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कहानी: दूसरी अमृता

दस साल की सुगनी को पेड़-पौधों से बहुत प्यार है। खासकर घर के बाहर लगे नीम के पेड़ में तो उसकी जान ही बसती है। वह इस पेड़ से दोस्त की तरह बतियाती है।

Author Published on: June 9, 2019 1:19 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

आशा शर्मा

दस साल की सुगनी को पेड़-पौधों से बहुत प्यार है। खासकर घर के बाहर लगे नीम के पेड़ में तो उसकी जान ही बसती है। वह इस पेड़ से दोस्त की तरह बतियाती है। स्कूल से घर लौटने के बाद इसी के नीचे बने लाल सीमेंट के गट्टे पर उसका और उसके दोस्तों का डेरा जमता है। वे सब यहीं बैठ कर अपना होमवर्क करते हैं। इसी गट्टे पर तरह-तरह के खेल खेलते हैं। नीम की बड़ी-बड़ी नीचे तक झूलती लचीली डालियों पर बंदर की तरह लटकना इन बच्चों का प्रिय शगल है।

आज सुबह जब वह स्कूल जाने के लिए घर से निकल रही थी तो उसने जो सुना उस पर सहसा उसके कानों को विश्वास नहीं हुआ। ‘सोचता हूं कि इस नीम के पेड़ को अब कटवा ही दूं।’ सुगनी के बाबा उसकी मां से कह रहे थे।
‘क्यों भला? यह तो आपने सुगनी के पैदा होने पर लगाया था न!’ मां ने पूछा। बाबा का जवाब सुनने के लिए सुगनी ने भी अपने कान उधर लगा दिए।
‘हां! लेकिन इस बार फसल ठीक हुई है, तो सोचता हूं कि घर में दो कमरे और बनवा लेते हैं… लेकिन यह नीम का पेड़ बीच में आ रहा है। इसे कटवा देंगे तो काफी सारी खुली जगह निकल आएगी।’ बाबा ने कारण बताया।
नीम के कटने की बात सुन कर सुगनी को बहुत बुरा लगा। वह अनमनी-सी स्कूल तो चली गई, लेकिन उसका पढ़ाई में मन बिल्कुल नहीं लगा। क्या करे, कैसे बचाए अपने दोस्त को, सुगनी इसी सोच में डूबी रही। आधी छुट्टी की घंटी बजी और सब बच्चे ‘मिड डे मील’ के लिए लाइन में लग गए।
‘बच्चो! खाना खाने के बाद सबको बड़े वाले हॉल में इकट्ठा होना है। आज शनिवार है और हम बालसभा करने वाले हैं। आज आप लोगों को एक नाटक दिखाया जाएगा।’ विकास सर के इतना कहते ही बच्चे खुशी के मारे अपनी प्लेटें बजाने लगे, लेकिन सुगनी अब भी उदास थी। उसकी आंखों के सामने नीम का पेड़ घूम रहा था।

सब बच्चे हॉल में जमा हो गए। सामने की तरफ बने मंच पर पर्दा लगा था, नाटक यहीं मंचित होना था। पर्दा खुलता है। यह एक राज दरबार का दृश्य है।
‘सन 1787 की बात है। जोधपुर के महाराजा अभय सिंह के महल मेहराण गढ़ में फूलमहल नाम के राजभवन का निर्माण कार्य चल रहा है।’ पर्दे के पीछे विकास सर की आवाज गूंजी। मंच पर हलचल होती है।
‘मंत्री जी! महल में बेहतरीन लकड़ी का इस्तेमाल होना चाहिए।’ महाराज ने आदेश दिया।
‘जी महाराज! हमने खोज कर ली है। यहां से चौबीस किलोमीटर दूर खेजड़ली गांव में सबसे बढ़िया खेजड़ी के पेड़ हैं। लकड़ी वहीं से लाई जाएगी।’ मंत्री ने सिर झुका कर कहा। पर्दे पर फिर से दृश्य बदला।
मंत्री अपने सिपाहियों के साथ खेजड़ली गांव में रामू खोड के खेत में पेड़ कटवाने की तैयारी कर रहा है।
‘ठक-ठक’ की आवाज सुन कर रामू की पत्नी अमृता घर से बाहर आती है। ‘नहीं-नहीं! तुम इन पेड़ों को नहीं काट सकते… हमारे गुरु जांभोजी ने सिखाया है कि सिर साटै रूंख बचै तो भी सस्तो जाण… हरे पेड़ों को काटना पाप है।’ अमृता ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन सिपाहियों ने उसे धक्का देकर परे कर दिया। अभी सिपाही पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाने ही वाला था कि अमृता उस पेड़ से लिपट गई। सिपाही ने उसे हटाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह टस से मस नहीं हुई।
‘चाहे मेरी जान चली जाए, लेकिन मैं ये हरे पेड़ नहीं काटने दूंगी… पेड़ को काटने से पहले तुम्हें मेरे शरीर को काटना होगा।’ अमृता ने और भी ज्यादा कस कर पेड़ को पकड़ लिया।
‘काट दो इसे भी…’ मंत्री गुस्से में चिल्लाया।
बच्चे दम साधे मंच की तरफ आंख गड़ाए बैठे थे। सिपाही ने जोश में आकर कुल्हाड़ी हवा में लहराई। हॉल में चुप्पी पसरी थी… ‘खच्चाक’ की आवाज के साथ अमृता का हाथ कट कर नीचे गिरा। खून ही खून बिखर गया। लाल पानी के कुछ छींटे सुगनी के मुंह पर भी गिरे। इसके साथ ही सुगनी की चीख पूरे हॉल में गूंज गई…

मंच पर अमृता का शरीर टुकड़ों-टुकड़ों में कटा इधर-उधर बिखरा हुआ दिखाई दिया। लेकिन पेड़ अभी खड़ा था। सिपाही उसके कटे शरीर को लात मार कर परे कर देता है और पेड़ पर फिर से कुल्हाड़ी तानता है, लेकिन यह क्या! इस बार अमृता की तीनों बेटियां पेड़ से लिपट गर्इं।
‘इन्हें भी इनकी मां के पास पहुंचा दो।’ गुस्साए मंत्री ने आदेश दिया और खच्च… खच्च… खच्च… बेरहम सिपाहियों ने उन्हें भी गाजर-मूली की तरह काट डाला।
एक तरफ पेड़ को काटने की और दूसरी तरफ पेड़ को बचाने की जिद। देखें किसकी जीत होती है! बच्चों का कौतूहल बढ़ता जा रहा था। साथ ही उनकी सिसकियां भी।
‘क्या सचमुच पेड़ नहीं बच पाएगा? सुगनी की आंखों के सामने उसका नीम का पेड़ घूम गया। उसकी हिचकी बंध गई। पर्दे पर फिर से दृश्य बदला। पूरे गांव में यह खबर आग की तरह फैल गई। अब मंच पर एक पेड़ नहीं, बल्कि पूरा खेत दिखाई दे रहा था और हरेक पेड़ से लिपटा एक मनुष्य… ‘सिर साटै रूंख बचै तो भी सस्तो जाण…’ सब मनुष्य एक साथ गरजे।
‘काट डालो एक-एक को।’ जिद पर अड़ा मंत्री जोर से चीखा।
और फिर गुरु जांभोजी के बताए रास्ते पर चलते हुए एक-एक कर पूरे तीन सौ तिरसठ लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान दे दी, लेकिन पेड़ नहीं कटने दिए। पूरा मंच नकली खून और कटे हुए नकली मानव अंगों से अट गया। सब कुछ नकली था, लेकिन बच्चों के आंसू असली थे।
नाटक खत्म हुआ। बच्चों के साथ सुगनी भी अपनी आंखें पोंछती हुई हॉल से बाहर आई। अब उसके चेहरे पर मुस्कान थी। शायद उसे अपने दोस्त को बचाने का तरीका मिल गया था।

‘अरे सुगनी! आज खाना नहीं खाएगी क्या? कब से पेड़ पर टंगी बैठी है!’ मां ने उसे आवाज लगाई।
‘मां! जब तक आप इस पेड़ को न काटने का वादा बाबा से नहीं करवाती, तब तक मैं नीचे नहीं उतरूंगी।’ सुगनी ऊपर से ही चिल्लाई।
‘लो, कर लो बात! अब यह क्या नई जिद हुई भला! आने दो बाबा को, चोटी पकड़ के नीचे उतारेंगे।’ मां बड़बड़ाती हुई चली गई।
शाम को बाबा खेत से आए तो सुगनी की जिद के बारे में पता चला। ‘सुगनी! जिद नहीं करते बेटा। कमरे बनवाने के लिए इस पेड़ को काटना बहुत जरूरी है। इसे काट कर हम दूसरा पेड़ लगा लेंगे।’ बाबा ने उसे समझाया।
‘नहीं बाबा! मैं आपको यह पेड़ नहीं काटने दूंगी। अगर आपने मेरे दोस्त पर कुल्हाड़ी चलवाई या मुझे जबर्दस्ती नीचे उतारने की कोशिश की तो में यहीं से नीच कूद जाऊंगी। फिर चाहे मेरी टांग टूटे या माथा फूटे या फिर जान ही क्यों न चली जाए।’ सुगनी अपनी जिद पर अड़ी रही। शोर सुन कर सुगनी के दोस्त भी आ गए और सब के सब पेड़ पर चढ़ कर बैठ गए। ‘सुगनी सही कहती है। हम यह पेड़ नहीं काटने देंगे। यह हमारा दोस्त है।’ सब बच्चे चिल्लाने लगे। बात आग की तरह फैल गई और देखते ही देखते पूरा गांव नीम के पेड़ के इर्दगिर्द जमा हो गया।
सब सुगनी को समझाते रहे, पर वह नहीं मानी। उसने नाटक में जो देखा था वह सब बता दिया। अमृता देवी की कहानी सुना दी। सुगनी की बात सुन कर बाबा सोच में डूब गए। फिर मुस्कुराने लगे, ‘अच्छा ठीक है मेरी दूसरी अमृता देवी, नहीं कटेगा तुम्हारा दोस्त। अब तो नीचे उतर आ। कबसे दोस्त की पीठ पर लदी बैठी है! यह बेचारा भी थक गया होगा।’
‘सिर साटै रूंख बचै…’ सुगनी जोर से बोली।
‘तो भी सस्तो जाण…’ बाकी की लाइन उसके दोस्तों ने पूरी की। फिर धम्म धम्म करते सारे बच्चे नीचे कूद गए। सुगनी भी नीचे आ गई और सब बच्चे नीम के पेड़ से लिपट गए।

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