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‘जरायम’ कॉलम मेें राजेंद्र प्रसाद शर्मा का लेख

प्राचीन भारतीय पुरामहत्त्व की वस्तुओं को संरक्षित और सुरक्षित रखने के उद्देश्य से 1972 से द एंटीक्यूटीज एंड आर्ट टीजर्स एक्ट काम कर रहा है।

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अमेरिका यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वहां के प्रशासन ने दो सौ से ज्यादा कलाकृतियां वापस की है। इन कलाकृतियों की बेशकीमती होने का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि इनमें से एक मूर्ति जो चेन्नई से चुराई गई थी वह चोल काल के एक तमिल कवि संत की है। इस मूति र्की कीमत पंद्रह लाख डालर आंकी जा रही है। इसी तरह से राजस्थान के बारां की एक मूर्ति इनमें शामिल है। गणेश की कांसे की यह मूर्ति भी बेशकीमती है। प्रधानमंत्री ने सही कहा है कि कुछ लोगोें के लिए इन कलाकृतियों की कीमत पैसे के रूप में हो सकती है, लेकिन यह हमारी सांस्कृतिक विरासत और संस्कृति का हिस्सा है।

गौरवशाली सभ्यता और संस्कृति की धनी हमारी पुरामहत्त्व की कृतियों पर लंबे समय से तस्करों की बुरी नजर रही है। एक दौर तो ऐसा भी रहा है जब कलाकृतियों खासतौर, से पुरानी मूर्तियों को चुरा कर बेचने की थीम पर फिल्मों की बाढ़ सी आ गई थी। इस तरह की फिल्मों में मसाला पुट होने से यह फिल्में बॉक्स आॅफिस पर सफल भी रहीं। देश में पुरामहत्त्व की कलाकृतियों और मूर्तियों के तस्करों की तो बन ही आई। खासतौर से दक्षिण के चोल वंशजों और इनके आसपास के शासन काल की कलाकृतियों की तस्करी आम हो गई।

आदिवासी और ग्रामीण इलाकों से चुन चुन कर मूर्तियों की तस्करी की गई। पुरामहत्त्व की कलाकृतियों व मूर्ति तस्करों के देशव्यापी नेटवर्क का इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि रेकी कर दूरदराज के इलाकों से पुरानी मूर्तियों और अन्य कलाकृतियों को सुनियोजित तरीके से चुराकर विदेश भेजने में वे सफल हो जाते हैं। यहीं नहीं, विदेशों में बड़ी आसानी से इन पुरावस्तुओें को नीलाम कर दिया जाता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में सत्तर लाख से अधिक बेशकीमती सांस्कृतिक महत्त्व की वस्तुएं हैं। यह भी सही है कि सांस्कृतिक विरासत के दस्तावेजीकरण का काम मंथर गति से चलने के कारण करीब तेरह लाख पुरामहत्त्व की वस्तुओं का का ही दस्तावेजीकरण संभव हो पाया है।

उधर, वांशिगटन स्थित ग्लोबल फायनेंसियल इंटीग्रिटी के अनुसार दुनिया में दुर्लभ पेंटिंगों,मूर्तियों और दूसरी कलाकृतियों का कालाबाजार चार सौ अरब डॉलर के आसपास है। एंटीक कृतियों के तस्करों और खरीददारों का विश्वव्यापी नेटवर्क है। भारत के प्रधानमंत्री को लौटाई गर्इं कलाकृतियां आॅपरेशन हिडन आइडल के दौरान पकड़ी गई थीं। 2007 में अमेरिका में भारतीय तस्कर और आर्ट आॅफ द पास्ट गैलेरी के मालिक सुभाष कपूर को तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और उससे भारी मात्रा में पुरामहत्त्व की वस्तुएं बरामद कर की गई थीं। इसमें से कुछ ही वस्तुएं लौटाई गई हैं।

प्राचीन भारतीय पुरामहत्त्व की वस्तुओं को संरक्षित और सुरक्षित रखने के उद्देश्य से 1972 से द एंटीक्यूटीज एंड आर्ट टीजर्स एक्ट काम कर रहा है। 2008 से 2012 के बीच 4,408 पुरामहत्त्व की दुर्लभ वस्तुओं की चोरी के मामले सामने आए। इनमें से 1493 वस्तुओं का पता लगाने में पुलिस सफल रही है। मजे की बात यह है कि एंटीक तस्कर ने बाकायदा साइट खोलकर पुरामहत्त्व की वस्तुओें की नीलामी करते हैं। इन नीलामी साइटों का ढंग से विश्लेषण करें तो सही स्थिति का आकलन किया जा सकता है।

इ सके लिए जहां देश में एक शाखा केवल ऐसी साइटों को चिह्नित करने और उन पर नजर रखने के लिए ही होनी चाहिए। पुरामहत्त्व की इस धरोहर को बचाए रखने के लिए दुनिया के देशों की पुलिस के बीच सूचनाओं का निरंतर आदान प्रदान और समन्वय-सामंजस्य भी होना जरूरी है। सबसे दुर्भाग्यजनक स्थिति यह होती है कि जब पुलिस द्वारा ऐसे गिरोहों से वस्तुएं बरामद की जाती हैं तो लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान उन वस्तुओं के सही रखरखाब की व्यवस्था नहीं होती। इससे इन वस्तुओं का क्षरण होता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि पुरामहत्त्व की यह थाती पैसों में नहीं आंकी जा सकती।

इसका अपना महत्त्व है। सही मायने में देखा जाए तो इसका कोई मूल्य नहीं, बल्कि यह तो अनमोल धरोहर हंै। हम सबका दायित्व है कि प्राचीन गौरवशाली धरोहर को बचाए रखें, संरक्षित और सुरक्षित बनाए रखें। सरकार को अन्य देशों से भी संपर्क बनाते हुए वहां तस्करी कर ले जाई गई भारतीय पुरामहत्त्व की वस्तुओं को वापस देश में लाने के प्रयास करने होंगे। देश में एंटीक वस्तुओं के तस्करों पर कड़ा अंकुश लगाना होगा। ऐसी न्यायिक प्रक्रिया अपनानी होगी जिससे तस्करों को कड़ी से कड़ी सजा जल्दी- जल्दी दी जा सके।

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