ताज़ा खबर
 

चर्चा: संवेदनहीनता का सामना करता अन्नदाता

लगातार घाटे की खेती करने से लेकर आत्महत्या तक के हालात से जूझते किसान आखिर किसे अपनी व्यथा सुनाएं? खेती में लागत और बाजार में फसलों की कीमत की हालत क्या हो चुकी है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि किसानों के सामने फसलों को नष्ट करने तक की मजबूरी पैदा हो चुकी है। यह आत्महत्याओं के समांतर दूसरी ऐसी तस्वीर है, जो आने वाले वक्त में समूची कृषि-व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर सकती है। किसानों के हक में कर्जमाफी एक रास्ता है, लेकिन खेती, फसल, लागत और बाजार के तंत्र के ठोस नियमन के बिना क्या स्थायी हल निकाला जा सकेगा? इस बार की चर्चा इसी पर। - संपादक

प्रतीकात्मक तस्वीर।

हिंदी में किसान के सामाजिक अवदान की प्रशंसा करते हुए अनेक कविताएं लिखी गई हैं। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी एक प्रसिद्ध कविता में किसान के जीवन की कठिन दिनचर्या को रेखांकित करते हुए उसका यशगान किया था- ‘नहीं हुआ है अभी सवेरा, नहीं रात की मिटी थकान/ चिड़ियों के जगने से पहले खाट छोड़ उठ गया किसान।’ कृषि प्रधान देश के रूप में पहचाने जाने के बावजूद इन दिनों भारत के एक बड़े भूभाग में कृषि-कर्म से जुड़े लोगों को उनके परिश्रम का सम्मानजनक प्रतिफल नहीं मिल पा रहा है। प्रतिकूल परिस्थितियों ने किसानों के एक बड़े वर्ग को निराशा से भर दिया है। यही कारण है कि देश के अनेक हिस्सों में आए दिन किसान आंदोलनों और किसानों द्वारा आत्महत्या करने की खबरें सामने आ रही हैं।

मान्यता है कि भावनात्मक टूटन के क्षणों में व्यक्ति संवेदनाओं के स्नेहिल स्पर्श से संतोष पाता है। लेकिन लोकतंत्र कई बार जिम्मेदार पदों पर ऐसे लोगों को बैठने का अवसर दे देता है, जिनकी रुचि सहज मानवीय संवेदनाओं के निर्वहन से अधिक तंत्र की लकीर पीटने में होती है। ऐसा ही एक उदाहरण तब देखने में आया जब महाराष्ट्र के एक किसान ने 750 किलो प्याज की बिक्री के बाद मिले मुनाफे के महज 1064 रुपए व्यवस्था के प्रति अपने प्रतीकात्मक प्रतिरोध के रूप में मनीआॅर्डर द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे। अपेक्षा यह थी कि इस विरोध की प्रतिक्रिया के रूप में कोई सहानुभूति भरा आश्वासन मिलता, लेकिन अफसरों ने यह राशि यह कह कर लौटा दी कि रुपए डिजिटल माध्यम से भेजे जाएं, क्योंकि प्रधानमंत्री कार्यालय मनीआॅर्डर स्वीकार नहीं करता। निश्चित रूप से अपनी व्यस्तताओं के कारण संवैधानिक पदों पर बैठे लोग अपने कार्यालय के संपूर्ण पत्र-व्यवहार में खुद संलिप्त नहीं होते, लेकिन क्या लोकतंत्र में ऐसे अफसरों को भी जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होना चाहिए?

विसंगति यह है कि कथित विकास की आधुनिक अवधारणा में किसान तंत्र की प्राथमिकताओं में लगातार पीछे छूटा है और इस स्थिति ने किसानों को असंतोष और निराशा से भर दिया है। सन 2001 की जनसंख्या में ही यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि सत्तर लाख से अधिक किसानों ने खेती करना बंद कर दिया है। तब से अब तक देश की नदियों में बहुत-सा पानी बह चुका है। आंकड़े बताते हैं कि 1994 से 2011 के बीच सात लाख पचास हजार आठ सौ साठ किसानों ने लगातार बढ़ते कर्ज, फसल की लागत नहीं बढ़ने, अपनी उपज के उचित दाम नहीं मिलने, फसल में घाटा होने या प्राकृतिक कारणों से फसल बर्बाद होने या सिंचाई की सुविधा नहीं मिल पाने जैसी परिस्थितियों से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े कहते हैं कि 2014-15 में किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने की दर में 42 फीसद बढ़ोतरी हुई है। जिस समाज में सत्तर प्रतिशत आबादी का जीवन कृषि से जुड़े विविध व्यवसायों पर आधारित हो और नौ करोड़ परिवार किसान ही हों, उस समाज में आत्महत्याओं का यह आंकड़ा डराता है। खासकर तब जब महाराष्ट्र के अहमदनगर के श्रेयस अभाले नामक किसान को 2657 किलो प्याज बेचने पर अपनी लागत और मंडी तक उपज के परिवहन का मूल्य चुकाने के बाद केवल छह रुपए का ही लाभ बचा हो। श्रेयस अभाले का यह मामला तब सामने आया जब उसने भी प्रतीकात्मक विरोध के तौर पर मुनाफे के ये छह रुपए भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को भेज दिए। लेकिन यह अकेला ऐसा उदाहरण नहीं है। यूरिया खाद के लिए घंटों लाइन में खड़े रहने और अपनी फसल को बचाने के लिए रात-रात भर खेतों में जागने के बाद किसान अपनी उपज के बदले बहुधा जो दाम प्राप्त करता है, वह इतना भी नहीं होता कि संपूर्ण लागत निकालने के बाद अपने परिवार को सुख के सपने सौंप सके। महाराष्ट्र में किसानों ने पिछले दिनों इसलिए खेतों में खड़ी बैंगन की फसल नष्ट कर दी थी कि उन्हें बैंगन की कीमत बीस पैसे प्रति किलो मिल रही थी और वे लागत तक नहीं निकाल पा रहे थे। मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी मंडियों में एक नीमच की मंडी में कुछ दिनों पहले प्याज का भाव पचास पैसे प्रति किलो और लहसुन का भाव दो रुपए प्रति किलो लगाया गया। राजस्थान के हाड़ौती संभाग में बीते जून में लहसुन के कम दामों से परेशान करीब आधा दर्जन किसानों ने आत्महत्या कर ली।

इन परिस्थितियों ने किसानों को असंतोष से भर दिया है। यह असंतोष या तो आंदोलन के रूप में सामने आया है या आत्महत्याओं के रूप में। हालत यह है कि देश के कई राज्यों में शहरों के किनारे बसे गांवों में तो किसान अपनी कृषि भूमि को रिहायशी बस्तियों के लिए बेचने में ही अपनी परेशानियों से निजात का उपाय देखने लगे हैं, लेकिन देश की खाद्य निर्भरता की दृष्टि से यह स्थिति अनेक कुप्रभावों की वाहक हो सकती है। सरकारी स्तर पर खरीद के लिए न्यूनतम मूल्य प्रणाली और फसल बीमा जैसी योजनाएं अपनी तकनीकी उलझनों और जिम्मेदार लोगों की असंवेदनशीलता के कारण किसानों को वांछित लाभ देने में सक्षम सिद्ध नहीं हुई हैं। किसानों को मिलने वाली अधिकतर सुविधाओं का लाभ केवल वह वर्ग उठा पाता है जो आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक दृष्टि से समृद्ध है। निश्चित रूप से इस वर्ग के अधिकतर लोग वास्तविक किसान नहीं होकर ऐसे भूमिपति हैं जो तंत्र द्वारा सृजित प्रावधानों में अपने मुनाफे का मौका तलाश लेते हैं।

कुछ समय पहले मध्यप्रदेश के मंदसौर में हुआ किसान आंदोलन पूरे देश के मीडिया की सुर्खियों में रहा था। इसके अलावा, कई इलाकों से किसान असंतोष की खबरें आर्इं। पिछले महीने दिल्ली में विविध किसान संगठनों के आह्वान पर कई राज्यों के हजारों किसानों ने प्रदर्शन किया। आंदोलन में शामिल किसानों का दर्द उनकी बातों में प्रतिबिंबित हो रहा था। पंजाब के मोगा जिले से इस प्रदर्शन में शामिल होने आए पैंसठ वर्षीय अमरजीत सिंह के पास कुछ समय पहले तक दो एकड़ जमीन थी, जिस पर वह खेती करता था। जब किसानों को बैंक-ऋण से माफी मिली तो अमरजीत सिंह को खराब माली हालत के बावजूद इसलिए इस ऋण-माफी का लाभ नहीं मिल सका कि उसने अपने सामर्थ्य के दिनों में इस ऋण को ईमानदारी से चुकाने का प्रयास किया था। परिणाम यह हुआ कि बैंक के तकाजों से मुक्ति पाने के लिए उसे अपनी जमीन बेचनी पड़ी और पिछले दो सालों से वह अपने पड़ोसी के खेत में दो सौ रुपए दिहाड़ी के कृषि-श्रमिक के तौर पर काम कर रहा है। इस स्थिति का सबसे बुरा असर यह हुआ कि उसे अपनी बेटी की पढ़ाई तक छुड़वानी पड़ी।

ऐसा नहीं है कि किसानों की समस्या के समाधान के लिए नीति-निर्धारण की दिशा में प्रयास नहीं हुए। लेकिन उन प्रयासों के क्रियान्वयन में जमीनी हकीकत से जुड़ाव और अपेक्षित संवेदनशीलता के अभाव ने किसानों की परेशानियों को नहीं सुलझने दिया है। एमएस स्वामीनाथन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सरकार को न्यूनतम खरीद मूल्य निर्धारित करते समय लागत का डेढ़ गुना देना चाहिए और सरकारी दावे हैं कि इक्कीस प्रमुख फसलों के लिए इस नीति का निर्वहन किया जा रहा है, लेकिन सरकारी लागत में समस्त सहभागियों के श्रम की कीमत, जमीन के संभावित किराए की कीमत और अध्यारोपित निवेश का समावेश नहीं होता। जबकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों में इनका समावेश किया जाना भी प्रस्तावित था। सन 2022 तक किसान की आय को दुगुना किए जाने के वायदे के निर्वहन के लिए गठित सरकारी पैनल ने अपनी भारी-भरकम रिपोर्ट तो दे दी है, लेकिन इसका अंतिम निस्तारण अभी तक मंत्रालय स्तर पर लंबित है। यों भी आजादी के बाद से अब तक नीतियां तो कई बनी हैं, लेकिन जिम्मेदार लोगों की असंवेदनशीलता ने किसानों के दुख को कम नहीं होने दिया। आवश्यकता इस बात की है कि किसानों के दुख को समझा जाए और उन्हें सिर्फ वोट बैंक समझने के स्थान पर सभी राजनीतिक दल उनकी समस्याओं के निस्तारण के लिए संवेदनशील रुख अपनाएं।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 किताबें मिलीं: अयोध्या: रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का सच, आरटीआइ से पत्रकारिता
2 नन्ही दुनिया: कविता और शब्द भेद
3 कहानी: नन्हा सांता क्लॉज
यह पढ़ा क्या?
X