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कविताएं- आना, धरती

जितेंद्र श्रीवास्तव की कविताएं।

प्रतिकात्मक चित्र।

आना

कहीं भी जाना
अनिवार्यत: होता है कहीं से आना

आना ही सत्य है पूरा
जाना तो बस एक प्रक्रिया है
फिर फिर आने के लिए।

धरती

किसी बड़े शहर के ऊपर से
गुजर रहा है हवाई जहाज
धरती जगमग है बत्तियों से
जैसे वही हो चंद्रलोक
लड़कपन का माया बाजार

वैसे आप धरती पर रहें या उड़ें आसमान में
भूलती नहीं धरती अपना लगाव
वह खींच ही लेती है
अपने असीम ममत्व से
अपनी ओर

वह जानती है
चंद्रलोकों और मायाबाजारों का पूरा सत्य

मित्रो! उड़ना सुख है कुछ पलों का
नेह धरती का
नियामत है जीवन के लिए।

किसी दिन मलय समीर की तरह
कहां के लिए चले थे
कहां पहुंचे!
पलट कर देखा
दूर कहीं धुंधलके में खड़ा था इच्छा-मार्ग

तिश्नगी किस चीज की थी
बुझी किस चीज से!
जब सोचा
याद आए पानी के कई चेहरे
बदलते मौसमों के रंग
वे जरूरतें भी याद आर्इं जिन्हें लांघ न सका

यों ही चलते-गुजरते
जब-जब मिला कुछ
ठहर कर देखा-स्वीकारा उसे
याद आर्इं साथ-साथ
खेत-खलिहानों में छूट गर्इं कुछ विह्वल इच्छाएं

अजब-गजब है यह जीवन का जादू
कभी न रुकता चलता जाता
थाह नहीं इसका

जो छूट गया
आ न सका संग-साथ हमारे
नहीं रहेगा हरदम छूटा
उठेगा किसी दिन मलय समीर की तरह अपनी जगह से
और समा जाएगा किसी की पुतलियों में!

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