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कविता- हमारी जिंदगी, पहले पहल

पद्मा सचदेव की कविताएं।

प्रतीकात्मक चित्र।

हमारी जिंदगी

बह रहा दरिया हमारी जिंदगी
किसी पहाड़ी गीत की धुन है
हमारी जिंदगी
चारों तरफ कितना कुछ है रोज बहता
सागर में मिल कर ये समुद्र होता जा रहा

नाम तो बड़ा बहुत समुद्र का
पर अपना नाम फिर भी अपना है

इसी दरिया में अडोल पड़ी हूं मैं यों
जैसे डल लेक में कमल के फूल पड़े हैं
राजाओं महाराजाओं की तस्वीर जैसी
बुत हूं
अपनी दोनों बाहों से दोनों तरफ
परे करती हूं वह सब
बाढ़ से जो भी है आता नदी में
आंख करके बंद
बीर बहूटी जैसे देखे
ख्वाब आने वाले कल के

देखना तुम कल तो बड़ा सुंदर होगा
मेरी धरती पर उगेंगे कई सूरज
अच्छी चहल पहल होगी
न कोई हिंदू न कोई सिख, मुसलमान होगा
बाहें खोल गले लगने को हर तरफ इंसान होगा।

पहले पहल

सुबह का पहर
सुबह का आसमान
जगते ही कहता है धरती को
मैं आ गया मेरी जान

थोड़ी देर में ही सूरज खिल जाएगा
सामने पहाड़ी की चोटी पर
धरती पर बिछ जाएगा सोना
चीड़ों की पत्तियां सोने से लद जाएंगी
हाथों में पहने सोने के गोखड़ू
हिल हिला कर सौदाई हो जाएंगी
लोग बिस्तर उठा कर दरिया में नहाने जाएंगे

मंदिरों में बज उठेंगी घंटियां, शंख, झांझ और घड़ियाल
स्त्रियां जल्दी जल्दी दरिया में नहा कर
मंदिर की सीढ़ियां चढ़ कर
नंदी के सिर पर लटकता घंटा बजा कर
डरा देंगी कबूतरों को
उड़ जाएंगे तोते और चिड़ियां
आसमान पंखों के उड़ने से भर जाएगा
पक्षियों को अपनी गोद में लेकर
आसमान कहता है
मेरी गोद बच्चों के साथ भरी है
भरी पूरी एक जान
यह आसमान भारत का है। ०

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