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प्रसंग: आज के दौर में साहित्य

पाठक कहते हैं कि हमने इतनी बहुप्रचारित किताब खरीदी, पर यह तो हमारी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। इसमें कुछ है ही नहीं। सबसे जरूरी चीज पठनीयता तक नहीं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

रजनी गुप्त

पुस्तकों में निहित ज्ञान का आलोक अद्भुत होता है। किताबें ही हैं, जो दुख के गहनतम क्षणों में हमारी अंगुली पकड़ हमें आगे चलने को उत्प्रेरित करती हैं। पुस्तकें पढ़ने की आदत जीवन में शानदार बदलाव ला सकती है। गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने की कला सिखाती हैं पुस्तकें। हम सब इस वस्तुसत्य से अवगत हैं कि किताबें पढ़ या रट-रटा कर महज नौकरी पा लेना या करिअर की दौड़ में आगे निकलना एक बात है, लेकिन जीवन को हर वक्त वैसे प्रचुर ज्ञान के साथ-साथ चेतना विकसित करती हैं पुस्तकें। चैतन्य व्यक्ति प्रबुद्ध होकर तमाम सामाजिक रूढ़ियों, विसंगतियों और जड़ता को तोड़ कर आत्मसंवर्धन के रास्ते आत्मविश्वास के सबसे ऊंचे पायदान पर बैठता है।

अपने दैनिक जीवन के केंद्र से जबसे पुस्तकें हाशिए पर फिकती गईं, तभी से हमारे सामाजिक-पारिवारिक जीवन में कदाचार का प्रवेश तेजी से होता गया। एक-दूसरे के प्रति वैमनस्यता बढ़ती गई और कदाचित दुराव, अलगाव के साथ एक अजीब किस्म का वैर भाव आजकल हर रिश्ते को सुखा डालता है। पुस्तकों की महत्ता की बात चली, तो आज के माहौल में पनपती पुस्तक संस्कृति की याद आने लगी। किसी रचनाकार के मन में आज यह संकट क्यों नहीं है कि किस कदर पुस्तकों को हमें अपने जीवन का केंद्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ें। हमारे जीवन को मूल्यवान या संस्कारवान बनाने वाली यही पुस्तकें हैं, मगर इनके खरीदार नहीं रहे। हम मॉल संस्कृति के युग में किताबों को परे धकियाते हुए महज दिखावे की संस्कृति में जीने लगे हैं। देश भर में जितने भी पुस्तक मेले लगते हैं, अधिकतर में लेखक-लेखिकाएं खुद को सेलिब्रिटी मान कर अपनी निजी चमक-दमकनुमा कौंध बिखेरने में लगे रहते। पुस्तकों की महत्ता या गुणवत्ता को लेकर प्रकाशक भी सार्थक पहल करते नहीं दिख रहे। येन केन प्रकारेण बड़े लेखकों की अनुशंसा पर किसी भी बड़े प्रकाशक के नाम का इस्त्ेमाल करते हुए किताब को झटपट छपवा देना, बस यही है आज की फटाफट संस्कृति। पुस्तकों को लेकर अपनी मौलिक चिंता और सार्थक सुझावों को लागू करवाने की रणनीति पर अमल करने या अमली जामा पहनाने के बजाय उनका सारा ध्यान महज इस सेलिब्रिटी संस्कृति तक सिमटता दिख रहा है। चर्चित रचनाकार अपने खास किस्म के प्रशंसकों, रचनाकारों और आलोचकों की टीम के साथ किसी न किसी बुक स्टॉल पर आ धमकते हैं, उसके बाद तमाम प्रकाशक लगे हाथ उन्हें किताबों का गट्ठर पकड़ाते हैं, फिर साथ-साथ तस्वीरें खिंचाने का सिलसिला चल पड़ता है। हर प्रकाशक अपने-अपने लेखकों की किताबों का लोकार्पण बड़े जोर-शोर से करते हुए देखे जाते हैं। लेखक समुदाय अन्य समकालीन रचनाकारों की किताबों को उठा कर अपने घर तक जरूर लाते हैं, पर घर पहुंचते ही वे किताबें कहां किस खोह में दुबक जाती हैं, पता ही नहीं चल पाता।

हम सभी इस युगसत्य से वाकिफ हैं कि जब तक पुस्तक संस्कृति का विकास अनिवार्य तौर पर हर घर पर जरूरी नहीं हो जाता, तब तक बच्चों या बड़ों किसी के भी भीतर संवेदनशीलता, समझदारी या संस्कारवान व्यक्तित्व का परिमार्जन नहीं हो पाता। अपनी तरफ से नया, स्वत:स्फूर्त और मौलिक सूझबूझ से अज्ञात को ज्यादा से ज्यादा ज्ञात बनाने के लिए प्रतिबद्ध होने के लिए जरूरी है कि हम साहित्य के पास जाएं, यानी अनुभवों की पूंजी समेटे अमूल्य किताबें ही हमारी ‘बेस्ट फे्रंड, फिलासफर और गाइड’ बनने में सक्षम हैं। हमारे समाज में आसपास पसरी संवादशून्यता की खाई खत्म हो, संवेदनशील रवैए में लचीलापन आए और वर्ग, जाति, वर्ण या पद की ऊंच-नीच के बीच की दीवारों को ढहा कर तोड़ने में बड़ी जबर्दस्त भूमिका है साहित्य की। क्रांतियों को जन्म देता है साहित्य। एक समरस समाज की स्थापना की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाने और इंसानियत के जज्बे को संवर्धित करने के लिए जो भूमिका किताबों की है, उससे किसी को इंकार नहीं। इधर स्त्री-पुरुष संबंधों के बीच जिस तरह की शुष्कता, निर्मम रवैया या क्रूरता की हदें लांघ जाने की घटनाओं में जिस तेजी से बढ़ोतरी हो रही हैं, उसके पीछे कहीं इस पुस्तक संस्कृति का विलुप्त होना या क्षीण होना तो नहीं। इस तरफ गौर करने की जरूरत है। यहां यह भी देखना होगा कि पुस्तकें खरीद कर महज पुस्तकालय में भर देने भर से हमारे कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती। जब तक पत्रिका या पुस्तक पढ़ना हमारी संस्कृति का अनिवार्य अंग नहीं हो जाता, तब तक केवल भाषण देने से काम नहीं चलने वाला। विश्व भर का ज्ञान-विज्ञान, सभ्यता, संस्कृति, आचार-विचार, इतिहास, जीवन शैली, और न जाने कितनी विभिन्नताओं के बीच साम्यता का रास्ता तलाशता जीवन में न जाने कितने युगों की धड़कनें शुमार हैं हमारी इन किताबों में।

हर बड़े शहरों में आए दिन आयोजित होने वाले ‘लिटरेरी फेस्टिवलों’ में नामी चर्चित साहित्यकारों का जमावड़ा और ऐसी महान विभूतियों के भाषण सुन कर मन मुदित होता है। कितने दुहरे-तिहरे मानदंडों को अपना जीवनमूल्य बनाने वाले तथाकथित स्वयंभू समीक्षक या समीक्षिका हमारे आसपास हैं, जो माइक पर तारीफों के पुल बांधने से नहीं चूकते। जहां जिसका हित सधे, वैसी बात करने वाले रचनाकार आज बाजार की जरूरत के मुताबिक चलने लगे हैं। प्रकाशक लेखक के रचे हुए पर लाखों का फायदा उठाता है, पर रॉयल्टी के नाम पर पांच से दस हजार रुपए मात्र पकड़ा दिए जाते हैं। यह गंभीर मुद्दा है, जिस तरफ सोचने की जरूरत है। अब बात करें पाठकों की, जिनकी चिंता इन दिनों कोई नहीं कर रहा। पाठक कहते हैं कि हमने इतनी बहुप्रचारित किताब खरीदी, पर यह तो हमारी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। इसमें कुछ है ही नहीं। सबसे जरूरी चीज पठनीयता तक नहीं। ऐसी गूढ़-गझिन भाषा और ऐसा दुरूह शिल्प कि हमारी खोपड़ी से निकल जाए। जब उनका लिखा हमारी समझ में ही न आए तो ऐसे सवाल हमें परेशान करते हैं, जिनके जवाब चाहिए। नए लेखकों से गुजारिश है कि वे नई विषय-वस्तु के साथ नए मुद्दे लाएं, जिनमें आज के समय के गंभीर सवाल हों या उनके हल हों। युवा लेखकों से उम्मीद है कि वे बार-बार अतीत की तरफ जाकर गड़े मुर्दे न उखाड़ें, बल्कि युगीन समस्याओं को आंखें खोल कर देखें और आज के समय की चुनौतियें से मुकाबला करें, तभी उनका लिखा आमजन तक पहुंच सकेगा और उसे पाठक खोज कर पढ़ेंगे। वरना लेखक खुद के लिखे का महज प्रचारक बन कर यहां-वहां अपनी किताबें बांटता फिरेगा और पाठक मुंह फेर कर कहने से नहीं चूकेंगे कि पिछली किताब में तो कुछ खास था ही नहीं, तो इसे पढ़ कर क्यों अपना समय खराब करें। ऐसी स्थिति न आने पाए, इस तरफ हम सबको मिल कर सोचना होगा। औरों को चेताने से पहले अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है कि चाहे लेखक हों या समीक्षक, सबको बिना किसी पूर्वाग्रह या पक्षपात के अपने विवेक से रचना होगा। जब हम सिर्फ और सिर्फ रचना की तरफ देखेंगे, उसे ही जिएंगे, उसे ही संवारेंगे तो निश्चित रूप से ऐसी रचनाएं कालजयी होंगी, जिनमें आम जन तक पहुंचने की अंदरूनी ताकत अंतिर्निहित होगी, तो फिर उन्हें किसी प्रचार-प्रसार की वैसाखी की जरूरत नहीं पड़ेगी। अंतत: रचनाएं ही जिंदा रहेंगी।

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