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मुद्दा- कमाई की विषमता

वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में आर्थिक विषमता की खाई विकराल होती जा रही है।

Author February 5, 2017 5:21 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में आर्थिक विषमता की खाई विकराल होती जा रही है। भारत में तो यह स्थिति और गंभीर होती जा रही है। देश में उपलब्ध प्राकृतिक और भौतिक संसाधनों पर कुछ लोगों का कब्जा है। वित्तीय एजेंसी ‘क्रेडिट सुईस’ के अनुसार तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद भारत की सतहत्तर फीसद आबादी प्रतिदिन बीस रुपए से कम कमाई पर गुजारा कर रही है। करीब एक दशक पहले अर्जुन सेनगुप्त समिति ने भी विषमता को उजागर किया था। शिक्षा में विषमता, स्त्री-पुरुष में असमानता, कृषि और उद्योग में विषमता के साथ ही साथ आर्थिक विषमता भी देश के लिए चुनौती बनती जा रही है। भारत में विकास दर की तुलना गरीबी की कमी से की जाए तो यह साफ दिखता है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर विषमता को पाटने में कहीं से भी कारगर सिद्ध नहीं हो पाई है।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कीन्स ने ‘ट्रिकल डाउन’ सिद्धांत की बात कही थी। इनके अनुसार अगर उच्च वर्ग का विकास किया जाए तो निम्न वर्ग भी उससे खुद-ब-खुद लाभान्वित होता जाएगा, लेकिन यह सिद्धांत धरातल पर लागू होता नहीं दिख रहा है। पिछले दिनों ‘आक्सफैम’ ने वैश्विक स्तर पर बढ़ रही आर्थिक विषमता पर जो अध्ययन प्रस्तुत किया है, वह आंखें खोलने वाला है। इसका मकसद दुनिया भर के राष्ट्र प्रमुखों का ध्यान आर्थिक विषमता की ओर आकर्षित करना था। इसमें बताया गया कि दुनिया की एक फीसद सबसे अमीर आबादी की संपत्ति का आंकड़ा बाकी 99 फीसद आबादी की कुल संपत्ति से भी ज्यादा है। केवल आठ अमीरों के पास दुनिया की आधी आबादी के बराबर संपत्ति है। भारत में तो 58 फीसद संपत्ति भारत के एक फीसद लोगों के हाथ में है।

आक्सफैम ने उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों पर प्रश्न खड़ा करते हुए कहा कि यह मॉडल संपत्ति के न्यायपूर्ण बंटवारे में नाकाम साबित हुआ। पूंजी की ओर उन्मुख यह नीति संपन्न लोगों को और अधिक संपन्न तथा गरीब को और अधिक गरीब बनाने वाली है। दुनिया भर की सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा गरीबी और विषमता को दूर करने की कोशिशों के बावजूद यह तेजी से बढ़ती जा रही है। उदारीकरण और वैश्वीकरण से विश्व अर्थव्यवस्था में जितनी तेजी आई, उतनी ही आर्थिक विषमता में वृद्धि होती गई। चीन, भारत, इंडोनेशिया, लाओस, बांग्लादेश और श्रीलंका में दस फीसद अमीरों की संपत्ति में पंद्रह फीसद की वृद्धि हुई तो निचले दस फीसद आबादी के संपत्ति में पंद्रह फीसद से अधिक की गिरावट हुई है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जोशेफ स्टिग्लिट्ज ने अपनी पुस्तक ‘प्राइस आॅफ इनइक्वालिटी’ में बताया कि आय की विषमता जिस रफ्तार से बढ़ रही है उससे भी तेज रफ्तार से संपत्ति की विषमता बढ़ रही है।

भारत के लिए यह और चिंता की बात है। सरकारें कितना भी विषमता को पाटने का दावा करें, हकीकत यह है कि स्थिति बदतर होती जा रही है। पांचवी पंचवर्षीय योजना में पहली बार गरीबी उन्मूलन और आर्थिक निर्भरता की बात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उठाई थी। ग्यारहवीं और बारहवीं पंचवर्षीय योजना में समावेशी विकास की बात पर जोर दिया गया, अब जबकि बारहवीं पंचवर्षीय योजना 31 मार्च, 2017 को समाप्त हो जाएगी, तब यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर अब तक की उपलब्धि क्या रही? अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के दौर में एशियाई देश विकास और समानता के लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए हैं। ऊंची विकास दर विषमता से लड़ने में कारगर साबित नहीं हुई है। यही कारण है कि चीन और भारत में विषमता तेजी से दुनिया के अन्य देशों की अपेक्षा बढ़ रही है।

एक बात तो यह तय है कि अकेले जीडीपी की वृद्धिदर आर्थिक विषमता की खाई को पाटने और गरीबी को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। जीडीपी की वृद्धि दर और बढ़ती प्रति व्यक्ति आय से न्यायपूर्ण वितरण भी संभव नहीं है। इन्हीं सब पहलुओं को ध्यान में रखते हुए नब्बे के दशक में प्रमुख अर्थशास्त्री महबूब-उल-हक, अमर्त्य सेन और सिंगर ने मानव विकास को प्रमुखता से स्वीकारा और प्रतिव्यक्ति आय के स्थान पर प्रतिव्यक्ति व्यय योग्य आय को आर्थिक विकास का सूचक माना।

देश में किसानों और पूंजीपतियों, ग्रामीण और नगर के विकास की तुलना ही करना व्यर्थ है। देश के ग्रामीण आधारभूत ढांचे में सुधार करने के बजाय नगरीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसके कारण नगरों की स्थितियां भी बदतर होती जा रही हैं। खेती में निवेश कम होता जा रहा है जबकि कृषि के निर्यात से ही सरकार के राजस्व को शुद्धतम आय होती है। पिछले वर्ष के बजट में सरकार ने किसानों की आय को 2022 तक दोगुना करने की बात कही थी, लेकिन देश में शायद ही कोई ऐसा किसान होगा जिसकी आय में वृद्धि हुई हो या उसकी दशा में सुधार की कोई पहल हुई हो।

ताजा बजट भी विषमता से व्याप्त है। सामाजिक सुरक्षा पर बजट का वितरण बहुत ही कम है। जीडीपी का केवल तीन फीसद शिक्षा पर और 1.1 फीसद स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। भारत के भीतर यह विषमता प्रतिव्यक्ति आय से लेकर विभिन्न राज्यों की स्थितियों तक फैला हुआ है। आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 के अनुसार ‘एक दूसरा भारत’ प्रायद्वीपीय भारत से पिछड़ गया है। प्रायद्वीपीय भारत में गुजरात, केरला, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों को और दूसरे भारत में नदियों एवं खनिजों वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और झारखंड को रखा गया है।

सर्वेक्षण में यह कहा गया है कि प्रायद्वीपीय भारत विकास की दौड़ में जहां आगे निकल गया है, वहीं नदियों वाला भारत पीछे छूट गया है। असमान वितरण ही आर्थिक विषमता को जन्म दे रही है। वर्तमान दौर में निजीकरण के कारण सरकारी और निजी शैक्षिक संस्थाओं में भारी अंतर है। जहां निजी संस्थाएं सभी साधन-सुविधाओं से पूर्ण, ऊंची फीस वसूलने वाली हैं, वहीं सरकारी संस्थाएं संसाधनों की कमी का मार झेल रही हैं।इस प्रकार गरीब और अमीर की शिक्षा में भी विषमता बढ़ रही है। जरूरी हो गया है कि आर्थिक विषमता की बढ़ती खाई को पाटने के लिए सरकार कामचलाऊ रवैया छोडे और मजबूती से कदम उठाए। सरकार की प्रतिबद्धता के साथ ही साथ यह भी आवश्यक है कि इसके परिणाम भी सकारात्मक रूप में देखने को मिलें। १

 

 

 

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