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कविताएं- जीत-हार, ईर्ष्या

वीरेंद्र सारंग की कविताएं

Author Published on: July 2, 2017 12:13 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

जीत-हार

तुम जीते न मैं जीता
कलही दिन कैसे बीता?
कोई न जीता!

तुम हारे न मैं हारा
तुम पी रहे जल खारा
मैं पारा
कोई न हारा!

तुम कलियों की छाया ताक रहे हो धरती पर
मैं प्रकाश जड़े मोती लिए घूमता छतरी पर

तुम थके न मैं थका
समय नहीं रुका
कोई नहीं थका!

तुम चले न मैं चला
न पानी हुए ग्लेशियर
न हिम गला
तेरे फीलपांव
मेरे सिर पर बला
कोई नहीं चला!

तुम महासागर के टापू को झांक रहे हो खिड़की से
मैं नदियों के घाट की दूरी पूछ रहा हूं मकड़ी से

तुम रोये न मैं रोया
तुम जागे न मैं सोया
कोई न रोया!

मैं कांप रहा हूं खुद अपना गला दबा कर
तुम भीख मांगते अपनी आंख फोड़वा कर

तुम खोए मैं भी खोया
खूब लड़-झगड़ कर अपने से, अपनों से
तुम पाए न मैं पाया
रगड़-रगड़ अपना माथा सपने में, सपनों से

तुम क्या जीते? क्या हारे?
यह अंकगणित समझाओ
मैं क्या हारा? क्या जीता?
यह बीजगणित सुलझाओ।

ईर्ष्या

सिर चढ़ी है ईर्ष्या
मन करता है नोच लूं सुंदरता
तभी किसी ने कहा-
हे हरपुर के मोंछ वाले बाबा!
जलने लगे हो क्या?
पानी सिर पर डाल लो एक-दो लोटा
हां, गंगा में डुबकी मत लगाना
देह में खुजली हो जाएगी।

ईर्ष्या का दौरा जब पड़ता है
तब रंग-बिरंगी कमीज हो जाती है
और मैं सूंघता हूं, करता हूं नाक बंद
देखोे तो कितनी गंदगी भरी है मेरे भीतर!

बच्चे डांटते हैं-
‘कि क्यों दिखता है दाग आपको
करते हैं घर की गोपनीयता भंग
ऐसा बूढ़ा नहीं देखा कि हरदम रहे डाह में
जिद कर लेते हैं तो नंगई पर उतर जाते हैं।’
मैं गमछे से मुंह ढंक लेता हूं

ईर्ष्या में बंधन नहीं होता
ईर्ष्या मुक्त क्यों है,
यह सोच होती है ईर्ष्या
और तब चाहता हूं,
किसी स्त्री से प्रेम-सौंदर्य पर बात करूं,
आंख लगा कर, आंख मटकाते हुए
और रंग लूं बाल ओठ, काजल के साथ
धनुषाकार भौंह में!
ईर्ष्या में कल्पना होते देर नहीं होती
कि अगला पहुंच गया कहां से कहां!
फिर तो खुली हवा में घुटन का होना भी
ईर्ष्या हो सकती है
कि उमर बढ़ेगी तो जरूरत होगी आक्सीजन की और!

व्यर्थ शृंगार में नेचुरल छोड़ देता हूं
और बिगाड़ देता हूं सारी संवेदनाओं का संतुलन
ईर्ष्या में!

कोई तो बताए क्या करूं-
जलते-भुनते जिंदगी बीत गई!
और वह जो बतियाने आ रहा है,
वह है जबर्दस्त ईर्ष्या में!

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