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कविताएं: पत्थर और प्रेम से

महेश आलोक की कविताएं।
Author October 2, 2016 02:03 am
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महेश आलोक
पत्थर

तेज पानी का बहाव
उसे गुदगुदाता है

उसमें भय नहीं है
भय के जीवित रहने के कारण
ईश्वर की तरह लगता है

ठीक-ठीक नहीं कह सकते वह
साहसी है या कायर

उसकी आंखें पृथ्वी की तरह चमकती हैं
एक अजीब गरमाहट भर उठती है उसके शरीर में
जब कोई बच्चा फुटबॉल की तरह
उछालता है उसे अंतरिक्ष में

कभी-कभी उसकी पत्थर जैसी गंध
पत्थरों तक को विचलित नहीं करती

संभव है शिकारी की त्वचा की ध्वनियां और गंध
कतई अच्छी न लगती हों उसे
चिड़िया भी बैठती है उसके सिर पर
हाथ में आने से पहले

वैसे पत्थरों की चौपाल में इस विषय पर
मंत्रणा जारी है कि ऐन मौके पर
कैसे चले जाते हैं हम पत्थर-समाधि में

एक स्त्री गुस्से में उसे उठाती है
और उसकी कनपटी की लवें
लाल हो उठती हैं

हालांकि वह ऊपर से कठोर है और अंदर से
मुलायम
मेरी मां पिताजी के बारे में अक्सर
यही कहती हैं

प्रेम में

बहुत कुछ रखना चाहता हूं अपने प्रेम में

नसों में बहने वाली किशोर लहर
बसंत के फूलों जितनी उम्मीद
सांसों के तेज चलने से हवा में बनने वाली
अप्रत्यक्ष तस्वीर

सांसों की खुशबू से निकलती सारंगी की कोई
नई धुन
नया राग जिसे अभी तक न गाया बजाया हो
किसी ने
किसी मंगलग्रह पर भी नहीं

शतरंज जैसी चालों को प्रेम में रखना
गलत होगा इस समय

बहुत कुछ रखना चाहता हूं अपने प्रेम में
सुबह का सूरज और उसके घर के दरवाजे
चंद्रमा की नशीली आंखें

चिड़िया के पंखों के भीतर भरी हुई इच्छा
उड़ान वाली हवा और लक्ष्य तक पहुंचने की कला
पृथ्वी जितना धैर्य
और उसकी देह जितनी गरमी

कठिन समय में अंतरिक्ष
का ताला खोलने वाली चाभी

और समुद्र के दुख जितने आंसू
पृथ्वी की खुशी जितना जल
पीपल के पत्तों जैसी चंचलता

अपनी कमजोरियां और खूब पुराने
बरगद के पेड़ जितनी छाया

पुरखों का विश्वास और दादी के कदमों की आहट
रखना चाहता हूं अपने प्रेम में ०

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