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कविताएं- अभी भी, खौफ

जयप्रकाश मानस की कविताएं

Author Published on: March 19, 2017 5:11 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

जयप्रकाश मानस
अभी भी

गूंज रही है चिकारे पर लोकधुन
पेड़ के आसपास अभी भी
अभी भी
छांव बाकी है
बाकी है
जंगली जड़ी-बूटियों की महक

चूल्हे के तीन ढेलों के ऊपर
खदबदा रहा है चावल-आलू अभी भी
पतरी-दोना अभी भी दे रहे हैं गवाही
कितने भूखे थे वे सचमुच

धमाचौकड़ी मचा रहे हैं बंदर अभी भी
पुन्नी का चंदा अभी भी टटोल रहा है
यहीं कहीं अल्हड खिलखिलाहट

मेरा मन निकले भी तो कैसे
कहीं से भी तो लगता नहीं
उठा लिया है देवारों ने डेरा

खौफ

जाने-अनजाने पेड़ से
फल के बजाय टपक पड़ता है बम
काक-भगोड़ा राक्षस से कहीं अधिक खतरनाक

अपना ही साया पीछा करता
किसी पागल की हत्यारे की तरह
नर्म सपनों को रौंद-रौंद जाती है कुशंकाएं
वॉल हैंगिंग की बिल्ली तब्दील होने लगती है बाघ में

इसके बावजूद
दूर-दूर तक नहीं होता कोई शत्रु
आदमी मरने लगता है वहीं
जब खौफ समा जाता है मन में

जीत

पतंग के कटने से पहले ही
लूटी जा चुकी धागा-चकरी
हार गया हूं आज
जो कभी न हारा था
लेकिन
मन तो मन है
धागा-चकरी सा घूम रहा
एक महीन तागा अंतहीन
सरकता ही जाता है
नीलिमा में
एक टुकड़ा चटक लाल
कभी नीचे- कभी ऊपर
कभी गोल-गोल चक्कर में
ऐंचता-खेंचता- उड़ता ही रहता है

जीत और किसे कहते हैं
कि मन उड़ता ही रहे
बिन धागा-चकरी के
बिन धागा-चकरी के

लकड़ी का बयान

वे तो जाने-पहचाने शातिर थे, जो फेंक गए आग
मैंने नहीं जलाया कभी किसी का घर

चाहे किसी भी आम आदमी से करें तफ्तीश
नोन-तेल कहते ही झट से लेगा मेरा नाम

पूछ लें-

घर से हंकाले गए गठिया-ग्रस्त बूढ़ों से
कौन है उनका एकमात्र सहारा
घिसा जब किसी ने
महका वही चंदन-सा

टेके रखा छप्पर-छानी कंधों पर
बंद करता रहा भीतर

वनैले जानवर से बचाने

मूसल बन कर देता रहा साथ मांओं का
भौंरा घोड़ा बन कर उदास बच्चों का
बचाता रहा साबुत कुपित समुद्र से

मेरी नहीं किसी से जाती दुश्मनी
फिर भी क्यों उस बढ़ई को देखते ही

खौल उठता है मेरा खून
जो बनाने के बजाय पीढ़ा
अड़ा हुआ है मुझे कुर्सी बनाने में ०

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