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मुद्दा- पर्यटन और संस्कृति

चरैवेति चरैवेति’ यानी चलते रहो, चलते रहो! भारतीय संस्कृति का यह पुरातन सूत्र गति, प्रगति और विकास के माध्यम से हमारे राष्ट्रीय, सामाजिक, सामूहिक और व्यक्तिगत जीवन की पहचान बनता है।

Author June 18, 2017 3:40 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

पूनम नेगी

चरैवेति चरैवेति’ यानी चलते रहो, चलते रहो! भारतीय संस्कृति का यह पुरातन सूत्र गति, प्रगति और विकास के माध्यम से हमारे राष्ट्रीय, सामाजिक, सामूहिक और व्यक्तिगत जीवन की पहचान बनता है। दरअसल, संस्कृति का संवाहक, संचारक और संप्रेषक है पर्यटन। यह ऐसा सशक्त माध्यम है, जिससे हम परस्पर संस्कृति और संस्कारों से परिचित होते हैं। पर्यटन हमारी संस्कृति और संस्कारों को विकसित करने का सशक्त माध्यम बन सकता है। हालांकि सिर्फ मौज-मस्ती की मानसिकता से किया गया पर्यटन पर्यावरण को दूषित करने में बड़ी भूमिका निभाता है।  बीसवीं सदी में सुप्रसिद्ध लेखक जॉन नैसविट ने अपनी पुस्तक ‘ग्लोबल पैराडॉक्स’ में उल्लेख किया था कि इक्कीसवीं सदी में पर्यटन विश्व का सबसे बड़ा उद्योग होगा और विश्व की अर्थव्यवस्था में पर्यटन व्यवसाय की भूमिका महत्त्वपूर्ण होगी। आज भारत हो या कोई और देश, यह सच सभी जगह साकार हो रहा है। हर जगह की पर्यटन सुविधाओं की विस्तृत जानकारी इंटरनेट पर सहजता से उपलब्ध है। टीवी, अखबार, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, व्यापार मेलों, पर्यटन संगोष्ठियों, मानचित्रों और पर्यटन साहित्य आदि द्वारा पर्यटन क्षेत्र को खूब बढ़ावा मिल रहा है। हमारी राष्ट्रीय और प्रांतीय सरकारें पर्यटन के विकास के लिए सराहनीय प्रयास कर रही हैं। लोग अपने देश के एक छोर से दूसरे छोर तक जाएं, घूमें-फिरें, यह सुखद स्थिति है। ऐसा करने से निश्चय ही पर्यटन व्यवसाय बढ़ा है, पर देश में और देश के बाहर भारतीय संस्कृति, संस्कार और सांस्कृतिक मूल्यों की स्थिति भी मजबूत हुई हो; ऐसा नहीं कहा जा सकता। देशवासी और विदेशी भारत की आत्मा की पवित्रता और पावनता से घुल-मिल सके हैं, यह भी पूरी तरह नहीं कहा जा सकता। विदेशी पर्यटकों के आने से कमाई बढ़ना तो साफ उजागर है, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि इन पर्यटकों में से कितनों को भारत के राष्ट्रीय, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व का पता चला। कितनों ने इसे जानने और सीखने में अभिरुचि दिखाई। देश की पर्यटन-व्यवस्था ने कितने विदेशियों को भारत, भारतीयता और भारत की संस्कृति के बारे में सिखाने-बताने की कोशिश की।

विदेशों से लोग हमारे देश में आएं, उनके आगमन से देश की विदेशी मुद्रा बढ़े, देश समृद्ध हो, यह प्रसन्नता की बात है, लेकिन मनोरंजन के नाम पर देशी-विदेशी पर्यटकों द्वारा प्रकृति, पर्यावरण और भारतीयता से छेड़छाड़ दुखद है। पर्यटन और संस्कृति के बीच मजबूत संबंध भारत की युगों पुरानी विरासत है। प्राचीन समय में तीर्थाटन और देशाटन शब्द चलते थे। हमारे यहां पर्यटन का लक्ष्य सदा से कला-सौंदर्य के विकास के साथ ज्ञानार्जन और आध्यात्मिक समृद्धि रहा है। इतिहास गवाह है कि अरब और यूनान देशों में दर्शन और गणित का ज्ञान वहां के पर्यटक ही भारतवर्ष से लेकर गए थे। चीनी पर्यटक ह्वेनसांग और फाह्यान ने भारतीय ज्ञान और संस्कृति की अनगिनत बातें यहां से सीख कर अपने देशवासियों को बताई-सिखार्इं। इसी तरह भारत से विदेश जाने वाले कुमारजीव, कौडिन्य और बौद्ध धर्मानुयायियों ने अपने आचरण, तप और ज्ञान से वहां के देशवासियों को कृतार्थ किया। इस सच का पुनर्मूल्यांकन और नवीकरण करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। आज के दौर में ऐसे अनेक सवाल, ऐसी अनेक विसंगतियां हैं, जिन्हें पर्यटन और संस्कृति के समीकरण को हल करके सुलझाया जा सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो पाएंगे कि भिन्न-भिन्न भाषा और अलग-अलग प्रांतों के लोग दूसरे प्रांतवासियों के प्रति अनेक भ्रांतियां पाले हुए हैं। यह स्थिति देश की अखंडता और एकता के लिए कतई उचित नहीं कही जा सकती। ऐसी ही भ्रांतियां विभिन्न देशों में भी हैं। कई देशों का राजनीतिक ढांचा इसे अपने स्वार्थ के लिए बढ़ाता रहता है। मसलन, पड़ोसी देश के राजनीतिक तंत्र ने अपने मुल्क के लोगों में यह भ्रम फैला रखा है कि भारत में मुसलमानों की स्थिति अच्छी नहीं है, जबकि यह बात पूरी तरह असंगत है। इन निराधार बातों के कारण लोगों के बीच बेकार का टकराव और विद्वेष पनपता है। इन भ्रांतियों का निराकरण पर्यटन और संस्कृति के सबंधों को प्रगाढ़ बना कर आसानी से किया जा सकता है। भारत की समूची संस्कृति और विचार शैली सदाशयता, सद्भावना और सदाचार पर टिकी है।

सदियों से हमारा देश दुनिया भर के लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा है। एक समय था जब विदेशी हमसे व्यापारिक और राजनयिक संबंध कायम करने को लालायित रहते थे। आज भी हमारी ऐतिहासिक धरोहरें और प्राकृतिक संपदा सुदूर देश को यहां खींच लाती हैं। यह दुनिया का अकेला ऐसा देश है, जिसे विधाता ने अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य से नवाजा है। कुदरत की ऐसी कोई दौलत नहीं, जो हमारे देश में न हो। भारत की जो विशिष्टता इसे समूची दुनिया से अलग करती है, वह है इसका अध्यात्म ज्ञान। हमारे देश में आने वाले पर्यटकों का एक बड़ा हिस्सा यहां शांति की खोज में आता है। हमारे यहां वह सब कुछ है जो पर्यटन प्रेमियों को चाहिए। यही वजह है कि भारत में लगातार पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है। बाहर से आने वाले पर्यटक हमारे यहां औसतन दस से उनतीस दिन ठहरते हैं। यह पर्याप्त समय है। इतने समय में उन्हें देश की राष्ट्रीय विशेषताओं के बारे में बताया-सिखाया जा सकता है। यह दायित्व केवल सरकारी ढांचे से जुड़े लोगों का नहीं है। इसे सभी को अनुभव करना चाहिए। पर्यटन एक साथ अर्थव्यवस्था में अस्सी से ज्यादा उद्योगों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। मोटे तौर पर होटल, एयरलाइंस, सड़क परिवहन, हस्तकला, टूर आॅपरेटर के साथ दुकानदारी और मनोरंजन उद्योग को यह क्षेत्र सीधे-सीधे प्रभावित करता है। इसके अलावा अब पर्यटन चिकित्सा, कॉरपोरेट शिक्षा और शोध, तीर्थयात्रा, शासकीय और अन्य कई उद्देश्यों की प्राप्ति का साधन भी बन गया है। ऐसे में अपने राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्यों के दृष्टिगत पर्यटन से जुड़े सरकारी ढांचे के साथ संस्कृति और संस्कार का सच बताना-सिखाना सरकार और शासन के साथ हम सबका दायित्व है। पर्यटन उद्योग से जुड़े होटल व्यवसायी हों, दुकानदार, परिवहन व्यवस्था से जुड़े लोग हों या फिर कलाकर और शिल्पकार, सभी की सहभागिता जरूरी है। यही नहीं, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को भी इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाने की जरूरत है।

पर्यटन उद्योग धनार्जन का कारगर माध्यम भी है, पर भारतीय संस्कृति के जीवन मूल्य सबसे बढ़ कर हैं, क्योंकि इनके न रहने पर हम आखिर अपनी किन विशेषताओं के आधार पर देशी-विदेशी सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित कर पाएंगे? इसके लिए हमें पर्यटन उद्योग को अपनी राष्ट्रीय और प्रांतीय संस्कृति तथा संस्कारों की पाठशाला बनाने पर गहराई से विचार करना होगा। यह कर्तव्य राष्ट्रीय और प्रांतीय सरकारों के साथ पर्यटन उद्योग से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति का है, साथ ही प्रत्येक भारतवासी का भी। जो पर्यटक हमारे देश में, हमारे प्रांत में अपना बहुत सारा धन, समय और श्रम खर्च करके आते हैं, उनके मन में निश्चित ही बहुत कुछ देखने के साथ, बहुत कुछ जानने-सीखने की लालसा होती है।
उनकी देखने की लालसा तो जैसे-तैसे पूरी हो जाती है, पर जानने-सीखने की लालसा जस की तस रह जाती है। इसलिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि हम अंतरप्रांतीय और बाहर से आने वाले पर्यटकों को अपने प्रांत-देश की कौन-सी अनूठी बात बताए-सिखाएंगे? अगर हम सब मिल कर उनकी यह इच्छा पूरी कर सकें और पर्यटकों से अपनी आर्थिक संपन्नता बढ़ाने के बदले उन्हें मान-संस्कृति और संस्कार से समृद्ध कर सकें तो समझना चाहिए कि हम अपना राष्ट्रीय-सांस्कृतिक कर्तव्य सही रूप में निभा सके हैं। ०

 

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