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स्त्री उत्पीड़न का मकड़जाल

स्त्री विमर्श में अब नए दृष्टिकोण उभर रहे हैं। अब हर जगह इस उलझन को सुलझाने के प्रयास दिखाई देते हैं कि स्त्री का उत्पीड़न और शोषण कौन अधिक करता है- स्त्री या पुरुष। अब कुछ लोग इस बनी-बनाई धारणा को ही खारिज करते मिलते हैं कि स्त्री का उत्पीड़न पुरुष के बजाय स्त्री अधिक करती है। पर असल बात है कि स्त्री सशक्तीकरण के तमाम नारों और प्रयासों के बावजूद स्त्री की दशा में संतोषजनक बदलाव नहीं आया है। बल्कि उसकी मुश्किलें बढ़ाने वाले दूसरे कई कारण पैदा हो गए हैं, उसकी स्वतंत्रता संबंधी चुनौतियां बढ़ी हैं। स्त्री की नई स्थिति का विश्लेषण कर रही हैं विभा त्रिपाठी।

Author Updated: March 11, 2018 2:39 AM
भारतीय समाज में अज्ञान और अशिक्षा की जड़ें आज भी काफी गहरी हैं।

विभा त्रिपाठी

अगर आधुनिक समय में महिला के सम्मान, स्वास्थ्य, सुरक्षा, स्वतंत्रता, समानता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए वैचारिक आंदोलनों की बात की जाए तो अठारहवीं शताब्दी से हमें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके प्रमाण मिलते हैं। स्त्रीवादी आंदोलन, जो मूलत: महिला की समानता की लड़ाई से प्रारंभ हुआ, इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक तक आते-आते इतने भागों में विभाजित होता गया कि इनके बीच एक ही मुद्दे पर परस्पर विरोधी विचार सामने आने लगे। चाहे वह महिला स्वातंत्र्य हो या फिर महिला उत्पीड़न। महिला स्वातंत्र्य से हम क्या समझते हैं? और महिला स्वातंत्र्य का विस्तार कहां तक जाएगा? महिला अपराध और महिला उत्पीड़न के बीच उपजा यह प्रश्न कि क्या एक महिला का ज्यादा उत्पीड़न दूसरी महिला द्वारा ही किया जाता है? क्या महिलाओं द्वारा विभिन्न प्रकार के पद, दायित्व और भूमिका का निर्वहन करते समय उसी दौर की यात्रा कर चुकी महिला ज्यादा बड़ी अवरोधक बन कर उभरती है? ये कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं, जिनकी अब अनदेखी नहीं की जा सकती। नारीवादी विधिशास्त्री लॉयड ने अपनी पुस्तक ‘विधिशास्त्र’ में लिखा है कि यह एक घर की भांति है, जिसमें कई कमरे हैं। इसके चलते हमें नारीवादी विचार के अंतर्गत कई आंदोलन दिखाई देते हैं। मसलन, उदारवादी, समाजवादी, अतिवादी और उत्तर-आधुनिक नारीवाद। इसके अलावा ब्लैक (काले) और लेस्बियन (समलैंगिक) नारीवाद का भी उल्लेख मिलता है।

उदारवादी विचारकों का मानना है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं के साथ उसी प्रकार का समान व्यवहार किया जाए जैसा पुरुषों के साथ किया जाता है। समाजवादी स्त्रीवादियों का मानना है कि स्त्रियों के दमन का कारण समाज का वर्गगत ढांचा है, जिसमें पुरुष को सभी संपत्ति का, यहां तक कि स्त्री का भी, स्वामी माना गया है। इसलिए ये सामाजिक संरचना के वर्गगत ढांचे को बदलने की बात करते हैं। अतिवादियों का मानना है कि स्त्री पुरुष के भिन्न यौनिक व्यवहार के लिए उनका सामाजिक प्रारूप जिम्मेदार है। वहीं उत्तर-आधुनिक स्त्रीवादियों का मानना है कि महिलाओं की समस्या वैश्विक स्तर पर समान नहीं है। क्षेत्र विशेष की स्त्रियों की समस्या विशेष प्रकृति की है। इनका मानना है कि दासता के काल को छोड़ दिया जाए तो आज के अमेरिकी समाज में गोरे और काले वर्ण की महिलाओं में आपसी मतभेद हैं। सबसे अहम बात जो सामने आई है वह यह कि इनका मानना है कि स्त्रियां भी स्त्रियों का शोषण कर रही हैं। ऐसा हो सकता है कि महिला शरीर से स्त्री हो, पर मानसिक रूप से पुरुष और पितृसत्तात्मक मूल्यों की पोषक हो।

विवाह संस्था बनाम उत्पीड़न के आयाम
समाजशास्त्र में विवाह को एक सामाजिक संस्था की संज्ञा दी गई है। पर आज इस संस्था पर एक साथ अनेक प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। मसलन, यह संस्था है, संस्कार है, संविदा है या उत्पीड़न का एक यंत्र? अंतिम प्रश्न को सबसे पहले लेने की अपनी एक वजह है कि आखिर क्यों विवाह को उत्पीड़न का एक यंत्र समझा जाता है? स्त्रीवाद के विभिन्न प्रकार इसकी अपने ढंग से व्याख्या कर सकते हैं, पर यहां मूल प्रश्न यह है कि क्या यह उत्पीड़न महज पति द्वारा अपनी पत्नी के खिलाफ किया जाता है या इसकी परिधि में कुछ अन्य पक्षकार हैं, जो परदे के पीछे से अपनी भूमिका निभाते हैं? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें महिलाओं के खिलाफ होने वाले कुछ अपराधों की परिभाषा को देखना होगा कि क्या इन अपराधों में सिर्फ पति शामिल हैं या पति के नातेदार और रिश्तेदार भी शामिल हैं। अगर इन्हें शामिल किया गया है, तो इन्हें दोषी सिद्ध होने का प्रतिशत क्या है? आज की तारीख में ‘दहेज हत्या’ और क्रूरता के जितने भी मामले न्यायालय ने निर्णीत किए हैं, उसमें पति के नातदारों में महिलाएं भी शामिल हैं, उन्हें भी दंडित किया गया है। पर बात जब महिला संगठनों के द्वारा महिला अधिकारों पर की जाती है, तो ऐसी महिलाओं का संदर्भ नहीं दिया जाता और अगर दिया भी जाता है तो मानसिकता के नाम पर। यानी जो नारी, नारी-उत्पीड़न में हिस्सेदार होती है वह पुरुष मानसिकता से शासित होती है। इसीलिए स्त्रीवाद पुरुषों की खिलाफत न कर पुरुष मानसिकता की खिलाफत करता है। ऐसी घटनाओं के पीछे मानसिकता से ज्यादा तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस के उत्तरकांड की यह चौपाई है कि ‘मोहे न नारि नारि के रूपा, पन्नगारि यह तत्त्व अनूपा।’ इस चौपाई के संदर्भ में जब एक महिला द्वारा महिला उत्पीड़न की बात की जाती है तो वह निराधार और निर्मूल नहीं प्रतीत होती। हां, उत्पीड़न का क्रम कभी एक महिला द्वारा और कभी महिलाओं के समूह द्वारा एक सामूहिक गतिविधि के रूप में होता है। ऐसी घटनाएं महापुरुषों द्वारा कहे गए सूत्रवाक्यों की अनदेखी कर की जाती हैं। मसलन, अगर महात्मा गांधी के उस कथन को, जिसमें उन्होंने कहा था कि जो व्यवहार आपको अपने प्रति बुरा लगता है, उसे आपको दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए और दूसरा कि जो परिवर्तन आप दुनिया में देखना चाहते हैं उसके लिए स्वयं को सबसे पहले परिवर्तित कीजिए। इसी प्रकार रेकी दर्शन में कहा गया है कि ‘बिना घायल हुए दूसरों का दर्द समझने की शक्ति हम सबमें होती है, केवल हमारे स्वार्थ हमें उससे परे ले जाते हैं।’ स्पष्ट है कि यहां मानसिकता के स्थान पर स्वार्थ ही प्रमुख रहता है।

मूल में अशिक्षा या शिक्षा
भारतीय समाज में अज्ञान और अशिक्षा की जड़ें आज भी काफी गहरी हैं। जो शिक्षित है वह भी सही मायने में दीक्षित नहीं है और यही वजह है कि अपने संकीर्ण और तुच्छ हितों की पूर्ति के लिए वह दूसरे के दिल और दिमाग, दोनों को क्षतिग्रस्त करने में गुरेज नहीं करती। आचार-व्यवहार और लोकाचार में प्रचलित लोकोक्तियां और मुहावरे भी इन्हीं बातों को दोहराते हैं। जैसे, ‘सास कभी मां नहीं हो सकती और बहू कभी बेटी नहीं हो सकती है’ या ‘जेठानी, देवरानी सगी’ और सास-ननद पराई होती हैं। कभी-कभी कार्यस्थल को प्रतिस्पर्धा को जेठानी-देवरानी मानसिकता करार दिया जाता है। कहने का तात्पर्य यह कि विवाह संस्था में शामिल होने मात्र से बनने वाले महिलाओं के परस्पर संबंध (सास-बहू, देवरानी-जेठानी, ननद-भौजाई) शोषण, उत्पीड़न, षड्यंत्र और छल के नए प्रतिमान स्थापित करते हैं। ऐसे में विभिन्न सूक्तियां कथानक के अनुसार अपना संदर्भ और प्रसंग भी बदलती रहती हैं। आज घरेलू हिंसा से महिलाओं को संरक्षण देने वाले अधिनियम में ‘सहजीवन’ को इस कारण स्वीकार किया गया है ताकि ऐसी महिला घरेलू हिंसा की शिकार न हो सके। क्योंकि वैश्वीकरण, बाजारीकरण, औद्योगीकरण और नगरीकरण के इस दौर में महिलाएं घर से बाहर नौकरी के लिए निकलते समय काफी दूर तक चली जाती हैं, जहां उनके पास विवाह जैसी संस्था में शामिल होने का समय नहीं होता। पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिला लैंगिक रूप से भी आत्मनिर्भर होना चाहती है। फिल्म ‘पीकू’ में इसकी जोरदार वकालत की गई है। ऐसी महिला उन तमाम साहित्यकारों की रचनाओं में गढ़े नारी पात्रों पर खरी नहीं उतरती, जिन्होंने सहजीवन को प्रेमाकर्षण की सर्वोच्च सीमा बताया और समर्पण के बिना ‘प्रेम’ को ‘वासना’ कहा गया। आज बिना समर्पण और बिना वासना जैसे नकारात्मक विचार के ‘सहजीवन’ में रहना एक शारीरिक आवश्यकता कहा जा रहा है। (विकास के इस धरातल पर बुद्धिजीवी मनुष्य की सोच और पशु की सोच के बीच का अंतर समाप्त-सा दिखता है) पर महिला संगठनों और नारीवादियों द्वारा ऐसे कथनों को आड़े हाथों लिया और इसे घोर सामंती सोच का परिचायक भी कहा जा सकता है।

आज के बदलते समाज में एक पुरुष जब अपनी पत्नी को गांव में छोड़ कर शहर में बस जाता है और एक अन्य महिला के साथ संबंध में रहने लगता है तो महिलाओं के हितों के रक्षार्थ बनाए गए तमाम कानूनों की धज्जियां उड़ जाती हैं। मतलब, एक अविवाहिता स्त्री जब एक विवाहित पुरुष के साथ स्वेच्छा से संभोग करती है तब उस पुरुष की विवाहिता के पास सिवाय तलाक के और कोई विकल्प नहीं बचता। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि कैसे जाने-अनजाने एक स्त्री दूसरी स्त्री के अधिकारों का हनन करती है। संभव है कि पुरुष पक्षकार ज्यादा दोषी इसलिए है कि उसने अपनी वैवाहिक स्थिति का जिक्र ही न किया हो और वह स्त्री अपने स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग कर रही हो। दूसरी स्थिति ऐसे विवाह की हो सकती है, जिसे कानून ने कोई मान्यता ही न दी हो। मसलन, मंदिर में माले के आदान-प्रदान से विवाह आदि। ऐसी स्थिति में जो पक्षकार द्विविवाह का मामला दर्ज कराना चाहेगा वह विफल हो जाएगा, क्योंकि भाउराव शंकर लोखंडे बनाम स्टेट आॅफ महाराष्ट्र के मामले में उच्चतम न्यायालय ने ‘विधित: विवाहित’ की जो संकल्पना दी है, उसकी कठोर अर्थों में सिद्धि संभव नहीं हो पाती।

विधिक जगत में पीड़ित एक लंबे अर्से से हाशिए पर था। उसके विरुद्ध अपराध होता था तो दोष सिद्ध होने पर अपराधी को दंडित कर दिया जाता था, पर पीड़ित को किसी भी प्रकार की सहायता नहीं दी जाती थी। धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस बाबत पहल की गई और पीड़ित को क्षतिपूर्ति प्रदान करने और उसे पुन: स्थापित करने की दिशा में कदम उठाए गए। वर्तमान में विभिन्न अपराधों के पीड़ितों के लिए क्षतिपूर्ति प्रदान करने की कार्यवाही की जा रही हैं। पर इस संदर्भ में किसी विशिष्ट कानून के न होने की वजह से मामले के निर्णय में न्यायपालिका की बहुत बड़ी भूमिका होती है। निश्चितता के अभाव में कई बार क्षतिपूर्ति का मामला राजनीति का शिकार भी हो जाता है। जैसे बलात्संग के एक ऐसे मामले में जिसमें घटना के कुछ वर्षों बाद पीड़िता का विवाह हो जाता है और अभियुक्तों का भी विवाह हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में कहा गया कि अब तक जो साढ़े तीन वर्ष के कारावास की सजा अभियुक्तों ने भुगती है, उसे पर्याप्त माना जा सकता है, जब पचास हजार रुपए पीड़िता को क्षतिपूर्ति के रूप में दिए जाएं। इस निर्णय के आलोक में सर्वोच्च न्यायालय की महिला अधिवक्ताओं ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की और कहा कि क्षतिपूर्ति की व्यवस्था को दंड के साथ जोड़ कर नहीं देखना चाहिए, दंड की मात्रा को कम करने में क्षतिपूर्ति की धनराशि का कोई योगदान नहीं होना चाहिए। दंडशास्त्रियों में भी इस बिंदु पर मतैक्य नहीं है। किसी ने सुधारवादी दृष्टिकोण से इसकी प्रशंसा की, तो किसी ने भयकारी सिद्धांत के दृष्टिकोण से इसकी आलोचना की। चूंकि अपराध व्यक्ति के विरुद्ध होता है, पर कार्यवाही राज्य के नाम पर की जाती है, इसलिए पीड़िता को अपनी बात रखने का हक नहीं मिल पाता।

महिला राजनीति की दिशा
जहां तक इस मुद्दे पर हो रही राजनीति का प्रश्न है, तो हमारे देश की महिला राजनितिज्ञों ने इस पूरी विचारधारा का मखौल उड़ाया है। एक महिला राजनीतिज्ञ पूछती है कि अगर दूसरी महिला के साथ बलात्संग हो जाए, तो क्षतिपूर्ति की कितनी धनराशि पर्याप्त होगी। कहने का तात्पर्य है कि इतने संवेदनशील मुद्दों पर अगर महिलाओं तक में आम सहमति न बन पाए और पार्टी विशेष की राजनीतिक विचारधारा ही महिला मुद्दों पर भी हावी हो जाए, तो स्थिति निश्चित तौर पर हास्यापद हो जाती है। इसलिए ऐसे मामलों में गहरी संवेदनशीलता के साथ सोचने की आवश्यकता है। यहां बात कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की न होकर महिला प्राधिकारी द्वारा महिला कर्मचारी के हितों की अनदेखी कर उसका उत्पीड़न करने की है। वर्तमान समय की मांग को देखते हुए महिलाओं को प्रसूति सुविधा अधिनियम 1861 के अंतर्गत छह माह के मातृत्व अवकाश का प्रावधान रखा गया है। इस प्रावधान का लाभ ऐसी दैनिक वेतन भोगी महिला तक विस्तारित है, जिसने कुल अस्सी दिन की सेवाएं उस संगठन में प्रदान की है। पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि जिन महिला अधिकारियों के समय यह अवकाश तीन माह या साढ़े चार माह तक का था, उन्हें छह माह का अवकाश कुछ ज्यादा लगता है। उनकी सोच यह है कि जब कम अवधि के अवकाश में उन्होंने सब कर लिया तो ये महिलाएं क्यों ज्यादा लाभ ले रही हैं? वर्तमान समय में केंद्र सरकार द्वारा बच्चों की देखभाल हेतु दो साल तक के अवकाश का प्रावधान रखा गया है। जो मूल रूप से एकल परिवार की महिला को नौकरी, परिवार और बच्चे के सर्वोत्तम हितों के संरक्षण में संतुलन बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण है। कई बार बोर्ड परीक्षा के दौरान या सामान्य परीक्षा के समय भी बच्चे अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या जैसा गंभीर कदम उठा लेते हैं। इस प्रकार के अवकाश के पीछे ऐसे बच्चों को संभालना एक राष्ट्रीय कर्तव्य समझा गया और राज्य ने अभिभावक की भूमिका निभाते हुए ऐसे प्रावधानों का सृजन किया। पर इस बाबत किए गए अध्ययनों ने यह सिद्ध किया है कि सामान्यतया पुरुष प्राधिकारी तो अवकाश प्रदान करने में समस्या नहीं बनते, पर महिला प्राधिकारी इसे सहजता से स्वीकार नहीं कर पातीं।

स्त्री बनाम स्त्री
कामकाजी महिलाओं पर अश्लील टिप्पणियां करने में दूसरी कामकाजी महिलाएं पीछे नहीं रहतीं और केवल अपनी प्रोन्नति को सही मानती हैं और दूसरी सहकर्मी की प्रोन्नति को उसके द्वारा अपनाया गया हथकंडा समझती हैं। इस प्रकार के वातावरण का पितृसत्तात्मक समाज मे कितना दुरुपयोग हो सकता है इसका उनको अंदाजा भी नहीं होता। घर और बाहर के महिला बनाम महिला के उल्लेख के पश्चात हिंसा के संदर्भ में जो नए शोध हो रहे हैं, उनसे स्पष्ट होता है कि समलैंगिक संबंध में रहने वाली महिला भी अपने सहयोगी महिला के विरुद्ध हिंसा का प्रयोग कर रही हैं। इस संदर्भ में जो विवरण उपलब्ध हैं उसमें करेन डेविस के आलेख में लेस्बियन समुदाय द्वारा आपसी हिंसा की समस्या को उठाया गया है। इस आलेख में हिंसा के मूल कारण पर प्रकाश डालते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि लोग इसलिए किसी को पीटते हैं, ताकि उन पर नियंत्रण रखा जा सके, यह शक्ति और सामर्थ्य का मसला है। महिला पुरुष संबंध में भी और समलिंगी महिलाओं के मामले में भी। यानी जो महिला ज्यादा शक्तिशाली और प्रसिद्ध है, वह हिंसक है। बहुत से विधिवेता और समाजशास्त्री जो ‘महिलाओं के विरुद्ध हिंसा’ विषय का अध्ययन करते हैं वे पुरुषों के विरुद्ध हिंसा से अलग हट कर करते हैं, जिससे इसका निर्वचन उनके द्वारा लैंगिकवाद के एक प्रकार के रूप में किया जाता है।

इक्कीसवीं शताब्दी में सब कुछ बदलने के साथ बदल गया है महिला शोषण का तरीका भी। आज की सशक्त नारी ने औरतों के शोषण की जिम्मेदारी खुद ही संभाल ली है। हां, यह बात निश्चित नहीं हो पाई है कि इसे युगों तक की उसकी शोषित मानसिकता का परिणाम समझा जाए या नारी सशक्तीकरण की उपलब्धि। इंटरनेट पर ऐसी कई साइटें हैं, जिन पर महिला द्वारा महिला के शोषण के मुद्दे पर गंभीर बहस की जा रही है। आज इस पर आत्ममंथन की आवश्यकता है। कहते हैं कि दूसरों पर अंगुली उठाते हैं तो तीन अंगुलियां हमारी तरफ होती हैं, जो आत्मावलोकन का संदेश देती हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि अगर महिलाओें में ऐसी चेतना जागृत हो कि हर महिला यह मान ले कि उसके द्वारा उसके संदर्भ में व्याख्यायित होने वाली किसी महिला के हितों का दुरुपयोग नहीं किया जाएगा तो निश्चय ही महिलाओं को विधि में प्रदत्त अनेक अधिकार उसे आसानी से उपलबध हो जाएंगे। अगर सभी महिलाएं यह निश्चय कर लें कि वे स्वयं कभी किसी महिला के अधिकार का हनन नहीं करेंगी, तो उन्हें इसी ‘कलयुगी’ समाज में स्वर्णिम सुख की प्राप्ति हो सकेगी, क्योंकि ‘कलयुगी समाज’ नहीं होता, बल्कि ‘कलयुगी मानसिकता’ होती है।

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