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अभिनय, मुद्रा और भाव का संगम

किशोरावस्था तक बालसरस्वती लोकप्रिय नृत्यांगना बन गई थीं। अभिनय में उनकी अलग पहचान बन चुकी थी। 1934 में वह भरतनाट्यम को पहली बार दक्षिण भारत से बाहर ले गर्इं और कोलकाता में अपनी परंपरागत शैली का प्रदर्शन किया। नृत्यशास्त्री उदयशंकर ने उनकी कला को देखा, तो उनके प्रवर्तक बन गए। लेकिन बाला की जिंदगी उस वक्त ठहर गई, जब उन्हें गंभीर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।

Author May 13, 2018 4:03 AM
किशोरावस्था तक बालसरस्वती लोकप्रिय नृत्यांगना बन गई थीं।

बालसरस्वती के ‘अभिनय’ की नाट्यशक्ति दर्शकों को परमानंद से भर देती थी। उनके इशारे से संगीत बन जाता और संगीत दृश्यों में बदल जाता। तभी तो उनके थिरकते कदमों के संग नृत्य-प्रेमी थिरकने लगते थे। अभिनय में कान्हा और भाव में प्रेम ने बालसरस्वती को ‘कृष्णा नी बेगाने’ बना दिया था। उन्होंने वर्णम के ‘नृत्य’ भाग में उल्लेखनीय सुधार कर नृत्य में नवाचार को दावत दी, तो त्वरित ‘त्रिमनमों’ को घड़ी की तरह पूरी शुद्धता के साथ मुख्तलिफ और प्रभावशाली बनाया। तमिलनाडु के चेन्नई (पूर्व मद्रास) में 13 मई, 1918 को संगीतकारों और नर्तकियों के परंपरागत परिवार की सातवीं पीढ़ी में जिस देवदासी कन्या का जन्म हुआ, उसका नाम रखा गया तंजौर बालसरस्वती। पूर्वज पैयम्मल संगीतकार और नर्तक थे। दादी विना धनमल बीसवीं शताब्दी की प्रभावशाली संगीतकार थीं और मां जयाम्मल मशहूर गायिका। भरतनाट्यम गुरु कंडप्पा पिल्लई के कठोर अनुशासन में नृत्य का ‘ककहरा’ सीखकर चार साल की बाला ने जब गति पकड़ी, तो महज सात साल की उम्र में बालसरस्वती बन कांचीपुरम के एक मंदिर से पूरे देश पर थाप दी। बाला की नन्ही हथेलियों और पैरों ने कल्याणी जातिस्वरम, वेन्नुदा शब्दम, ठोड़ी वर्णम और पद्म के जरिए अभिजात वर्ग के दर्शकों को लुभाया, जिनके बीच यह गूंज हो गई कि भरतनाट्यम में एक नए सितारे ने दस्तक दी है। उन्होंने नृत्य के रूप में वर्णम गाया भी, जिसने उनकी प्रतिभा और विलक्षणता का लोहा मनवा दिया। बालसरस्वती ने गौरी अम्मल से अभिनय की बारीकियां सीखीं, तो चिन्नया नायडू से श्लोक। लक्ष्मीनरसिम्हा शास्त्री ने कुचीपुड़ी में बाला की लय, भाव, मुद्राओं को गति दी। उस समय तक संगीत में लिपि लगभग न के बराबर थी, इसलिए कर्नाटक संगीत में सबक अनिवार्य थे। वे शाम को अपने गुरु के बेटे के. गणेश के साथ ‘पांच जातियों’ और ‘अरुडि’ पर चर्चा करती थीं और अंतत: उन्होंने इसी श्रुति-परंपरा को अपनी शैली की खास पहचान बनाया।

किशोरावस्था तक बालसरस्वती लोकप्रिय नृत्यांगना बन गई थीं। अभिनय में उनकी अलग पहचान बन चुकी थी। 1934 में वह भरतनाट्यम को पहली बार दक्षिण भारत से बाहर ले गर्इं और कोलकाता में अपनी परंपरागत शैली का प्रदर्शन किया। नृत्यशास्त्री उदयशंकर ने उनकी कला को देखा, तो उनके प्रवर्तक बन गए। लेकिन बाला की जिंदगी उस वक्त ठहर गई, जब उन्हें गंभीर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। रूढ़िवादी समूहों ने नर्तकियों के रूप में सार्वजनिक तौर पर महिलाओं के आने का विरोध किया और देवदासी मुद्दा अपनी बदसूरत शक्ल के साथ पिछली टांगों पर खड़ा हो गया। रूढ़िवादियों ने उनकी इतनी आलोचना की कि वे अवसाद में चली गर्इं। मां जयाम्मल ने बेटी की यह हालत देखी, तो उसके भविष्य के लिए कदम आगे बढ़ाया, लेकिन परिवार राजी नहीं हुआ। संघर्ष ने बाला को निराश कर दिया, लेकिन कला फिर प्रबल हुई और नृत्य के प्रति उनका अनुराग अधिक गहरा हो गया। तनावपूर्ण समय में अरियक्कुडी रामानुज आयंगर जैसे प्रगतिशील विचारकों से उन्हें समर्थन मिला। संगीत अकादेमी भी उनके समर्थन में खड़ी हो गई। अकादेमी के सचिव डॉ. राघवन ने उन्हें एक मंच प्रदान किया। यहां से बाला की जिंदगी और नृत्य ने नया मोड़ लिया। उन्होंने पहले चेन्नई में एक संस्था के साथ मिल कर नृत्य विद्यालय खोला, फिर वहां अपने मन-मुताबिक नृत्यांगनाओं को प्रशिक्षण देना शुरू किया। इस तरह बाला का भरतनाट्यम पूरे भारत में छा गया। उनके प्रशिक्षण की अग्नि में तप कर ही इंदिरा रेड्डी, विजया, उमा-राम, श्यामला, शशिकला, जयंती, चंद्रपाल, राजीमणि, माथंगी, गीता, सुगुना और शरदकला निकले, तो दीपिका, उमा, रंजनी, विजयश्री और सावित्री ने बाद की पीढ़ी का प्रतिनिधित्व किया।

पिछली सदी के सातवें दशक में बाला ने पूर्वी एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका को अपने नृत्य से झंकृत किया। 1961 में पहला विदेशी प्रदर्शन उन्होंने तोक्यो में किया। पश्चिमी शैली के आदी दर्शकों से अपनी कला के मिलन पर उनकी प्रतिक्रिया के बारे में वे थोड़ा परेशान थीं, लेकिन उनकी भाव और हस्त-मुद्राओं ने विदेशी दर्शकों पर ऐसा जादू किया कि हेयरवुड के राजा को भी कहना पड़ा, ‘मैंने आज दुनिया की तीन महानतम नृत्यांगनाओं में से एक को देखा है- बालसरस्वती। अन्य दो गैलीना उलानोवा और मार्गोट फोंटिन हैं।’ 1962 में बाला ने अमेरिका का रुख किया, जहां उन्होंने सोलह केंद्रों को अपनी कला से सराबोर किया और विद्यार्थियों को नृत्य की बारीकियां सिखार्इं। एक महोत्सव में उनके नृत्य पर मोहित एक कला समीक्षक ने लिखा- ‘उनकी नाजुक और सुंदर कला कालातीत है, जिसकी सीमा कोई नहीं जानता है।’ बालसरस्वती का माल्यार्पण करते हुए टेड शॉन ने दर्शकों से कहा- ‘आप महानता की उपस्थिति में हैं। आज की रात एक ऐतिहासिक रात्रि रही है।’ एडिनबर्ग फेस्टिवल में पहली प्रस्तुति में ही बालसरस्वती ने ठोड़ी वर्णम ‘धनिके’ का अद्भुत प्रयोग कर अपने नृत्य के जादू से दो घंटे से अधिक समय तक विदेशी दर्शकों को बांधे रखा। दर्शकों ने जब नारंगी व हरे रंग की पोशाक में सजी और ठेठ भरतनाट्यम आभूषण पहने तथा बालों पर मांगलिक पीले गुलदाउदी लगाए बालसरस्वती को देखा, तो सुंदरता और कोमलता के साथ लय, भाव, मुद्रा में डूब कर रह गए। बालसरस्वती को भरतनाट्यम में महारत हासिल थी। वह पैरों में पायल पहनकर जब भरतनाट्यम करतीं, तो उनकी हस्त-मुद्राओं और चेहरे के भाव से दर्शक सम्मोहित हो जाते। जब वह क्षेत्रग्न पद्म के गीत की व्याख्या करने के लिए अपनी आंखों से बोलतीं, तो नृत्य-प्रेमी उनके एक-एक भाव को देखते रहते। उनकी प्रस्तुतियों में सौंदर्य को कई पायदान बढ़ाने के लिए रंजक संगीत रहता था। एक संगीत विद्यालय में उन्हें पूजा समारोह के लिए आमंत्रित किया गया। एक दिन उन्हें देर हो गई, तो सभी लोग घबरा गए। वह शांति से बैठ गर्इं और आनंद में लहराने लगीं। फिर हंसीं और कुछ देर बाद नृत्य करने लगीं। उन्होंने दर्शकों के लिए कला के पारंपरिक स्वरूप में फेरबदल कर असम्मत मानक तक स्थापित किए और उन्हें परखा। गुरुकुल में भी अपने बैठने के लिए कोई खास जगह नहीं बनाई और न ही कभी अपने बचपन की सादगी और मुस्कराहट छोड़ी, जैसा कि नर्तकियों के बारे में मशहूर था। जिस नर्तकी की दुनिया दीवानी थी, वह खुद खिलौनों से प्यार करती थी। विभिन्न देशों की यात्रा के दौरान बालसरस्वती यादगार के रूप में खिलौने खरीदतीं, जिनके लिए अपने घर में उन्होंने एक विशेष स्थान बनाया था।

बाला की शंभू महाराज और उनके भतीजे बिरजू महाराज तथा पं. रवि शंकर के साथ जुगलबंदी खूब जमी। वे और शिवाजी गणेशन भी एक-दूसरे के बड़े प्रशंसक रहे। बाला जब भी संगीत अकादेमी में नृत्य करतीं, शिवाजी और उनकी पत्नी के लिए अगली पंक्ति में एक सोफा आरक्षित रहता। कार्यक्रम के बाद गणेशन सज्जा-गृह में जाते और प्रशंसा करते हुए बाला को गले लगा लेते। सत्यजित राय ने उन पर वृत्तचित्र बनाया, जिसका नाम ‘बाला’ रखा। डगलस नाइट जूनियर ने उनकी जीवनी ‘बालसरस्वती : हर आर्ट ऐंड लाइफ’ लिखी, तो पद्म भूषण, पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादेमी, संगीत कलानिधि समेत अनेक सम्मानों ने उन्हें सजाया। बाला ने आखिरी साल किल्पॉक स्थित अपने घर में गुजारे, जो उन्होंने कड़ी मेहनत से बनाया था। दुनिया भर की सैर करने वाली शास्त्रीय नृत्य की बालसरस्वती लंबी बीमारी के बाद 9 फरवरी, 1984 को महायात्रा पर निकल गर्इं, लेकिन भरतनाट्यम में वे आज भी उपस्थित हैं और उनकी विरासत शिष्यों द्वारा संरक्षित है।

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