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कहानी: सपनों की दुनिया

ईशु अब एक ऐसी दुनिया में था, जहां दूर-दूर तक साफ-सुथरी सडकें, हरे-भरे पेड़-पौधे, साफ और ताजी हवा। चारों ओर शांति। वह एक पेड़ के नीचे बैठ कर यह सब देखने लगा। उसे वहां बहुत अच्छा लग रहा था। अचानक दूर से कोई आता दिखाई दिया। थोड़ा पास आने पर उसने देखा कि वह देवदूत जैसा था।

Author January 13, 2019 2:22 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

पवन कुमार वर्मा

ईशु को नींद आ रही थी। रात के खाने पर ही पापा से दिन-भर की बातें होती हैं। पर पापा तो अभी तक लौटे ही नहीं। ‘ईशु बेटा, तुम खाना खा लो। पापा को देर हो सकती है। सुबह तुम्हें स्कूल के लिए जल्दी उठना भी है।’ मम्मी ने उसे आवाज दी। ‘थोड़ी देर और रुक जाइए। पापा आते ही होंगे। तब तक मैं कुछ और पढ़ लेता हूं।’ ईशु बोला। मम्मी ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। थोड़ी देर बाद उसे बाहर मोटरसाइकिल रुकने की आवाज सुनाई दी। ‘लगता है पापा आ गए।’ ईशु तुरंत बाहर की ओर दौड़ा। पापा ही थे। उन्हें देख कर ईशु खुश हो गया। उसकी बातें वहीं से शुरू हो गर्इं। पापा भी उसकी हां में हां मिला रहे थे। उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल एक ओर खड़ी कर दी।

दोनों बातचीत करते घर के अंदर आ गए। ईशु ने देखा कि पापा का चेहरा पूरी तरह काला हो गया है… साथ में कपड़े भी गंदे हो गए हैं ।
‘पापा। आपका चेहरा तो काला हो गया है… और कपड़े भी!’ पापा को इस हाल में देख कर उसने पूछा।
‘आजकल चारों ओर उड़ती धूल और गाड़ियों के धुएं ने सड़क पर चलना मुश्किल कर दिया है।’ मम्मी बोलीं। वे पापा के लिए पानी लेकर आई थीं।
‘थोड़ा रुक जाओ। पहले हाथ-मुंह धो लूं, फिर पानी पीता हूं।’ पापा ने कहा और हाथ-मुंह धोने चले गए।
थोड़ी देर बाद मम्मी ने आवाज दी, ‘अब आप लोग खाना खा लीजिए। बहुत देर हो गई है।’ पापा और ईशु खाने की टेबल पर आ गए।
‘क्या बात है, आज आप को घर लौटने में बहुत देर हो गई?’ मम्मी ने पूछा।
‘हां, रास्ते में एक जगह कई गाड़ियां फंस गई थीं। इसीलिए देर हो गई।’ पापा ने पूरी बात बताई।
‘सड़क पर इतनी गाड़ियां हो गई हैं कि पूछो मत। कोई इन्हें रोकता भी नहीं।’ पापा की बुरी हालत देख कर मम्मी गुस्से में थीं।
मम्मी के हाथ की बनी गोभी की सब्जी ईशु को बहुत पसंद है, वह उसे खाने में जुटा था। अचानक उसे याद आया कि उसका दोस्त प्रत्यक्ष एक बार छुट्टियों में जब घर जा रहा था तब वह भी ऐसे ही भीड़ में फंस गया था। उसकी तो ट्रेन भी छूट गई थी।
खाना खाने के बाद पापा सीधे अपने बिस्तर पर चले गए। वे आज बहुत थक गए थे। ईशु भी पापा के पास आकर लेट गया। स्कूल की बातें करते-करते वह सो गया।

ईशु अब एक ऐसी दुनिया में था, जहां दूर-दूर तक साफ-सुथरी सडकें, हरे-भरे पेड़-पौधे, साफ और ताजी हवा। चारों ओर शांति। वह एक पेड़ के नीचे बैठ कर यह सब देखने लगा। उसे वहां बहुत अच्छा लग रहा था। अचानक दूर से कोई आता दिखाई दिया। थोड़ा पास आने पर उसने देखा कि वह देवदूत जैसा था। उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे। लंबी रेशम जैसी सफेद दाढ़ी थी और उसके हाथ में एक चमकदार लाठी भी थी।
‘लगता है तुम कहीं बाहर से आए हो?’ उसने ईशु से पूछा।
‘जी हां। क्या मैं जान सकता हूं कि यह कौन-सी जगह है?’
‘यह सपनों की दुनिया है। यहां आकर तुम्हें कैसा लगा?’ देवदूत ने कहा।
‘ बहुत अच्छा। मुझे यह जगह बहुत अच्छी लगी।’ ईशु के चेहरे पर चमक थी।
‘यह दुनिया हमारे मन से चलती है। जैसा हम चाहते हैं, यह वैसी हो जाती है। अगर तुम चाहो तो तुम भी ऐसी दुनिया बना सकते हो।’ देवदूत ने उसे बताया।
‘वह कैसे?’
‘देखो। हम सबको ताजा हवा में रहना अच्छा लगता है। धुएं और धूल भरी हवा किसी को अच्छी नहीं लगती। इसलिए हमें अधिक से अधिक पौधे लगाने चाहिए। हर काम के लिए मोटर-साईकिल या कार का प्रयोग नहीं करना चाहिए। उससे ही ज्यादा धुआं फैलता है। अब तो कई देशों में लोग गाड़ियों की जगह साईकिल का प्रयोग करते हैं।’
ईशु बहुत ध्यान से उसकी बातें सुन रहा था। उसने भी सुन रखा था कि ज्यादा देर तक धूल और धुएं में रहने से सांसों की गंभीर बीमारी हो जाती है।
अचानक उसे लगा कि सब कुछ हिल रहा है। वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा। घबराहट में उसकी आंखें खुल गर्इं।… ओह। तो मम्मी उसे स्कूल के लिए जगा रहीं थीं।
ईशु स्कूल जाने की तैयारी में जुट गया। लेकिन उसका मन अब भी सपनों की दुनिया में था।… क्या यहां भी ऐसा हो सकता है? अगर वहां हो सकता है, तो यहां क्यों नहीं?

स्कूल में जब उसने अपने दोस्तों को अपने सपने के बारे में बताया तो उन्हें भी आश्चर्य हुआ। उन्होंने ऐसी दुनिया के बारे में सोचा भी नहीं था।
रात के खाने पर ईशु ने मम्मी-पापा को भी अपने सपने के बारे में बताया। उसकी बातें सुनने के बाद पापा थोड़ा रुक कर बोले, ‘देवदूत ने बिलकुल सच कहा। हम भी ऐसी दुनिया बना सकते हैं। लेकिन इसके लिए सबको मिलकर प्रयास करना होगा।’
अगले दिन स्कूल जाने के लिए ईशु तैयार था। पापा उसे स्कूल छोड़ कर ही अपने काम पर जाते हैं।
‘चलो बेटा, मै तैयार हूं।’ पापा ने उसे आवाज दी। उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल बाहर निकाल ली थी।
ईशु अपने स्कूल बैग के साथ बाहर आ गया। मम्मी भी उसे छोड़ने बाहर तक आर्इं।
‘पापा। आज से मैं पैदल ही स्कूल जाऊंगा। मेरा स्कूल तो पास ही है। आप भी सिटी बस में जाइए, मोटरसाइकिल से नहीं। सब लोग ऐसा करेंगे तो सड़कों पर गाड़ियों की संख्या कम होगी जिससे धुआं भी कम होगा।’ ईशु मुस्करा रहा था।

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