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कहानी: बेटे की मां

पूर्वी देख रही है, लंबे समय बाद मां के चेहरे पर धूप का फैलना। अभी नरेश को आने में वक्त है। मां घड़ी देख रही है। तब तक सारे पकवान तैयार हो जाने चाहिए। बहू उड़द के पकौड़े तल रही थी। मां बेटियों के बीच से उठ कर लपकी।

Author Published on: May 12, 2019 1:33 AM
प्रतीकात्मक फोटो

कुसुम भट्ट

मां के चेहरे पर धूप की चिड़िया फुदक रही है। मन ही मन ढेरों मंसूबे बांधती मां। बेटियों के बीच उदारमना हो रही है। इतनी कोमल और मीठी आवाज में मां को वे पहली बार सुन रही हैं। पूर्वी मां का लगातार निरीक्षण करने पर तुली है। बीच में उसे ऐसा सोचना नागवार भी लगता है। धत! मां का भी कोई निरीक्षण करता है। मां तो मां होती है बस्स। उसके बारे में इस तरह की सोच उसे कठघरे में खड़ा करती है। कल मां ने अपनी सभी बेटियों को बुला लिया था। खबर ही ऐसी थी, जिसकी खुशी मनाई जाए।

उन्होंने उम्मीद भी नहीं की थी कि इतनी जल्दी वह आ सकेगा। वह यानी चार बहनों का इकलौता भाई नरेश, जिसके कारण वे चारों इस घर में थीं। वरना घर घर थोड़े ही होता। जिस घर में दीपक न जले, वह घर शमशान के समान होता है, ऐसा मां का मानना था। नरेश हुआ तो वे थीं, नरेश न होता तो वे कहां होतीं? पूर्वी सोचती, क्या मां उन्हें बचपन में ही मार देती या मां को उम्मीद थी कि नरेश को आना ही है, आना ही होगा। अलबत्ता दो-दो नरेश को आना होता, क्योंकि मां की नजर में दो पुत्र होने ही चाहिए थे। सुखी जीवन के लिए जैसे भी हो, दो पुत्रों को धरती पर लाना ही होगा। सो, मां के भगीरथ प्रयास के बावजूद एक ही पुत्र हुआ, जो नरेश बन गया। पूर्वी को याद आ रहा है, नरेश के सामने उनकी क्या औकात रही। पूर्वी के विवाह की बात चली, तो मां ने तपाक से पूर्वी के मुंह पर कहा था, ‘नरेश के कारण तेरा रिश्ता जुड़ रहा है पूर्वी, वरना ये लोग कहां शादी करते तुझसे।’ फिर ‘छाया बैठ डाली’ उक्ति का मतलब भी पूर्वी को समझाया गया था कि जिन लड़कियों के भाई नहीं होते, माता-पिता के स्वर्ग सिधारने पर उनका परिवार किससे मिलने आएगा। घर तो उजड़ ही चुका होगा, उफ!
पूर्वी ने इसकी कल्पना भी कहां की थी। तभी तो नरेश उनके बीच हीरो बना था। पूर्वी सोचने लगी है, चलो इतने पर भी गनीमत है। मां तो उसे इतना उछाला करती कि वह आकाश पर टंगा रह जाता। सूरज-चांद-सा, जिसके वजूद के आगे सब शून्य। मां की इसी सोच के कारण बहनों को जैसा भी रिश्ता आया, गाय बकरी-सा रस्सी खोल पकड़ा दिया। उस पर भी नीचा दिखाने से बाज नहीं आती। खिल-खिल कर हंसते हुए कहती, ‘बेटी दी है, एक रीछ को एक सियार को और एक सुअर को… और पहलौटी को बाघ की मांद में भेज दी थी बल।’

पूर्वी से छोटी सिद्धि, मां के साथ खूब हंसती। डफर को पता नहीं कि उसकी खिल्ली उड़ाई जा रही है। स्कूल पढ़ने भेजा, तो कहने लगी, मां के साथ खेतों में काम करना अच्छा लगता है। कम्बख्त पांचवी से ज्यादा एक दर्जा भी ऊपर नहीं गई और मां की लाडली बन गई। बाकी तीनों बहनों ने लड़-झगड़ कर बीए कर ही लिया था। मां की नजर में वह भी गोबर था। नरेश को जब स्कूल भेजती, तो वह स्कूल की दीवार कूद कर भाग जाता। खेतों में यहां वहां पेड़ों पर चिड़ियों के घोंसले खोजा करता। अंडे हुए, तो उन्हें फोड़ देता। चूजे हुए तो थैली में भर कर घर ले आता। बहनों को दिखा कर कहता, ‘चलो इसका शिकार पकाओ।’ नरेश जो ठहरा। उसे कौन रोक सकता था। किसी के गोठ में घुस कर बैल खोल देता। किसी की गाय का थन सिर्फ रोमांच के लिए दुहने लगता। लोग शिकायत करते, तो मां मासूमियत से कहती, ‘कान्हो भी तो चोरी करते थे, उन्हें तो सब प्यार करते थे बल! पता नहीं मेरे इकलौते नरेश से लोगों को इतनी डाह क्यों है।’
गांव में अपनी इन्हीं हरकतों से वह सबकी आंख की किरकिरी बन गया, तो पिता जी उसे शहर ले आए थे। साथ ही बहनों को भी उसकी आया बना कर।… यहां भी नरेश सारे दिन उधम मचाता। स्कूल से भी चौकीदार की नजरें बचा कर भाग आता। बहनें पूछतीं, तो कहता, ‘आज तो छुट्टी हो गई थी।…’ कभी टीचर के पिता जी की मौत पर शोकशभा होने का बहाना गढ़ता, तो कभी किसी बच्चे की दुर्घटना में मृत्यु होना बताता! जो मां बेटियों की फीस नाममात्र देने को उन्हें कई मर्तबा कोसा करतीं, ‘छाती पर मूंग दलने को पैदा हुई हैं, ये चुडैलें। कहां से लाऊं इतना पैसा कि चार-चार की फीस जुटा सकूं।’ वहीं मां शहर आते समय पिताजी को आदेश देती रही थी, ‘हमारे नरेश को अंगे्रजी स्कूल में पढ़ाना, पूर्वी के पिताजी! फीस ज्यादा हो तो भी डरना नहीं। मैं एक भैंस और पाल लूंगी। दो-चार बकरियां भी पाल लूंगी।…’

पिताजी भी खूब खुश दिखते, ‘तू ठीक ही कहती है पूर्वी की मां।…’ बहनों के हृदय में शब्द हथौड़े की चोट करते।
पूर्वी सोचती कि शहर के सबसे महंगे स्कूल में उसे भरती किया जाता, तो वह आज अपने पांवों पर खड़ी होती और परिवार का पोषण भी कर सकती। पूर्वी के समय में शहर जाने पर मां ने पिताजी को ललकारते हुए कहा था, ‘लड़की जात है… आसपास गिद्दों-चीलों की आंखें! तुम कब तक चौकीदारी करते रहोगे इसकी? तुमको तो नौकरी भी करनी है, पूर्वी के पिताजी। कुछ ऊंच-नीच हो जाए तो मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे।…’ मां का चेहरा गुस्से में और काला पड़ गया था। पिताजी उसके बाद चुप लगा गये थे। उन्होंने किसी बेटी की शिक्षा को लेकर कभी कुछ नहीं कहा। मां जैसे-जैसे कहती गई थी, वे करते रहे थे।
मां की आंखों में सिर्फ नरेश था, उसके कुल का दीपक! जिसकी रोशनी में उसे और पूरे खानदान को वैतरणी पार करने वाली गाय की पूंछ पकड़नी थी, वरना वे अंधेरी नदी में डूब कर नर्क में जाकर यमराज के दूतों द्वारा सताए जाते।… जो मां को गवारा नहीं था। मां की हिदायत होती, ‘नरेश को वे रोकें-टोकें नहीं। वह बेटा है। नरेश अपनी मर्जी का मालिक। बहनों के रोक-टोक लगाने पर वह विद्रोही हो जाएगा और कहीं भाग गया तो?…’

बहनें सहम जातीं। वैसे भी वह इतना उदंड होने लगा था कि उसकी पसंद का खाना न मिलने पर थाली उछाल देता और कमरे में बिखरे अन्न के ऊपर पांव रख कर अदा से कहता, ‘ओए लड़कियो, नरेश को ऐसा-वैसा खानीानहीं चलेगा।… नरेश को जंगली मुर्गी का टंगड़ी कबाब, हिरन का नरम-गरम मांस, लगोठे की रान और बासमती चावल चाहिए, समझी क्या!…’ बारह तेरह वर्ष में वह विलेन की एक्टिंग करके बहनों को हंसाता भी और रुलाता भी था।
पिताजी उसकी फरमाइश पूरी करते। शाम को ऑफिस से आने के बाद गरम-गरम टंगड़ी कबाब या मछली के पकौड़े लेकर आते और अपने हाथों से उसे खिलाते। बहनें टुकर-टुकर ताकतीं। बाद में उसके जूठन से उनको उनका हिस्सा मिलता। आखिर वह नरेश था! सबका हिस्सा खाने वाला राक्षस तो नहीं! वह शान से थोड़ा खाना थाली में बचा कर सबसे छोटी बहन को पकड़ाते हुए कहता, ‘लो बिल्लियो, खाओऽ… और मौज करो। तुम भी क्या याद करोगी कि किस भाई से पाला पड़ा है।…’ वह अट्टहास करता, ‘कल मैं तम्हें जंगली मुर्गी का शिकार पका कर खिलाऊंगा।…’

पिता जी खूब हंसते। वे सोचते, जरूर नरेश पिछले जन्म में कोई राजा रहा होगा! अब इस समय राजा तो वह हो नहीं सकता, पर नेता जरूर बनेगा।… वे अपने परिचित नेताओं, छुटभैयों के बीच ले जाकर उसे आशीर्वाद दिलाते। नरेश बल्लियों उछलता। किसी तरह नकल करके पास हुआ। नरेश मैट्रिक में लगातार फेल होने लगा, तो पिताजी की पेशानी पर बल पड़ने लगे थे, ‘कहीं कुछ गड़बड़ है।…’ वे कारण खोजते, पर उन्हें अपनी ओर से कोई कारण का महीन कांटा भी नजर नहीं आता था। वे अब नरेश को समझाने लगे थे। गांव से मां के लंबे-लंबे पत्र, जो किसी अनगढ़ हाथों लिखाए रहते, उन्हें मिलते, तो वे समझ ही न पाते कि क्या उत्तर दें। उन्होंने तो पत्नी को वचन दिया था कि नरेश को राजकुंअर-सा पालेंगे। उसे खूब पढ़ाएंगे, ताकि वह पूरे जिले में उनका नाम रोशन कर सके।
अब नरेश आधी रात को घर लौटने लगा था। पिताजी टोकते, तो कहता, ‘फलां नेता के घर मीटिंग थी।’ कभी कहता, आज मंत्री के साथ कहीं गया था। कभी कॉलेज में छात्रों का विवाद निपटाने नेता जी के साथ गया था। पिताजी सोचते, चलो राजनीति में इसने पंख तो पसारने शुरू कर दिए हैं, पढ़-लिख कर भी क्या करता! राजनीति में तो अनपढ़ भी चमक रहे हैं। उन्हें कई नेताओं के चेहरे याद आते। देश भर में कई चेहरे गुंडे-मवाली, हत्यारे थे और सत्ता पर काबिज हुए बैठे थे। क्या पता उनके नरेश को भी कभी न कभी चांस मिल ही जाए। वैसे भी स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य कब बदले, कोई नहीं जानता।
चिंतागस्त्र पिता को इस विचार ने राहत पहुंचाई थी, तभी एक रात पुलिस उनके कमरे का दरवाजा ठोंकने लगी थी। वे बदहवाश बाहर निकले, तो उनके होश उड़ गए थे। जब उन्हें पता चला कि अभी-अभी राजनीति में चमके एक दबंग नेता की छाती में उनके नरेश ने तमंचे से वार किया, जिससे घायल होकर वह अस्पताल के आईसीयू में आक्सीजन का मास्क लगाए जीवन-मृत्यु से जूझ रहा है। पिताजी के सीने में असह्य पीड़ा होने लगी थी। वे कुछ ही देर में छटपटा कर गिर पड़े थे। बहनें डरी हिरणी-सी परदे के पीछे छिपी थर-थर कांपने लगी थीं।…

इधर पिता की मौत, उधर पुलिस के जांबाज उन्हें नरेश का पता बताने को कह रहे थे। अगले दिन नरेश ने आत्मसमर्पण कर दिया था। मां आई, तो बेटियों को ही कोसने लगी थी कि तुमने भाई का खयाल रखा होता, तो यह नौबत न आती। मां कारागार में नियमित नरेश से मिलने जाती। वैसे ही नियमित मंदिर और पीर-फकीरों, ओझाओं के चक्कर काटती। उनके लाडले पर किसी ने टोना कर दिया होगा, वरना वह हिंसक नहीं होता। बाद में पता चला कि वह तो फिल्मी हीरो की गिरफ्त में आ गया था। वह भी तो अत्याचारी को मारता है। ‘साले नेता ने भी तो उसके दोस्त की बहन पर बुरी नजर डाली थी! मारता नहीं तो क्या करता, तिरंगे पर चढ़ाता उसकी फोटो?…’ वह अफसोस के बोल, बोल रहा था कि उसे जिंदा नहीं रहना चाहिए था। मां ने माथा पीट लिया था, ‘दुनिया में जाने कितने अपराधी होंगे, तूने ठेका ले रखा है नरेश, कि उन्हें तू ही सजा देगा?’ नरेश के पास कोई जवाब नहीं था। समय का चक्का चलता रहा। मां ने नेताओं से ही गुहार लगा कर कुछ साल बाद उसे छुड़ा दिया था। वैसे भी पंद्रह वर्ष के नाबालिग को सजा देना न्यायाधीश उचित नहीं मानते थे और फिर नेताजी भी स्वस्थ हो गए थे। उन्होंने अपने नरेश को माफ किया या नहीं, अभी वह रहस्य ही था। मकड़ी के जालों के बीच पड़ी मक्खी को उन्होंने पूरी तरह आजाद नहीं किया था।
बहरहाल, मां बेटे को लेकर संतुष्ट थी। उसने उसका विवाह और खुद को सत्संग के हवाले कर दिया था। पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। राज्य बना तो कोर्ट दूसरी जगह हस्तांतरित हुआ। बहुत दूर पहाड़ों में मां भी जा नहीं पाई थी। किससे पूछती कि केस रफा-दफा हुआ कि नहीं? फाइलें दुबारा खोली गईं, तो नरेश को सात वर्ष के लिए दुबारा सलाखों के पीछे जाना पड़ा था। तभी से मां ने बेटियों की सूखी जमीन पर अपने सच्चे आंसुओं की झड़ी लगा दी थी।

पूर्वी देख रही है, लंबे समय बाद मां के चेहरे पर धूप का फैलना। अभी नरेश को आने में वक्त है। मां घड़ी देख रही है। तब तक सारे पकवान तैयार हो जाने चाहिए। बहू उड़द के पकौड़े तल रही थी। मां बेटियों के बीच से उठ कर लपकी। हींग जीरे की खुशबू उड़ाते पकौड़ों की थाली मेज पर रखी। बेटियां पकौड़े उठा कर टूंगने लगीं। मां फुसफुसाई, ‘नरेश को नया काम-धंधा शुरू करने के लिए रुपयों की जरूरत है।… सिद्धि चिहुंकी, ‘मेरे पर्स में फिलहाल पचास हजार हैं।… अभी दे दूं क्या?… पूर्वी के गले में काली उड़द का दाना अटकने लगा है। वह खांसने लगी है। उसकी आंखों में जाल बिछने लगा है। उसके बीच हठी-सा वह क्षण उसे चिढ़ाने लगा है। जिंदा चूजों की लिसड़ती टांगों को झुलाता नरेश का चेहरा फैलता जा रहा है, ‘ए लड़कियो, इसका शिकार पकाओ।…’
पूर्वी की चेतना में धुंध छाने लगी है।…

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