारी की चुनाव में ड्यूटी लगना ही नींद उड़ाने के लिए काफी है। प्रोफेसर वर्मा अपने मुख्यालय से दूर बीहड़ गावों में निकल आए, अब वे मुख्य सड़क से पूरब की तरफ जाने वाली सड़क पर मुड़े। कच्चे-पक्के रास्ते पर हिचकोले खाती क्रूजर आगे बढ़ रही थी। जब कभी कोई वाहन आगे होता तो धूल का गुबार उठता और गाड़ी के अदंर फैल जाता। शाहिद ड्राइवर ही नहीं, मालिक भी है, सो गाड़ी संभल कर चला रहा था।…

चुनाव ड्यूटी में नाम आते ही सरकारी कर्मचारी ऐसे चमकते हैं जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो। कई तरह से जोड़-तोड़ करने में लग जाते हैं। शर्मा जी की हालत पतली हो जाती है। जादोन साहब ने अपने लिए अस्पताल में बिस्तर आरक्षित करवा लिया है। खेमाराम अपने राजनीतिक सरोकारों से स्वयं तो बचते ही हैं, दूसरों का भी भला करते हैं। मगर वर्मा साहब अपवाद हैं, वे कभी ड्यूटी कटवाने के लिए लाइन में नहीं लगते।
कॉलेज का हाल जानने के लिए शेरसिंह को फोन लगाया- ‘इधर तो एक भी साथी नहीं है, सन्नाटा पसरा है बस महिलाएं हैं।’
‘मर्द मैदान में आ गए हों, तब घर में महिलाओं के अलावा कौन बचेगा?’
‘हां, ऐसा ही है।’ दोनों तरफ कुछ देर हंसी गूंजती रही।
मुख्यालय से बाहर निकलते ही शहर से अलग सजीव और सक्रिय दृश्य दिखने लगे। दूर-दूर तक खेत ही खेत। खेतों में जुताई होने से वातावरण में सोंधी खुशबू फैली हुई थी। नहरी कमांड क्षेत्र था, पक्की नहरों का जाल बिछा हुआ था। कुछ खेतों में रेलना चल रहा था। किसान खेतों में पानी देते नजर आ रहे थे।
विधानसभा का आखिरी सेक्टर है। मुख्यालय से साठ-पैंसठ किलोमीटर दूर पिछड़े गांव, ढाणियां और मजरे हैं। प्रोफेसर वर्मा जब पहले गांव में पहुंचे, तो स्कूल की खोज करनी पड़ी। गांव के एकदम पीछे झाड़-झंखाड़ों से घिरा तीन-चार कमरों का प्राथमिक राजकीय विद्यालय ऐसे दिखाई दिया, जैसे जमीन का पेट फाड़ कर बाहर निकला हो। बेतरतीब कपड़ों में, बेनूर शक्ल के ग्रामीण छात्र-छात्राएं परिसर में दिखाई पड़े। कुछ कमरों में धमाचौकड़ी मचाते हुए नजर आए। बाहरी व्यक्ति को देखते ही कुछ बालकों ने शिक्षक को खबर क्या दी, वह एकदम दौड़ा हुआ आया। डर और निरीहता पसरे चेहरे पर बरबस हंसी लाकर बाअदब दोनों हाथ जोड़ कर नमस्कार किया और तत्काल चिल्ला कर दो कुर्सियां लाने को कहा।
‘बूथ कौन-सा है?’
‘ये सामने रहा सर, लेकिन अभी लाइट नहीं है। रैंप टूटा हुआ है, ऊपर के अधिकारियों को समय पर सूचित कर दिया गया है।’
आवश्यक कागजी कार्रवाई करने के बाद अगले बूथ के लिए निकल पड़े। शाहिद ने गाड़ी चलाते हुए अनायास कहा, ‘सर कैसे कैसे मास्टर बन जाते हैं?’
‘कैसे से तुम्हारा क्या मतलब है?’
‘देखो न, पैरों में कैसी जूतियां पहनी हुई हैं। शक्ल से लगता है जैसे ढोर चरा कर आ रहा हो।’
वर्मा ने कुछ देर ठहर कर संयत स्वर में कहा, ‘नहीं, ऐसा नहीं है शाहिद। शक्ल और वेशभूषा कोई मायने नहीं रखती, शिक्षा और काम देखा जाता है। इस व्यक्ति ने प्रतियोगिता में कइयों को पीछे छोड़ा है। आज सरकारी नौकरी के लिए काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं। नौ स्कूलों में यही एकमात्र है, जहां हर वक्त मास्टर मौजूद है। शक्ल-सूरत से सुंदर हो, लेकिन काम ठीक से न करता हो, कपड़े अच्छे पहने, पर काम में ध्यान न हो तब?’
शाहिद ने गाड़ी की रफ्तार बढ़ा दी। उसका मकसद भी नहीं था बहस करना। वह तो एक तरह से आनंद में था। कुल इकतीस दिन उसकी गाड़ी चुनाव ड्यूटी में रहने से कोई चालीस-बयालीस हजार पक जाने वाले जो थे।

दूसरे स्कूल के बीएलओ ओमप्रकाश शर्मा ने तपाक से बताया, ‘सर, यह सेक्टर अधिकारी का यानी आपका मुख्यालय है। चुनाव तक जो भी बन पड़ेगा, मैं आपकी सेवा में हर तरह से हाजिर हूं। किसी तरह की परेशानी नहीं आने दूंगा।’
उच्च माध्यमिक विद्यालय के नाम में आदर्श भी जुड़ा हुआ था। कमरों में अंधेरा पसरा था। शौचालय था, न नल, न पानी की टंकी। ‘शर्मा जी आप कहां से हो?’ परिचय के लिए वर्मा जी ने पूछा।
‘सर पास ही गांव है। मेरी तो बस इसी वर्ष सेवानिवृत्ति है।… मैं आपका ही इंतजार कर रहा था। बाकी सभी चले गए हैं।’
‘यहां कितने का स्टाफ है?’
‘हेड मैम कोटा से हैं, बाकी पांच-छह मुख्यालय से हैं। मेरा घर दस किलोमीटर दूर गांव में है। महिला शिक्षिकाओं ने आने-जाने के लिए किराए की गाड़ी कर रखी है। सुबह आती हैं, दोपहर होते ही पंछियों की तरह अपने घोंसलों की ओर उड़ जाती हैं।’
बीएलओ शर्मा ने यकायक पूछ लिया, ‘सर आप किस विभाग में विराजते हैं?’
‘महाविद्यालय।’
जवाब सुन कर वह मुस्कराने लगा। अतिरिक्त विनम्रता के साथ वाणी में मिठास घोलते हुए बोला, ‘बहुत अच्छा है सर, आप तो हमारे गुरु हो। आपके दर्शन हुए।’
गांव में प्रवेश करते ही कुछ महिलाएं काम करती दिखीं। इक्के-दुक्के बुजुर्ग बैठे हुए मिले। गांव खाली-खाली से लगे। गांव ही नहीं, स्कूल भी वीरान-से, अंधेरे से घिरे हुए लगे। जो निजी स्कूलों की फीस अदा नहीं कर पाते हैं, वही यहां ठहरते हैं। शिक्षा का प्रकाश कितना फैल पाता होगा? जब अंधेरा घना हो, अंधेरा फैलने की गति बढ़ रही हो। स्कूलों के सभी शिक्षक प्रवासी पंछी-से लगते हैं, जो सुबह आते हैं, लंच करते हैं फिर उड़ने से पहले जैसे शाम होने भर का इंतजार करते हैं।
चुनाव प्रशिक्षण में बहुत सारे नियम उड़ेले गए थे। एसडीएम ने सेक्टर के दायित्व पर जोर देकर बताया कि चुनाव आपकी मुस्तैदी से ही संपन्न होगा। चुनाव में किसी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। पारदर्शिता, तटस्थता और कर्तव्यपरायणता की उम्मीद है। ओवर एक्शन एक बार नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन इन एक्शन बर्दाश्त नहीं होगा। आप किसी राजनीतिक पार्टी से कोई सरोकार नहीं रखेंगे। फेसबुक, वाट्सऐप पर किसी प्रतिनिधि को गलती से भी लाइक कर दिया, तो उसके प्रति आपकी हमदर्दी राजनीतिक रुझान मानी जाएगी, जो बड़ी कार्रवाई का कारण बन सकती है। आप इस मीडिया पर सोच-समझ कर रहें। हो सके तो कुछ दिन मुक्त रहना आपके हित में रहेगा। अब से आप अपने को सेक्टर में बनाए रखेंगे, हर गतिविधि पर पैनी नजर रखेंगे और कुछ दिनों बाद मजिस्ट्रेट के पावर मिल जाएंगे। समूची शांति व्यवस्था बनाए रखना, चुनाव आचार संिहंता का पालन कराना आपके जिम्मे है।
नियंत्रण कक्ष से आई कॉल एकबारगी डरा देती है। बूथ पर सारी तैयारी हो चुकी है की रिपोर्ट आज शाम तक हर हाल में पेश करें। नजरी नक्शा, वलनरेबल रिपोर्ट, बूथवाइज प्रतिष्ठित व्यक्तियों के मोबाइल नंबर सहित रिपोर्ट तुंरत पेश करें। कभी भी आपके क्षेत्र में भारत चुनाव आयोग का आॅबजर्वर दस्ता पहुंच सकता है, रात के ग्यारह बजे नियंत्रण कक्ष से काल आई।

पुलिस दस्ते के साथ सेक्टर मजिस्ट्रेट साहबान अपने-अपने क्षेत्र में पहुंचेंगे। कानून और शांति-व्यवस्था हर सूरत में बनाए रखनी है। किसी भी तरह का कोई अंदेशा हो तो जिला निर्वाचन अधिकारी को अविलंब सूचित किया जावे। अपने क्षेत्र का हर मतदाता बिना डरे मतदान कर सके ऐसी व्यवस्था बनाए रखनी है। सभी सेक्टर साहबान अपने मुख्यालय पर रहते हुए चुनाव संपन्न करेंगे। एसडीएम का स्वर गूंजा था।
शाहिद का बीच-बीच में फोन आ जाता। मोबाइल को डैशबोर्ड पर रखते हुए बोला, ‘सर कल संडे है, छुट्टी रहेगी न?’
‘हमारी कोई छुट्टी नहीं हो सकती, हम चौबीस घंटे ड्यूटी पर हैं और मुख्यालय उच्च माध्यमिक विद्यालय, ग्राम पंचायत, रियाण है।’
‘सर मेरे दोस्त की गाड़ी वाले साहब तो कल छुट्टी पर हैं और रात अपने आवास पर ही गुजारते हैं।’ वह कुछ झिझकते हुए बोला।
‘सबके काम करने के तरीके अलग-अलग होते हैं।’ इतना कह कर वर्मा साहब सेक्टर के क्या-क्या कार्य हैं, पूरे विवरण के साथ बताते रहे और शाहिद चुपचाप सुनता रहा। शाहिद को न कर्तव्य और न ही धाराओं से मतलब था, वह तो चाहता था कि कल की छुट्टी मिल जाए, तो दोस्त की तरह कल सवारी उठा सके। इस दौरान दूसरे ड्राइवर खूब सवारियां ढो रहे हैं। और यहां है कि कोरे सिद्धांत सुनने को मिल रहे हैं।
वर्मा साहब के मोबाइल की घंटी बजी। उन्होंने ड्राइवर को गाड़ी धीमी करने का इशारा किया। ‘हां हां, बोलो मैं सुन रहा हूं।’
‘मैं तो चुनाव ड्यूटी पर हूं, अपना क्षेत्र छोड़ कर कैसे आ सकता हूं? मुख्यालय ठहराव के सख्त निर्देश हैं। चुनाव का मामला ठहरा, कैसी बात कर रही हो! तुम समझती नहीं हो, यह काम इतना आसान नहीं है।’
साहब की परेशानी को ताड़ते हुए शाहिद बोला, ‘क्या बात है सर! घर पर कुछ समस्या है?’
‘कुछ नहीं, यार तुम गाड़ी चलाओ।’ फिर वे स्वयं ही बताने लगे, ‘अरे महिलाएं हैं यार, समझती तो हैं नहीं। बोलती है, बेटी घर आ रही है रेलवे स्टेशन से लाना है। मैंने बोल दिया है, वे बस में बैठ कर चली जाएंगी और रिसीव कर लाएंगी।’
शाहिद तपाक से बोला, ‘सर इसमें क्या बड़ी बात है, मैं हूं न। यह आपकी ही गाड़ी है, चलते हैं रेलवे स्टेशन और ले आएंगे बिटिया को। इसमें चिंता की कौनो बात नहीं है।’
वर्मा साहब ने सिर हिला कर शाहिद के सुझाव को सिरे से नकार दिया।
कोटा का दशहरा मेला काफी मशहूर है। अभी चल रहा है। बिटिया ने मम्मी से, मम्मी ने शाहिद से कहा और कब गाड़ी मेले की तरफ मोड़ ली गई और कब मेले में प्रवेश कर गए, पता ही नहीं चला। दस मिनट बाद नियंत्रण कक्ष से फोन आया, ‘नजरी नक्शा बूथ वाइज शाम छह बजे तक जमा करना है।’
वर्मा साहब को जो डर था वही हुआ। मिसेज वर्मा से कहा, तो वे एकदम से नाराज हो गर्इं। किसी तरह आधा घंटे के अंदर-अंदर देखो और निकल लेते हैं, फिर कभी फुरसत से आ जाएंगे।

वर्मा साहब के लिए मुश्किल खड़ी हो गई। वे मेले के एक कोने में बैठ कर दिन भर देखे बूथों का नजरी नक्शा बनाते रहे, ताकि नियंत्रण कक्ष पहुंचते ही जमा कर सकें।
अंधेरा घिर चुका था। निजी आवास पर शाहिद और वर्मा साहब ने खाना खाया और मुख्यालय चलने के लिए गाड़ी स्टार्ट करने को कहा, तो शाहिद फैल गया। बोला, ‘सर अब रात में वहां क्या करेंगे, सोना ही तो है, यहां सोएं कि वहां, क्या फर्क पड़ता है। सुबह जल्दी उठ कर चल देंगे।’
‘नहीं, नहीं वहां हमारा होना नियमानुसार आवश्यक है।’
‘सर आप क्यों इतनी चिंता करते हो? कौन ठहराव कर रहा है वहां? शर्मा साहब, प्रतिहार साहब सब यहीं शहर में अपने-अपने आवास में लंबी तान कर सोए हुए हैं। फिर, कोई बात हुई तो मैं हूं न, जब कहोगे तभी मुख्यालय पर पहुंचा दूंगा।’
वर्मा साहब ठहर तो गए, लेकिन अपना ही घर बेगाना लगा। जैसे गलत जगह हो, आरामदायक बिस्तर काट रहा हो। बिस्तर पर जाते ही अजीब खयाल आने लगे। एसडीएम द्वारा बताए सेक्टर के दायित्व, मुख्यालय ठहराव सुनिश्चित करना।… बिस्तर, जो कि हाल ही में खरीदा गया है, गहरी नींद लाने की गारंटी देते विज्ञापन वाले आरामदेह गद्दे पर नींद आसपास भी नहीं फटक रही थी। जैसे जिला कलेक्टर के कहे नियम, विनियम, नदी की धारा की तरह बह रहे थे और वे रात भर बचाव में तैरते-डूबते, बचते-बचाते रहे। वे जैसे पूरी रात मुजरिम की तरह कठघरे में खड़े थे, अपने विचारों में तर्क-वितर्क करते अपराधी बने रहे। उन्होंने महसूस किया कि रात के काले स्याह अंधेरे में अपने विचार भयावह हो उठते हैं।

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