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मुरलीधर वैष्णव की कविता : चींटी का उपकार

चींटी बिल पानी में डूबे, लगीं मचाने वे भी शोर, पत्तों की नावें तब आर्इं, ले चलीं उन्हें पेड़ों की ओर

Author नई दिल्ली | June 12, 2016 3:32 AM
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आसमान से आग बरसती
वन में हाहाकार मचा
शेर सियार हरिण और भालू
तेज तपन से कौन बचा

एक पेड़ की छांव में बैठे
बैर भाव आपस का भूले
सबके प्राण गले में अटके
बिन पानी अब सांस ही फूले

चींटी बिल से निकली तब
नाच कूद सहगान किया
मत घबराना वन के साथी
बारिश का एलान किया

शेर हुआ खुश ली जम्हाई
हाथी ने सूंड़-सलाम किया
हरिण उछलने लगा वहीं पर
भालू ने करताल किया

तभी उमड़ कर बादल आए
गरजे बरसे चारों ओर
प्यास बुझाने तब सब भागे
नाच उठे जंगल में मोर

चींटी बिल पानी में डूबे
लगीं मचाने वे भी शोर
पत्तों की नावें तब आर्इं
ले चलीं उन्हें पेड़ों की ओर

(मुरलीधर वैष्णव)

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