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साहित्यः वर्तमान कविता का भविष्य

आज के दौर में लिखी जा रही कविताओं की रचना प्रक्रिया को देखकर कविता के भविष्य के प्रति कई तरह की आशंकाएं उठती हैं।

Author Published on: January 31, 2016 12:15 AM

कैलाश नारायण तिवारी

आज के दौर में लिखी जा रही कविताओं की रचना प्रक्रिया को देखकर कविता के भविष्य के प्रति कई तरह की आशंकाएं उठती हैं। आशंकाएं और प्रश्न केवल हिंदी साहित्य से जुड़े लोगों में ही नहीं दिखाई देते, बल्कि साधारण पाठक भी ऐसी ही चिंता जताते हैं। आप चाहे चौपाल में बैठे हों, या कॉफी हाउस में या साहित्यिक-सहृदयों में, निचोड़ यही उभरता है कि हिंदी में कविता के नाम पर ‘जो कुछ’ और ‘जैसा’ लिखा जा रहा है, उसे समझना बेहद कठिन है क्योंकि कविताओं की भाषा, शैली और शब्दों का चयन कथ्य के अनुरूप और सहज नहीं होता। कुछ शब्दों का अर्थ खोलना न केवल कठिन होता है, बल्कि उस तक पहुंचना दुष्कर लगता है।

बातचीत के दौर में यह भी पता चलता है कि कबीर का रहस्यवाद तो समझ में आ जाता है, तुलसी की संस्कृतनिष्ठ-हिंदी भी पल्ले पड़ जाती है। यहां तक कि रीतिकाल की रचनाएं भी अपना प्रभाव छोड़ जाती है; लेकिन आज की कविताओं का अर्थ खोलना, उसके कथ्य से अपने को जोड़ना बहुत कठिन लगता है। पाठकों का तर्क होता है कि हिंदी कवि नई कविता के नाम पर गद्य लिख रहे हैं या पद्य? या दोनों के बीच कहीं कोई नवीन विधा का जन्म तो नहीं हो गया है जिसे केवल हिंदी वाले ही समझ सकते हैं। साधारण पाठक नहीं।

इस तरह की आशंकाओं से एक बात तो साफ हो जाती है कि हिंदी कविता अब केवल हिंदी पढ़ने-पढ़ाने वालों तक ही सीमित नहीं रही है। बल्कि साधारण लोग भी आज की कविताओं को पढ़ना चाहते हैं। उसके अर्थ को खोलना, समझना और उससे जूझना चाहते हैं। जाहिर है ऐसे लोग न तो विश्वविद्यालयों के शोध छात्र होते हैं और न ही हिंदी साहित्य के पंडित। फिर भी आज के दौर में लिखी कविताओं को पढ़ना चाहते हैं। लेकिन उन्हें हैरानी होती है यह देखकर कि लय, संगीत, रस, संवेग और शब्दों के पारस्परिक मेल के बिना कविता को पढ़ें कैसे? उसमें डूबकी कैसे लगाएं? उसमें संगीत का स्वर कैसे दें? कविता पढ़ते समय वे देखते हैं कि कभी चार शब्दों की पंक्तियां, तो कभी दस शब्दों की लंबी दूसरी पंक्तियां। वह भी बिना अल्पविराम और पूर्णविराम के। आरोह, अवरोह का तो कहीं अता-पता ही नहीं।

सवाल है कि क्या आज की कविता का भविष्य महज इसलिए आशंकाओं से ग्रस्त है कि उसमें गेयता, पठनीयता, सुरुचिता, तारतम्यता, संगीतमयता और रसग्राह्यता नहीं है या कोई अन्य कारण है? या बहुत ही बेजान, नीरस, हृदयहीन, असहज और दुरूह होने के कारण वह सामान्य पाठकों के मन से मेल नहीं खाती? या अतुकांत या अलंकार विहीन होने के कारण वह अपठनीय समझ ली जाती है। बात बस इतनी ही भर होती तो सुधार की संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है। आलोचकों से ऐसा निवेदन किया जा सकता है कि आलोचना की लाठी से कवियों को सुधारने का प्रयत्न करें।

अगर इससे भी बात नहीं बनती तो कुछ नामवर कवियों और जमे-जमाए मठाधीशों से आग्रह किया जाता कि वे ही कुछ करें। कम से कम ऐसे कवियों को समझाते कि अगर रचना-कर्म का उद्देश्य नहीं जानते तो बिना वजह गुरु-गंभीर कवि बनने की क्या जरूरत? लेकिन बात इतनी भर नहीं है। सच तो यह है कि नई पीढ़ी में विचारों का संकट है। कविता लिखते समय किसी को टॉलस्टाय याद आते हैं तो कोई गोर्की की याद में झूमने लगता है। किसी को केवल सामाजिक विसंगतियां ही नजर आती हैं तो कोई-कोई दुख से व्याकुल होकर धार-धार आंसू गिराता नजर आता है। अब पाठक ही बतला सकते हैं कि वह आंसू घड़ियाली होता है या वास्तविक? कुछ तो अब भी मार्क्सवाद में ही खोए रहते हैं। कुछेक का मत तो अब भी सोवियत संघ में बसता दिखता है।

कु छ लोगों की तो बात ही मत पूछिए। तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के लिए जमीन-आसमान एक कर देना चाहते हैं। यानी चिंतन में भी उधारी। विचारों में भी पक्कापन नहीं। स्वीकृति और सहभागिता में भी पक्षपात। न तटस्थ होने की भावना और न ही अपने पूर्वाग्रहों से मुक्ति। ऐसे में सुंदर और सुगढ़ कविता रचना कैसे होगी?

प्रगतिशील-चेतना को आत्मसात करने वाली मेधा अगर तटस्थ और पक्षहीन होकर कवि-कर्म का निर्वाह करे और उसे लयात्मक रूप में व्यक्त करे तो ऐसा कोई कारण नहीं होगा कि उसकी रचना न पढ़ी जाए। इस संबंध में सबसे पहली बात यह होनी चाहिए कि वह अपनी ही जमीन को जमीन समझे। अपनी ही जमीन से खाद-पानी लेकर रचना-कर्म का निर्वाह करे। उसको याद रखना चाहिए कि अब भी देश की सत्तर प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है।

वहां गरीबी और यंत्रणाएं हैं तो इसके साथ ही सहिष्णुता और समरसता की ऊर्जावान परंपरा भी है। जो कविता का तथ्यात्मक-रूप से मूल केंद्र होना चाहिए, परंपराओं के सृजनात्मक-चयन में उसे कविता का रूप देने के लिए परहेजी-भाव और हिकारत भरे सोच से बचना चाहिए क्योंकि कुछ कवि रीति-रिवाजों और परंपराओं के चयन में चयन में संदेह के शिकार हो जाते हैं। देश की हर चिंतनधारा उन्हें संकुचित और प्रतिगामी लगती है। वैदिक काल से लेकर आज तक के बने समाज में उन्हें खामियां ही खामियां नजर आती हैं। इतना ही नहीं उन्हें राम और कृष्ण भी सामंती चेतना के पोषक जान पड़ते हैं।

यानी उन्हें हर जगह संदेह, हर ऐतिहासिक पन्ने में संकीर्णता और अमानवीयता की गंध आती है। एक कवि को इस तरह की सोच से ऊपर उठकर खुले हृदय से कविता लिखना चाहिए। उसे विश्वास होना चाहिए कि हमारा इतिहास ऐसा ही नहीं है। अच्छाइयों और बुराइयों के इतिहास से तो सारा संसार भरा पड़ा है। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि गांधी और नेहरू भी कवियों को अच्छे न लगें। उनमें भी पक्षपात की दुर्भावना ढूंढ़ ली जाए।

यानी हम कह सकते हैं कि वर्तमान लेखन में घृणा अधिक, सामंजस्य कम, अध्ययन थोड़ा, लिखना ज्यादा, सुनना अधिक, गुनना कम, खंडन अधिक, मंडन कम जैसा स्वर ही अधिक मुखरित दिखता है। यानी जिस तरह राजनीतिक क्षेत्र में हमारा देश आज
‘भयानक विचार शून्यता’ के दौर से गुजर रहा है, ठीक उसी तरह हमारी कविता भी संक्रमण के दौर से गुजर रही है। जिस तरह दोयम दरजे की विचारधारा से हमारा राजनीतिक-नेतृत्व ग्रस्त है उसी तरह आज की कविता भी पूंछ-विहीन बनकर रह गई है। ऊपर से तुर्रा यह कि कविता लौटेगी, पढ़ी जाएगी। सहृदयों के गले का हार बनेगी। भगवान करे कविता लौटे, वह खूब पढ़ी जाए। लेकिन कोई ‘सार्थक चिंतन’ का संदेश भी तो दे। पाठकों के हृदय पर छाप भी तो छोड़े। उसके मर्म में घुसे तो सही। आखिर घुसेगी नहीं तो जीवित कैसे रहेगी?

ज्यादा दूर नहीं जाना चाहता। आज से चौदह-पंद्रह वर्ष पूर्व देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित हिंदी पत्रिका ‘हंस’ का अर्द्धशती-विशेषांक दो भागों में प्रकाशित हुआ था। जिसमें तकरीबन बीस कवियों की छोटी-बड़ी और मोटी-तगड़ी तकरीबन चालीस कविताएं प्रकाशित हुई थीं। जो वतर्मान व्यवस्था के ऊपर चोट करते हुए भी कई तरह की ‘भविष्यगत-आशंकाओं’ को जन्म दी थी। पर सवाल है कि भाग एक में प्रकाशित कुछ कविताओं में ‘पचासबरस’ की पहली पंक्तियां- आलने पर टांगकर …, चहेरों से चेहरे, रात भर देती है दीवार… जगी हुई आंखों की ओट, स्वास्थ्य बोर्ड की यही सिफारिश है- जैसी पंक्तियां क्या देश के आम पाठकों तक अपना संदेश पहुंचा पाती हैं? यह कविता दुर्भाग्यवश कविता होते हुए भी गद्य में गिनी जानी चाहिए या पद्य में? अगर इसका दर्जन भर बार पाठ करें तो भी वह गले की नीचे नहीं उतरेगी।

ठीक इसी तरह मंगलेश डबराल की तीनों कविताएं-‘चुंबनों का इतिहास’, ‘वापसी की कविता’ और लीपाई कही तो जाएगी कविता ही, या कहूं कि छायावादी कवियों जैसे लगती है, लेकिन वास्तव में वह गद्य है या पद्य? यह केवल कवि महोदय ही बता सकते हैं। क्योंकि कहने का ढंग भी उनका निराला है। बड़े कवि जो हैं। सोचता हूं कि सामान्य पाठकों के लिए इसी तरह की कतिवाएं चुनौतीपूर्ण होती हैं। अब देखिए न… इसी अंक में प्रकाशित तलिया, मसान और धूमताक जैसे शब्दार्थों के ज्ञान के लिए क्या सामान्य पाठकों को हिंदी शब्दकोश में नहीं जाना पड़ेगा। इसी तरह ‘लंगड़ी दादी’ की प्रथम आठ पंक्तियां: -पूजाघर है, गुणियाघर, पूजाघर, और बौना की अंतिम आठ पंक्तियां: – बस मौका मिल गया था उसे … जैसे वाक्यों का अर्थ सिर्फ कवि महोदय ही समझ सकते हैं। मुझे तो लगता है कि कवि ने ठीक कहा है-‘अब उसका कद नहीं बढ़ेंगा।’ सचमुच ऐसी अनजाने ही कविता से कवि का कद नहीं बढ़ेगा। बढ़ना भी नहीं चाहिए।

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