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कहानीः प्रजातंत्र

रिक्शे में बंधे लाउडस्पीकर से फिर आवाजें आने लगी हैं। यह कई दिनों से इस गांव के चक्कर लगा रहा है। रिक्शे में बंधा बाजा अपनी बात दोहरा रहा है...बार...बार...दोहरा रहा है।

Author January 31, 2016 1:39 AM

रिक्शे में बंधे लाउडस्पीकर से फिर आवाजें आने लगी हैं। यह कई दिनों से इस गांव के चक्कर लगा रहा है। रिक्शे में बंधा बाजा अपनी बात दोहरा रहा है…बार…बार…दोहरा रहा है। दो-तीन हफ्ते हो गए, दिन भर में कई-कई बार गांव की गलियों में यह रिक्शा घूम रहा है। यह रिक्शा ही क्यों ऐसे कुछ और रिक्शे भी गांव के चक्कर लगा रहे हैं। एक ही बात कहते-कहते बाजे के स्वर घिस गए हैं। अब उनमें से स्पष्ट आवाजें नहीं बल्कि घर्र-घर्र की आवाजें आने लगी हैं। बातें अस्पष्ट हो चुकी हैं।

झगडू नीम के वृक्ष के नीचे कच्ची मिट्टी के बने चबूतरे की ढूह पर बैठा है। रिक्शे में लगे बाजे की कानफोड़ू आवाज सुनने का वह आदी भी हो गया है। अब इस प्रकार की आवाजें उसके मन में कोई कौतूहल पैदा नही करतीं। गांव के नंगे-अधनंगे बच्चे अब भी झुंड बना कर रिक्शे के पीछे-पीछे चल रहे हैं। जबकि प्रतिदिन कई-कई रिक्शे गांव के चक्कर लगाते रहते हंै। फिर भी बच्चों का मन नही भरता है। गांव के बड़े लोगों के लिए अब ये रिक्शे पहले की भांति कौतूहल का विषय नही हैं।
लाउडस्पीकर की आवाजें आने पर वे दालानों, खेतों, घरों से एक क्षण को उसे देख कर अपने-अपने कार्य में लग जाते हैं। अब ये आवाजें अब उनमें नीरसता उत्पन्न करती हैं।

वृक्ष के नीचे मिट्टी कर ढूह पर बैठा झगड़ू सोच रहा था कि इस गांव में ये रिक्शा घुमाने का क्या लाभ है?
कुछ ही दिनों में चुनाव होने वाले हैं। जब भी चुनाव होने वाले होते हैं। इस दलित बस्ती में लोगों की आवाजाही बढ़ जाती है। मुख्य गांव से बाहर स्थित इस बस्ती में दलित जाति के लोगों के अलावा और किसी भी उच्च जाति का घर नहीं है। इस बस्ती में कोई भी अगड़ी जाति का व्यक्ति आता-जाता नहीं है। बड़े गांव की ऊंची जाति के लोगों को इस गांव से किसी स्त्री-पुरुष को काम के लिए बुलाना होता है। इस गांव के आते-जाते किसी व्यक्ति से कहला देते हैं। वह व्यक्तिकाम पर पहुंच जाता है। स्वयं कभी बुलाने नहीं आते। कितनी बार गांव के बाहर सुअरों को हांकते झगड़ू या गांव के नुक्कड़ पर जूते चप्पल सिलते बेनी से कहलवा देना पर्याप्त होता है। गांव के अधिकांश संदेश तो बेनी ही लाता है। क्योंकि वह प्रतिदिन नुक्कड़ पर वृक्ष के नीचे बोरी बिछाकर पुराने जूते-चप्पलों की मरम्मत की दुकान लगा लेता है। आते-जाते अधिकांश लोग उससे ही मजदूरी के लिए लोगों को बुलवा लेते हैं।

इस गांव पिपरासी में दलितों के अस्सी-नब्बे घर हैं। लगभग चार सौ मतदाता हैं। पिछली बार इस गांव में जब गणनाबाबू आए थे तो उन्होंने यहां की आबादी बच्चे बूढ़े कुल मिलाकर सात-साढे सात सौ गिनी थी। झगड़ू को याद है इस गांव के मध्य स्थित बरगद के वृक्ष की छांव में उन्होंने चारपाई बिछवा ली थी। सभी लोग उनके पास जा-जाकर अपने घर परिवार की संख्या लिखवा दे रहे थे। अगर कोई काम पर चला गया था तो कोई दूसरा उसके परिवार का नाम लिखा दे रहा था। इस छोटे से गांव के लागों की गणना कुछ ही देर में पूरी हो गई थी। पहले से कुछ बड़ा हो गया है यह गांव।

झगड़ू को स्मरण है अपने बचपन के दिन, जब यहां दस-बारह परिवार रहते थे। उस समय भी दलित जातियां ही यहां रहती थीं। अब भी वाल्मीकि, पासी, चमार आदि दलित जातियां ही यहां निवास कर रही हैं। वोट तो तब भी पड़ते थे, लेकिन उस समय कोई रिक्शे वाला अपने नेता का प्रचार करने के लिए इस गांव के चक्कर नहीं लगाता था। वोट डालने भी इस गांव से कोई नही जाता था। झगड़ू को लगता है कि इस गांव में वोटरों की संख्या बढ़ जाने के कारण नेताओं के लिए वोट मांगने वालों के रिक्शे इस गांव की संकरी, कच्ची, ऊबड़-खाबड़ गलियों में घूमने लगे हैं।

झगड़ू ने सुना है कि इस बार यह पंचायत का चुनाव है। वह समझ नहीं पाता है कि चुनावों के अलग-अलग नाम क्यों होते हैं? कभी रिक्शे का बाजा बोलता है कि विधायकजी को वोट दो, कभी बोलता है कि संसद ( सांसद ) को वोट दो तो अबकी बार बोल रहा है कि परधान और बिलाक परमुख जी ( प्रधान और ब्लाक प्रमुख ) को वोट दो। वोट तो सब एक जैसा ही होता होगा? वोट देने वाले भी सब बड़े गांव के लोग ही होते होंगे? लेकिन हर बार नाम क्यों बदल जाते हैं। झगड़ू समझ नहीं पा रहा है। झगड़ू छोटा बच्चा नही है। पैंतीस-छत्तीस वर्ष की उम्र का है। बचपन से ही अपने पिता के साथ वह सुअर पालन का कार्य करता आ रहा है।

उसके वृद्ध पिता अब चलने फिरने में असमर्थ हैं, वह घर पर रहते हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने कई बार चुनाव देखे हैं। वोट उन्होंने एक बार भी नहीं दिया है। लेकिन चुनाव देखने का अनुभव बहुत है। गांव के लोग शाम को काम से वापस आकर बरगद के नीचे बैठते हैं और पिपरासी की पंचायत लग जाती है तब उसके पिता अक्सर चुनाव सीजन में चुनाव की बात छिड़ जाने पर अपने चुनावी अनुभवों के किस्से खूब सुनाते हैं। सब उनकी बातें ध्यान से मजे ले लेकर सुनते हैं। झगड़ू मुस्करा पड़ता है यह सोचकर कि उसके पिता कितने रोचक ढंग से पुरानी बातें बताते हैं, ‘ त भइया जनल ऊ…लंबी लाइन लगेला, जहवां वोट पड़ेला। ऊहां बड़े गांव के ऊंची जाति के लोग ओट डालेला।’ पिता की बातें सुन कर सुमेरू चाचा की आंखें आश्चर्य से कैसे चौड़ी हो जातीं।

हमहू देखले बानी भइया। उहां जात में बहुत डर लागत है। जियरा कांप जात है। पुलिस की कई-कई गाड़ी आवत-जात है। कई सिपाही लोग रहत है उहां। हम त दूर से देखि क चलि आवत हैं।’ सुमेरू चाचा भी अपना अनुभव बताते। ‘ हां हो, भइया…सच कहत हौ। बड़ा डर लागत है उहां।’ किसना सुमेरू चाचा के सुर में सुर मिलाते हुए कहता।

झगड़ू के सामने से चुनावी रिक्शा जा रहा है। रिक्शे पर निशानयुक्त झंडे लगे हैैं। चमकीली झालरों से सजा रिक्शा सुंदर लग रहा है। बच्चे कौतूहल से इस रिक्शे के पीछे-पीछे लगभग दौड़ते हुए चल रहे हैं। इस बार अलग-अलग निशानों वाले झंडे लगे कई-कई रिक्शे गांव में घूम रहे हैं। झगड़ू की समझ में नहीं आ रहा है कि ये रिक्शे यहां घूम-घूम कर क्यों कह रहे हैं कि, ‘अबकी बार अपने वोट का प्रयोग अवश्य करें। वोट डालने वाले दिन अपने सभी कार्य बाद में करें पहले वोट डालें। वोट डालना आपका अधिकार है। वोट वाले दिन अपने-अपने बूथ पर अवश्य आएं।’ इस बार रिक्शे का बाजा नई-नई बात बोल रहा है।

‘ऊंह! हमें क्या करना है। रिक्शे का बाजा कुछ भी बोले।’ अपनी गर्दन को एक ओर झटका देकर झगड़ू इधर-उधर घूम रहे अपने सुअरों को हुर्र…हुर्र…की आवाज दे कर बुलाने लगा। सुअरों का झुंड पूरा बन गया तो उन्हें हांकते हुए गांव की ओर चल दिया।
इसी गांव के हरकू चाचा का लड़का सरजू पास के शहर जाकर रिक्शा चलाता है। वह आजकल गांव आया हुआ है। उसके पास रेडियो है। जब भी वह आता है रेडियो बजाकर गांव के बीच के बरगद के नीचे रख देता है। गांव के लोग काम समाप्त कर रेडियो सुनने के लिए उसी वृक्ष के नीचे आकर बैठ जाते हैं। वह सब बड़े ही चाव से रेडियो सुनते हैं। झगड़ू भी सुअरों को चराने के बाद उन्हें घार में बैठा कर रेडियो सुनने बरगद के नीचे पहुंच जाता है।

आज रेडियों का आवाज सुनकर झगड़ू भी वहीं जाकर बैठ गया। गांव के कुछ और लोग भी वहां बैठे थे। रेडियो बता रहा था कि अबकी छब्बीस तारीख को वोट पड़ेगा। चार दिन ही तो शेष रह गए हैं वोट पड़ने में। रेडियो बार-बार बता रहा है कि वोट डालने अवश्य जाए।
‘वह तो बड़े गांव के लोग वोट डालने जाते ही हैं। इमां नई बात क्या है?’ चुगुरदी ने शंका व्यक्त करते हुए कहा। झगड़ू को चुगुरदी की शंका वाजिब लगी।

रेडियो यह भी बता रहा था कि अपना-अपना पहचान पत्र, राशन कार्ड भी साथ लेकर जाएं। तो क्या पहचान पत्र से वोट पड़ जाता है? पहचान-पत्र तो इस गांव में कई लोगों का हाकिम ने बनवा दिया है। राशन कार्ड तो सबके घर का बन गया है। उस पर मिट् टी का तेल और गेहूं भी मिल जाता है। तो क्या इन सबसे वोट भी पड़ जाता है? झगड़ू समझ नहीं पर रहा है कि असली बात क्या है?

वोट पड़ने में तीन दिन शेष हैं। आस-पास के गांवों में भी अलग-अलग चिह्नों वाले झडियां, पोस्टर आदि सजा दिए गए हैं। रंग बिरंगी झंडियां बड़ी ही सुंदर लगती हैं। उजड़े गांव भी सजे हुए लगते हैं। पिपरासी गांव में भी झंडियां बांध दी गई हैं। झोंपड़ियों की फूस की दीवारों पर भी पोस्टर चिपके हुए हैं। जिससे झोपड़ियां नई दिखने लगी हैं। झगड़ू सोच रहा है कि कुछ समय पहले और आज के समय में कितना फर्क आ गया है। पहले तो कोई भी बाजे वाला रिक्शा इस गांव में नहीं आता था। रंगीन झंडियां भी नहीं लगती थीं। इस बार यहां की कच्ची और संकरी गलियों में रिक्शे भी घूम रहे हैं। वोट मांगने वाला बाजा भी बज रहा है। इस परिवर्तन पर झगड़ू मुस्करा पड़ता है।

आ ज एक और अचंभे वाली बात हो गई। दोपहर के बाद गांव में एक नेताजी आ गए। उनके साथ पंद्रह-बीस लोग और भी थे। गांव के सभी पुरुष काम के बाद अपने-अपने घरों में आ गए थे। उन सबका कार्य पूरे दिन का तो रहता नहीं। गांव के अधिकांश लोग दोपहर तक सुअरों-ढोरों को चरा कर, साफ-सफाई आदि का काम दोपहर तक करने के बाद घर आ जाते हैं। जैसे ही नेताजी ने गांव के अदर प्रवेश किया सब अपनी-अपनी मड़इयों से बाहर आ गए। गांव के स्त्री-पुरूष, बच्चे बरगद के नीचे जमा हो गए। बरगद के नीचे सबको एकत्र देख नेताजी भी वहीं आ गए।

झगड़ू द्रवित हो गया जब उसने देखा कि उजले,नए कपड़े पहने नेताजी गांव के मैले-कुचैले, फटेहाल, निर्धन लोगों की ओर हाथ जोड़े खड़े हैं। वह समझ नहीं पा रहा था कि उन लोगों के पास ऐसा क्या है, जिसके लिए वह उन लोगों के बीच हाथ जोड़कर खड़े हैं? जिन लोगों को दूर से भी कोई स्पर्श करना नहीं चाहता, उनके समक्ष हाथ जोड़ना? यह झगड़ू की समझ के बाहर की बात थी। नेताजी ने एक निशान दिखाते हुए कहा, ‘ आप सब लोग अपना अमूल्य वोट इस निशान के ऊपर लगाइएगा। हम आप सब के साथ होने वाले शोषण, अन्याय, गैरबराबरी को दूर कर इस छोटे से गांव का विकास करूंगा। आपके गांव में सरकारी विद्यालय खोलवा दूंगा, जिसमें आपके बच्चे पढ़ेंगे। आपकी तरक्की होगी।’ और भी बहुत-सी बातें कर रहे थे वे नेताजी। उनकी कई बातें अच्छी लग रही थीं, तो कई बातें पिपरासी गांव के लोगों की समझ के बाहर थी। नेताजी ने यह भी बताया कि पास के बड़े गांव में वोट पड़ेगा। हम सब लोगों को वहीं वोट डालने जाना पड़ेगा। हमारे गांव का वोट डालने का बूथ वहीं पर है।

दू सरे दिन उन्हीं जैसे एक और नेताजी पिपरासी गांव में आए। उन्होंने कोई दूसरा निशान दिखाते हुए उस पर वोट डालने के लिए कहा। उन्होंने भी उसी प्रकार की अच्छी-अच्छी बातें कहीं। पिपरासी गांव के दलितों का भला करने की बात उन्होंने भी कही। झगड़ू ने देखा कि नेताजी की बातें सुन कर गांव के सभी लोग प्रसन्न थे। हों भी क्यों न? उन सब का भी तो मन होता है कि उनके बच्चे ऊंची जाति वालों के बच्चे के साथ पढ़ें लिखें। कोई उनसे घृणा न करे। क्या ऐसा संभव होगा? सब यही सोच रहे थे कि ऐसा अवश्य संभव होगा। जब इस गांव में एक सवर्ण नेता हाथ जोड़कर वोट मांग सकता है तो वह अवश्य हम लोगों का भला करेगा। नेताजी ऊंची बिरादरी के हैं उनकी बात अवश्य ऊपर तक सुनी जाएगी। उन दोनों नेताजी लोगों में पहले दिन वाले नेताजी की बातें सबको अच्छी लगीं। उन दोनो लोगों ने कहा है कि आप सब बड़े गांव में वोट डालने अवश्य आएं।

शेष बचे दो दिनों में पिपरासी में खूब बाजा लगे हुए रिक्शे घूमे। बड़ा अच्छा लगता। सजे-धजे रिक्शे और बाजे की आवाज से गांव के बड़े-बूढ़े, बच्चों का खूब मन लगता। आज वोट डालने का दिन था। गांव में बिना प्रचार-प्रसार के तय हो गया था कि किसे वोट डालना है। झगड़ू को तो दोनों ही अच्छे लगे लेकिन वोट तो किसी एक को ही देना होगा। गांव में सबने आज सुबह से ही वोट डालने जाने की तैयारी कर ली थी। औरतें बाद में जाएंगी। पहले गांव के सभी पुरुष जो अठारह वर्ष से ऊपर के हैं, वे सब एक साथ वोट डालने जाएंगे। सभी के हृदय में किसी पर्व जैसी प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।

वोट तो कई बार पड़े हैं लेकिन इस गांव के लोग प्रथम बार वोट डालने जा रहे हैं। झगड़ू सोच रहा है कि कई और नेता लोग चुनाव में खड़े हैं। लेकिन इस गांव में वोट मांगने आए हैं मात्र दो ही नेता। बाकी लोग हमारे अमूल्य वोट मांगने नहीं आए। वह गर्दन को एक ओर झटक कर अपने आप से कह पड़ता है, ‘उंह! क्या करना है? दोंनो नेता लोग कहि गए हैं इसलिए वह वोट डालने जाएगा।’
‘ कहो भइया! तैयार हो गइल। चलल जा वोटवा डारे।’ झगड़ू ने अपने घर के सामने रहने वाले रामबरन से पूछा।
‘हां हो भइया झगड़ू! हम त तैयारे बाड़ी। बड़का दद्दा से पूछ ल त सब जनै चली जाए। अब ही बेनी उधर से आवा है ऊ बता रहा था कि इस समय ऊंहा भीर कुछ कम है।’ रामबरन ने कहा।
‘त हमन क चले के चाही।’ झगड़ू ने उसकी बात का समर्थन किया।
वोट डालने जाने के लिए तैयार होकर सब बरगद के नीचे एकत्र हो गए।
‘ई मताधिकार का होत है भइया।’ बेनी ने झगड़ू से पूछा।
‘ऊ हम का जानी। गइलै पर पता चलिहै।’ झगड़ू ने अनभिज्ञता प्रकट करते हुए बेनी से कहा।
सभी चल पड़े एक साथ। सबने राशन कार्ड और मतदाता पहचान-पत्र भी हाथों में ले लिया था। बड़ा गांव दूर से ही दिखाई दे रहा था। बड़े गांव में लोगों की आवाजाही आज कुछ ज्यादा ही दिख रही थी। आज वोट जो पड़ रहे थे। गांव के बाहर पुलिस की दो गाड़ियां खड़ी थीं जिसे देखकर पिपरासी के लोंगोें के अंदर भय व्याप्त हो रहा था। गांव के भीतर स्थित सरकारी विद्यालय में वोट डाला जाएगा। सभी आगे बढ़ रहे थे, बड़े गांव की ओर। गांव सामने ही दिख रहा था। गांव और उनके बीच कुछ खेत ही रह गए थे। आखिरका गांव का सीवान आ गया।
अभी वे गांव में प्रवेश नहीं कर पाए थे कि कुछ ही क्षणों में दस-बारह लोगों की भीड़ उनकी तरफ आती दिखाई दी। झगड़ू के साथ सबने देखा कि वे बड़े गांव के लोग थे। कुछ ही क्षणें में वे सीवान पार कर उन तक आ गए।
‘का है रे…? तुम सब ईहां क्या करने आए हो?’ उनमें से एक ने कहा। पुलिस की जीप के पास एक वृक्ष के नीचे चार-पांच पुलिस वाले कुर्सी डाल कर बैठे थे। वे सब उनके बीच होने वाली बातचीत सुन रहे थे।
‘हुजूर वोट डालै का है।’ बेनी ने हाथ जोड़कर उनसे कहा।

तु म्हारा माथा बिगड़ गया है का रे? तुम सब को किसने बुलाया? भाग ईहां से।’
‘नहीं साहब हम अपने मन से ईहां नही आए हैं। ऊ नेताजी आए थे गांव मा, उहे हम सबसे कहि गइलें वोट डालै खातिर।’ सरजू ने कहा।
‘कहि गइन होइहंै। ईहां तुम्हार वोट नहीं पड़ेगा। भाग ईहां से।’ उनमें से एक ने कहा।
‘हमरे पास इ कारिड और राशन कारिड भी है।’ मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड दिखाते हुए बड़े दद्दा ने कहा।
‘स्साले मुंह चला रहा है हमसे इतना देर से?’ साथ में दो-चार गालियां और दीं उस व्यक्ति ने। वे सब के सब सहम गए। साथ में डर भी गए कि वोट डालने के जुर्म में कहीं ये पुलिसवाले जेल में न बंद कर दें।’
‘माई-बाप…बड़े साब! क्षिमा कर दीजिए हमका। हम सब जा रहें है अपने गांव।
वोट डालै से का होत है?’
‘ई मताधिकार का होत है?’
‘बूथ कइसा होत है?’
‘वोट कइसे डारा जात है?’
‘वोट डारे का बाद का होत है?’
‘ई वोटवा का सब लोग अमूल्य काहे कहत है?’
मन में उठते अनेक प्रश्नों की चर्चा एक दूसरे से करते हुए वे सब गांव की ओर चले जा रहे थे। बड़ा गांव पीछे छूटता जा रहा था। पिपरासी समीप आता जा रहा था।

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