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जनसत्ता कवितआएं- गरमी कब जाएगी तू, छांव

जनसत्ता कविताएं।

Author Published on: June 18, 2017 4:01 AM
देश के अनेक हिस्से गर्मी और लू-लपट को झेल रहे हैं और आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना में लू के प्रकोप ने अब तक 432 लोगों की जान ले ली है। राहत की कोई संभावना नजर नहीं आ रही और भारतीय मौसम विभाग ने दोनों दक्षिणी राज्यों में काफी गर्म हवाएं चलने की चेतावनी जारी की है।

गरमी कब जाएगी तू

बहुत सताया तूने सबको
गरमी कब जाएगी तू?

टप टप टप टप चुए पसीना
पंखा कूलर चैन कहीं न।
कांटों जैसा जून महीना।

खिड़की से जबरन अंदर आ
मार रही है थप्पड़ लू।

दिन में दस दस बार नहाएं
लस्सी दो गिलास पी जाएं
खीरा ककड़ी जी भर खाएं।

फिर भी न जाने क्यों आखिर
रहा पसीना तन से चू।

गरमी जबसे शुरू हुई है
आफत में ये जान मुई है
कपड़े जैसे चुभे सुई है

गरम तवे-सा बिस्तर जलता
भट्टी जैसी तपती भू।

गरमी ने कर रखी गड़बड़
बादल दादा गरजो गड़गड़
गरमी भागे हड़बड़ हड़बड़।

खूब झमाझम बरसो दादा
अब गरमी हो जाए छू।

छांव

इतनी प्यारी कोमल छांव
जैसे मां का आंचल छांव।

बिछ जाती है बिस्तर-सी
देती थपकी हर पल छांव।

लुका छिपी खेला करती
पेड़ों के संग चंचल छांव।

कड़ी धूप में लगती ज्यों
खूब घनेरा बादल छांव।

थके बदन को सहलाती
मखमल जैसी कोमल छांव।

तपती गरमी में लगती।
पंखुड़ियों-सी शीतल छांव।

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