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जानकारी: मधुमक्खी है या फूल

मधुमक्खियों का फूलों के प्रति प्रेम अटूट है। खाने की तलाश में मधुमक्खियां अक्सर फूलों के उपर भिनभिनाती हुई नजर आ जाएंगी। मिताली जैन का लेख।

Author October 23, 2016 1:22 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

मिताली जैन

मधुमक्खियों का फूलों के प्रति प्रेम अटूट है। खाने की तलाश में मधुमक्खियां अक्सर फूलों के उपर भिनभिनाती हुई नजर आ जाएंगी। वे अपनी जीभ से फूलों का रस चूसकर अपने छत्ते में वापस लौट जाती हैं। लेकिन क्या आप किसी ऐसी मधुमक्खी के बारे में जानते हैं जो कभी भी फूलों के पौधों से दूर ही नहीं होतीं और उसे ही अपना घर बना लेती हों। दरअसल, यह मधुमक्खी असली नहीं होतीं बल्कि उन फूलों का आकार ही मधुमक्खियों जैसा होता है और इन्हें दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानों फूल पर मधुमक्खियां हों। अपनी इसी खूबी के कारण इन्हें बी-आर्किड के नाम से भी जाना जाता है।

मधुमक्खी आर्किड के नाम से मशहूर यह फूल मुख्य रूप से दक्षिणी और मध्य यूरोप में पाया जाता है। लेकिन इसके अलावा, इन्हें उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व भी देखा जा सकता है। यह अनोखा फूल यूरोप के अलावा आयरलैंड से लेकर डेनमार्क और काला सागर के पूर्व की ओर भूमध्य क्षेत्रों में काफी आम है। इस फूल का वैज्ञानिक नाम ओपरिस एपिपेरा है। इसके वैज्ञानिक नाम ओपरिस एपिफेरा एक ग्रीक शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है आईब्रो यानी भौंह। वहीं एपिफेरा एक लैटिन का शब्द है, जो मधुमक्खी की ओर इशारा करता है। यह मधुमक्खी आर्किड लगभग पंद्रह से बीस सेंटीमीटर की ऊंचाई तक बढ़ता है। ओपरिस एपिफेरा अर्द्ध शुष्क मैदान पर बढते हैं। यह चरागाह, चूना पत्थर या वुडलैंड के खुले क्षेत्रों में भी विकसित हो सकते हैं, बशर्ते वहां की मिट्टी कैल्शियम युक्त हो। जहां तक बात सूरज की किरणों और इनके विकास के आपसी संबंध की है तो तेज या कम रोशनी इनके विकास को प्रभावित नहीं करती। लेकिन समय और मौसम बदलने के साथ इनके रंग-रूप में बदलाव आता है।

मसलन, शरद ऋतु में इसकी पत्तियों पर छोटे-छोटे धब्बे दिखाई देते हैं, जो समय के साथ-साथ सर्दियों में धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं। इस पौधे के विकास की प्रक्रिया अप्रैल के मध्य से जुलाई के बीच आरंभ हो जाती है। इस दौरान इसमें एक कील का उत्पादन होता है और एक के बाद एक बारह फूल खिलते हैं। बाद में यही फूल जैसे-जैसे बढ़ने लगते हैं, यह एक मधुमक्खी के शरीर का आकार ले लेते हैं। फूल का रंग सफेद और गुलाबी होता है। साथ ही इसकी पंखुड़ियां पीली से हरे रंग की होती हैं। जो बहुत ही रोमिल और छोटी होती हैं।

फूलों की यह प्रजाति स्व-परागण करने में सक्षम होती है लेकिन इनका स्व-परागण केवल भूमध्य क्षेत्रों में ही सम्भव है। भूमध्य क्षेत्रों के अलावा किसी भी क्षेत्र में परागण के लिए इन्हें कीड़ों का सहारा लेना पड़ता है। कीड़ों को आकर्षित करने के लिए इन्हें बहुत अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती। दरअसल, इनका सिर्फ रंग-रूप ही मधुमक्खियों की भांति नहीं होता, बल्कि इन फूलों में से मादा मधुमक्खी जैसी खुशबू भी निकलती है। इसी खुशबू के कारण कीडेÞ खुद इन फूलों की ओर आकर्षित होकर इनके पास चले आते है। इनके रंग-रूप और खुशबू से आकर्षित होकर कभी-कभी नर मधुमक्खी भी इनके पास खिंचे चले आते हैं।

 

 

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