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‘आधी आबादी’ कॉलम में रीता सिंह का लेख : अवकाश के पक्ष में

इस विधेयक के प्रावधानों के मुताबिक पचास से ज्यादा कर्मचारियों वाले किसी भी सरकारी या निजी संस्थान में क्रेच की व्यवस्था अनिवार्य होगी।

Author नई दिल्ली | August 20, 2016 11:26 PM
Indian parliament

राज्यसभा ने कामकाजी महिलाओं को बेहतर माहौल उपलब्ध कराने के लिए मातृत्व सुविधा संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी है। यह विधेयक जब कानूनी शक्ल ले लेगा तो सरकारी और निजी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को छब्बीस हफ्ते का मातृत्व अवकाश मिलने लगेगा। फिलहाल कामकाजी महिलाओं को सिर्फ बारह हफ्ते का ही मातृत्व अवकाश मिल रहा है। इस विधेयक के प्रावधानों के मुताबिक पचास से ज्यादा कर्मचारियों वाले किसी भी सरकारी या निजी संस्थान में क्रेच की व्यवस्था अनिवार्य होगी। सरकारी कार्यालयों और निजी संस्थानों को बच्चे और मां को दिन में चार बार क्रेच में जाने की अनुमति देनी होगी। अगर कोई संस्थान क्रेच की व्यवस्था नहीं करता है तो उसके लिए कानून में दंड का प्रावधान किया गया है। इस विधेयक के मुताबिक महिलाओं को दो बच्चों तक छब्बीस हफ्ते का मातृत्व अवकाश तो मिलेगा ही, साथ में दो और बच्चों के लिए भी बारह हफ्ते का मातृत्व अवकाश दिए जाने का प्रावधान है। इसके अलावा महिलाओं को आर्थिक पोषण उपलब्ध कराने के लिए उन्हें मातृत्व अवकाश के दौरान वेतन के साथ ही तीन हजार रुपए का मातृत्व बोनस भी दिया जाएगा। इस विधेयक के कानूनी आकार लेने से भारत दुनिया के उन चालीस देशों में शुमार हो जाएगा, जहां अठारह हफ्ते से ज्यादा का मातृत्व अवकाश प्रदान किया जाता है।

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अरसे से इस दिशा में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय प्रयासरत है। इसलिए और भी कि अब भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां गर्भावस्था के कारण नौकरी छोड़ने वाली महिलाओं की तादाद दुनिया में सबसे अधिक है। लेकिन अब छब्बीस हफ्ते के अवकाश और क्रेच की व्यवस्था के प्रावधान से नौकरी छोड़ने की नौबत नहीं आएगी। यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 42 का सम्मान करता है जिसमें कहा गया है राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए और प्रसूति सहायता के लिए व्यवस्था करेगा। इसमें यह भी प्रावधान किया गया है कि अगर अवकाश समाप्त होने के बाद कोई महिला कार्यालय का काम घर से करना चाहती है तो उसे यह सुविधा प्रदान करनी होगी। यह कानून इस अर्थ में ज्यादा महत्त्वपूर्ण और मानवीय है कि संतानोत्पति के दौरान महिलाओं को शारीरिक और मानसिक कष्ट से बचाएगा, साथ ही आर्थिक नुकसान का भी खतरा नहीं होगा। यह सच्चाई है कि गर्भावस्था के दौरान निजी क्षेत्र महिलाओं को नौकरी देने से कन्नी काटते हैं और गर्भावस्था में होने पर कामकाजी महिलाओं को नौकरी से निकाल भी देते हैं। लेकिन अब इस विधेयक में यह व्यवस्था है कि महिलाओं के साथ नाइंसाफी आसान नहीं होगी और उन्हें उनका अधिकार देना ही होगा।

यह आशंका जरूर है कि कहीं निजी क्षेत्र महिलाओं को नौकरी देना ही न बंद कर दे। अगर ऐसा हुआ तो यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा। वैसे देखा भी जा रहा है कि कुल श्रम में महिलाओं की भागीदारी निरंतर घटती जा रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2004-05 में कुल श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी 29.4 प्रतिशत थी, जो 2011-12 में घटकर 22.5 फीसद रह गई। संयुक्त राष्ट्र की ‘द वर्ल्ड्स वीमेन 2015’ की रिपोर्ट के मुताबिक 1995 से 2013 के बीच चीन और भारत में श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी घटी है। चीन में यह 72 से 64 फीसद और भारत में 35 से 27 फीसद हो गया है। दो राय नहीं कि कुल श्रम में महिलाओं की घटती भागीदारी के एक नहीं कई कारण हैं। लेकिन इनमें से एक कारण उनकी गर्भावस्था भी है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने कहा है कि अगर भारतीय रोजगार बाजार में श्रम बल में महिलाओं की संख्या को पुरुषों की संख्या के समान कर दिया जाए तो भारत का सकल घरेलू उत्पाद 27 फीसद तक बढ़ सकता है। जी-20 ने वैश्विक समुदाय से 2025 तक श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी के अंतर में 25 फीसद कमी लाने का आह्वान किया है। भारत के मौजूदा परिदृय पर नजर दौड़ाएं तो सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बनिस्बत बहुत कम है।

अगर अखिल भारतीय सेवाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर नजर डालें तो स्थिति संतोषजनक नहीं है। आईएएस में महिलाओं का प्रतिनिधित्व महज 14 फीसद है। इसी तरह बैंकों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व केवल 20 फीसद है। यानी लिपिकीय स्तर पर 29 और अधिकारी स्तर पर 12 फीसद महिलाएं हैं। रोजगार के मामले में उनकी स्थिति और भी दयनीय है। 2003 में देश भर के रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत महिलाओं की संख्या 26 फीसद थी जो आज बढ़कर 34.9 फीसद हो गई है। बहरहाल, सरकार ने महिलाओं को अपने नवजातों पर दुलार बरसाने का भरपूर अवसर उपलब्ध कराकर मातृत्व का सम्मान किया है, लेकिन इसकी असली परीक्षा अभी बाकी है।

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