ताज़ा खबर
 

बदहाल बाजार, बेहाल किसान

मतलब साफ है। किसान अगर अच्छी कीमत चाहते हैं तो अब रिकार्ड उत्पादन देश की बड़ी आबादी के पेट भरने के लिए न करें। बल्कि वे उत्पादन कम करें। लेकिन इसका खमियाजा फिर से उपभोक्ताओं को झेलना होगा, क्योंकि कम उत्पादन के नाम पर बिचौलिए बाजार में कीमतों को कई गुना ज्यादा कर देंगे।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

महाराष्ट्र के नासिक के प्याज उत्पादक किसान संजय साठे अकेले प्याज की कम कीमत का दर्द नहीं झेल रहे हैं। संजय साठे को अपने 750 किलो प्याज की कीमत बाजार में 1064 रुपए मिले। फिलहाल ज्यादातर प्याज उत्पादकों के हालात यही हैं। इसी साल देश के लहसुन उत्पादक किसानों को खराब कीमतों की मार झेलनी पड़ी थी। अब देश के प्याज उत्पादक किसानों के लिए बुरी खबरें आ रही हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश प्याज के मुख्य उत्पादक हैं, जहां देश के लगभग साठ प्रतिशत प्याज का उत्पादन होता है। प्याज की बड़ी मंडियों में कीमतें खासी नीचे गिर गई हैं। हालत यह है कि प्याज उत्पादकों को उत्पादन लागत भी वसूल नहीं हो पा रहा है। सबसे बड़ी मंडी लासलगांव में प्याज सौ रुपए से तीन सौ रुपए प्रति क्विंटल बिक रहा है। जबकि प्याज के उत्पादन में किसानों को प्रति क्विंटल एक हजार से बारह सौ रुपए खर्च करना पड़ता है। दूसरे शब्दों में कहें तो एक किलो प्याज उगाने का खर्च दस से बारह रुपए आ रहा है तो किसान उसे मंडी में एक से तीन रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेच रहा है। सरकार चुपचाप किसानों की बदहाली देख रही है, किसान बेहाल है। किसानों की आय दोगुना करने के बयान आ रहे हैं, दूसरी ओर किसान लागत से आधी कीमत पर बाजार में अपने उत्पाद बेचने को मजबूर है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसी साल जनवरी में महाराष्ट्र के लासलगांव मंडी में प्याज अठाइस सौ रुपए प्रति क्विंटल बिका था। दिसंबर में उसी मंडी में प्याज की कीमत सौ रुपए से लेकर तीन सौ रुपए प्रति क्विंटल रह गई। तर्क दिया जा रहा है कि प्याज की गिरी कीमतों का मुख्य कारण पुराने प्याज और नए प्याज का एक साथ बाजार में आना है। एक तरफ प्याज की नई फसल मंडी में आ गई है। वहीं किसानों ने पुराने प्याज स्टोर से निकालने शुरू कर दिए। सवाल यह है कि किसानों को इन बुरे दिनों से निजात कैसे मिलेगा? आखिर किसानों को उनके उत्पादों की संतोषजनक कीमत दिए जाने के लिए कोई स्थायी नीति क्यों नहीं बन रही? किसान सरकार की प्राथमिकता में क्यों नहीं है? जबकि उपभोक्ताओं को किसानों को दी जा रही कम कीमत का कोई लाभ नहीं मिल रहा है। उन्हें तो अभी भी बाजार में महंगा प्याज ही मिल रहा है। दिल्ली समेत उत्तर भारत के तमाम खुदरा बाजारों में उपभोक्ताओं को प्याज बीस से तीस रुपए किलो मिल रहा है। मध्यप्रदेश में भी प्याज उत्पादकों को लगभग इसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, जिस स्थिति का सामना महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक के किसान कर रहे हैं।

इसी साल राजस्थान और मध्यप्रदेश के लहसुन उत्पादकों के हाल भी बुरे हो गए थे। जिन हालात का सामना इस समय प्याज उत्पादक कर रहे हैं, वैसा ही लहसुन उत्पादकों के साथ भी हुआ था। इसी साल मध्यप्रदेश में किसानों को एक रुपए किलो लहसुन बेचना पड़ा था। कई जगहों पर नाराज किसानों ने लहसुन को नष्ट कर दिया था। वहीं राजस्थान के लहसुन उत्पादकों को मुश्किल से पांच रुपए प्रति किलो लहसुन का भुगतान बाजार में हुआ था। जबकि किसानों को उम्मीद थी कि उन्हें बाजार में पैंतीस से चालीस रुपए प्रति किलो लहसुन की कीमत मिलेगी। इसके लिए भी लहसुन के रिकार्ड उत्पादन को जिम्मेवार ठहराया गया था। उस समय किसानों को राय दी गई कि वे अगर बाजार में अपने उत्पादों की अच्छी कीमत चाहते हैं तो लहसुन के साथ अन्य फसलों को भी लगाए। राजस्थान में तो बकायदा कृषि वैज्ञानिकों ने सलाह दी कि लहसुन के साथ किसान गेहूं और सोयाबीन भी उगाए, क्योंकि बाजार में तर्क दिया गया था कि राजस्थान में सात लाख मीट्रिक टन लहसुन का रिकार्ड उत्पादन हो गया था, इसलिए कीमतें गिर गई। मतलब साफ है। किसान अगर अच्छी कीमत चाहते हैं तो अब रिकार्ड उत्पादन देश की बड़ी आबादी के पेट भरने के लिए न करें। बल्कि वे उत्पादन कम करें। लेकिन इसका खमियाजा फिर से उपभोक्ताओं को झेलना होगा, क्योंकि कम उत्पादन के नाम पर बिचौलिए बाजार में कीमतों को कई गुना ज्यादा कर देंगे।

हालांकि प्याज की गिरती कीमतों पर आश्चर्य इसलिए हो रहा है कि विश्व बाजार में भारतीय प्याज का निर्यात बढ़ा है। सरकार ने भी प्याज के निर्यात को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया। लेकिन हालत यह हो गई कि भारत से ज्यादा प्याज निर्यात के कारण एक समय भारतीय बाजारों में उपभोक्ताओं को प्याज की कमी झेलना पड़ा था और इसकी कीमतें प्रति किलो 60 से 70 रुपए तक पहुंच गई थीं। इस दौरान भारत ने मिस्र जैसे देशों से प्याज का आयात किया।
एक अनुमान के मुताबिक भारत ने 2017- 2018 में बारह लाख टन प्याज का निर्यात किया था, जबकि 2016-17 में यह मात्रा लगभग आठ लाख टन थी। भारतीय प्याज की विश्व बाजार में हिस्सेदारी का एक प्रमुख कारण यह भी है कि सरकार ने प्याज पर से न्यूनतम निर्यात मूल्य की शर्त हटा ली। भारत के प्याज उत्पादक किसानों को लाभ में लाने के लिए संतुलित नीति बनाए जाने की जरूरत है। भारतीय बाजारों में मांग और विदेशी निर्यात के बीच संतुलन बनाना पड़ेगा। चूंकि यहां आज भी बिचौलिए खासे सक्रिय हैं, इसलिए ज्यादा निर्यात की हवा बना कर महंगाई बढ़ाने की कोशिश की जाती है।

भारत में आलू, प्याज, लहसुन आदि के उत्पादक किसानों को लाभ में पहुंचाने के लिए कई स्तर पर प्रयास करने होंगे। इस समय प्याज का अंतरराष्ट्रीय निर्यात कारोबार तीन अरब डालर से ज्यादा पहुंच गया है। 2017 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्याज के निर्यात में एशियाई हिस्सेदारी सबसे ज्यादा यानी तैंतीस प्रतिशत थी। इसमें भी भारत की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण है। 2017 में प्याज के निर्यात कारोबार में भारत विश्व भर में चौथे नंबर पर था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत को प्याज के निर्यात में मुख्य चुनौती चीन से मिली है। चीन प्याज के निर्यात में पूरे विश्व में दूसरे नंबर पर आ गया है। पहले नंबर पर नीदरलैंड था। यों पूर्वी एशिया के कई प्याज आयातक देशों में भारत और चीन के बीच प्रतियोगिता है। चीन ने यहां भारत को पछाड़ा है। इसलिए भारत को प्याज के निर्यात के लिए विदेशों में नए बाजार ढूंढ़ने होंगे। भारत द्वारा बार-बार निर्यात नीति बदलने से भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की विश्वसनीयता कम हुई है। हालत यह है कि अब पाकिस्तान भी प्याज के मामले में भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में चुनौती दे रहा है। भारतीय प्याज की मांग मुख्य रूप से थाइलैंड, बांग्लादेश, सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया, श्रीलंका समेत खाड़ी के देशों में है। लेकिन इन देशों में चीन के प्याज की भी घुसपैठ बढ़ी है। ऐसे में भारत को मध्य एशिया के बाजारों की तरफ भी रुख करना पड़ेगा। प्याज की तरह ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय लहसुन को भी चुनौती मिल रही है। भारतीय लहसुन के मुख्य खरीदार भी पूर्वी एशिया के देश हैं। यहां पर भी चीन ने भारत को चुनौती दी है। जाहिर है, मौजूदा नई परिस्थितियों में भारत को प्याज निर्यात के लिए पश्चिम और मध्य एशिया के बाजार भी ढूंढ़ने होंगे। लेकिन इसके लिए सबसे बड़ी चुनौती परिवहन मार्ग है। मध्य एशिया के देशों में भारतीय उत्पादों के निर्यात का फिलहाल एकमात्र रास्ता ईरान है। अगर भारत-पाकिस्तान संबंधों में सुधार हो तो प्याज सड़क मार्ग से मध्य एशिया के देशों में भेजा जा सकता है। मध्य एशिया के मुल्कों में प्याज और आलू की खासी खपत है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 चर्चा: संवेदनहीनता का सामना करता अन्नदाता
2 किताबें मिलीं: अयोध्या: रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का सच, आरटीआइ से पत्रकारिता
3 नन्ही दुनिया: कविता और शब्द भेद
IPL 2020
X