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भाषा-भेदी- भूलों को भूलें

विधान में उल्लेख, बड़ा-सा राजभाषा विभाग और बड़े-बड़े सरकारी तामझाम के बावजूद हिंदी का वैसा प्रचार नहीं हुआ, जैसा उसकी उपयोगिता को देखते-समझते हुए उसे सहज स्वीकार करने से हुआ है।
Author January 14, 2018 05:53 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

सुरेश पंत 

विधान में उल्लेख, बड़ा-सा राजभाषा विभाग और बड़े-बड़े सरकारी तामझाम के बावजूद हिंदी का वैसा प्रचार नहीं हुआ, जैसा उसकी उपयोगिता को देखते-समझते हुए उसे सहज स्वीकार करने से हुआ है। पिछली सदी के छठे दशक से ही दक्षिण में, विशेषकर तमिलनाडु में, हिंदी विरोध के स्वर मुखर होने लगे थे। पर इसके पीछे राजनीतिक कारण अधिक थे। आम जन समझ रहे थे कि राज्य की सीमाओं से बाहर देश से जुड़ने के लिए हिंदी सीखना उनके अपने व्यापक हित में है और वे औपचारिक-अनौपचारिक सभी माध्यमों से हिंदी सीखने को उत्सुक थे। राजभाषा का प्रचार-प्रसार सरकार की जिम्मेदारी भले रहा हो, संपर्क भाषा का विकास स्वत: होता रहा और हिंदी की आंचलिक शैलियां विकसित होती गर्इं। आज जिन रूपों को हम बंबइया हिंदी, हैदराबादी हिंदी या तमिल हिंदी कहते हैं, वे संपर्क भाषा हिंदी के ही रूप हैं। भाषा विज्ञान के क्षेत्र में आधुनिक अनुसंधानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य लगभग छह वर्ष की आयु तक अपनी मातृभाषा में दक्षता पा लेता है। उस भाषा के नियमों के सुदृढ़ संस्कार उसके मस्तिष्क में बैठ जाते हैं। इसके बाद वह जो भी भाषा सीखता है, उसके नियमों को पहले सीखी हुई भाषा के नियम प्रभावित करते हैं। नई सीखी जाने वाली भाषा पहली भाषा के जितने निकट बैठती है, उतनी ही सरलता से सीखी जा सकती है। जहां तक दक्षिण की भाषाओं का प्रश्न है, तमिलभाषी के लिए हिंदी सीखना अन्य की अपेक्षा कठिन है। मलयालम, तेलुगु, कन्नड़ में हिंदी की समान शब्दावली अधिक होने से और वर्ण और उच्चारण के नियमों की प्राय: समानता से इन भाषाओं को बोलने वाले तमिल मातृभाषियों की अपेक्षा हिंदी में भूलें कम करते हैं। पर तमिल के साथ स्थिति कुछ भिन्न है। आज उनकी कथित भूलों की चर्चा, ‘कथित’ इसलिए कि इन भूलों का भी अपना व्याकरण है।

तमिलभाषी हिंदी में जो भूलें करते हैं उन्हें मोटे तौर पर दो प्रकार की कह सकते हैं : रूप यानी वर्तनी संबंधी और रचना यानी अर्थ और प्रयोग संबंधी। वर्तनी की भूलों में सबसे अधिक महाप्राण व्यंजनों की है। तमिल में लिपि के स्तर पर और उच्चारण के स्तर पर भी महाप्राणत्व नहीं है। इसलिए महाप्राण को अल्पप्राण रूप में लिखा जाता है या अतिसतर्कता के कारण अल्पप्राण को भी महाप्राण कर दिया जाता है। आरम्ब में जगड़ा हो गया (आरंभ में झगड़ा हो गया), आंक दिकाओ (आंख दिखाओ), भिकारी को तोडा इदर बेजो (भिखारी को थोड़ा इधर भेजो), बारी बोज कैसे उटाऊं (भारी बोझ कैसे उठाऊं), खमरे में खदम रक्का (कमरे में कदम रखा), दुखानदार ने काना काया क्या (दुकानदार ने खाना खाया क्या)।
इसी प्रकार कभी अघोष के स्थान पर घोष और घोष के स्थान पर अघोष बोले-लिखे जाते हैं : जूट मत बोलिए (झूठ मत बोलिए), संदोष भड़ी चीज है (संतोष बड़ी चीज है), गांदीजी ने अपने हात से सूद कादा (गांधीजी ने अपने हाथ से सूत काता), नदी में जलांग लगाई (नदी में छलांग लगाई)।

तमिल में संस्कृत मूल के आगत शब्दों के कुछ संयुक्ताक्षरों में व्यंजन के साथ जुड़ने पर संयुक्त अक्षर के पहले ‘इ’ आ जाता है। इसलिए तमिल में जो वर्तनी शुद्ध है वह हिंदी में अशुद्ध हो जाती है, जैसे : पिरदम मंतिरी (प्रथम मंत्री), पिरसव (प्रसव), चंदिरमा (चंद्रमा), तंतिर-मंतिर (तंत्र-मंत्र)।  हिंदी के अन्य अनेक शब्द तमिल में भिन्न वर्तनी से लिखे जाते हैं। तमिल भाषी उसी वर्तनी को हिंदी में ले आते हैं, तो अनजाने भूल कर बैठते हैें जैसे : वक्कील (वकील), कच्चरा (कचरा), रोट्टी (रोटी), चप्पाती (चपाती), कम्मि (कमी), टाणा (थाना), चीट्टू (चिट), रयिल (रेल) आदि। हिंदी के बारे में प्राय: कहा जाता है कि वह जैसी बोली जाती है, वैसी ही लिखी जाती है। यह बयान हिंदी सीखने वालों के लिए बड़ा भ्रामक सिद्ध होता है। जैसे हिंदी में पद के अंत या पद के बीच में भी अक्षर के अंत में ‘अ’ का उच्चारण नहीं होता। तमिल में और अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी यह स्थिति नहीं है। शब्द की वर्तनी में ‘अ’ यदि है, तो बोला अवश्य जाता है। स्वाभाविक है कि तमिलभाषी हिंदी में ऐसी भूलें करते हैं। जैसे : दूस्रे (दूसरे), सुन्ता है (सुनता है), मिल्कर (मिलकर), सक्ता था (सकता था), हौस्ला (हौसला), बुन्कर (बुनकर) आदि।

तमिल और हिंदी की साझा शब्दावली के अनेक शब्द तमिल में भिन्न अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। मातृभाषा तमिल के ऐसे किसी शब्द को जब तमिलभाषी हिंदी में ले आता है, तो अनजाने अशुद्धि कर बैठता है। जैसे : संभव (घटना) मैं इस संभव को नहीं भूलूंगा। अवकाश (अवसर) आपके पास आने का अवकाश मिलना मेरा सौभाग्य है। कल्याण (विवाह) सीता का कल्याण राम के साथ हुआ। सामर्थ्य (चतुराई/सावधानी) दिल्ली जा रहे हो, सामर्थ्य से रहना। आलोचना (परामर्श) मैं आपसे मिल कर आलोचना करूंगा।
हिंदी व्याकरण के कुछ नियम भी तमिलभाषियों की कठिनाइयां बढ़ाते हैं। इनमें शायद सबसे विकट है लिंग निर्धारण। हिंदी में लिंग निर्धारण के नियम सुस्पष्ट नहीं हैं, परंपरा पर आधारित हैं और प्राय: प्रत्येक नियम या उपनियम का कोई अपवाद है। तमिल में ऐसा नहीं है। जैसे हिंदी में आकारांत और ईकारांत शब्द प्राय: स्त्रीलिंग हैं- इस तर्क पर तमिल में घोड़ा, नाला, पाला या पानी, घी, पक्षी का प्रयोग स्त्रीलिंग में हो जाता है। इसी प्रकार तमिल में विशेषण का कोई लिंग-वचन नहीं होता। हिंदी में कुछ का नहीं होता, कुछ का होता है। वे विशेष्य के लिंग-वचन के अनुसार बदलते हैं। यहां तमिलभाषी को असुविधा होती है और वह ‘अच्छी लड़की’ के स्थान पर अच्छा लड़की कह सकता है; क्योंकि तमिल में ‘नल्ल पैयन’ (अच्छा लड़का) और ‘नल्ल पेण’ (अच्छी लड़की) दोनों में विशेषण समान है। लिंग निर्धारण की इसी भ्रामकता से सर्वनाम संबंध कारक में ‘उंगल वीडु’ (आपका घर) के अनुसार वह ‘आपका पुस्तक’ (उंगल पुत्तकम) प्रयोग कर सकता है।

कुछ इस प्रकार की भूलें भी व्याकरण नियमों की शिथिलता से होती हैं :
तमिल में कर्ताकारक में ‘ने’ परसर्ग न होने से जहां नहीं लगना था, वहां लगा देते हैं या जहां नहीं लगना था वहां लगा दिया जाता है, जैसे- मैं पढ़ा (नान पडित्तेन), मैंने जा रहा हूं (नान पोगिरेन)।
संबंध वाचक सर्वनाम न होने से- क्या हम कर सकते हैं, वह करें (यन्न पण्ण मुडियदु, अदु पण्ण वेंडियदु)।
हिंदी के तमिल समानार्थी के अर्थ में क्षेत्र विस्तार से- केलु (पूछना/ मांगना)- भिखारी पैसा पूछता है; पोट्टू (डालना/ आॅन करना) पंखा डालो; पुरप्पडु (रवाना होना/ शुरू होना) गाड़ी शुरू हो गई।
दरअसल, हिंदी का एक पूर्ण मानक रूप तो सारे हिंदी क्षेत्र में कहीं भी नहीं है। उच्चारण और वाक्य रचना के नियम क्षेत्रानुसार भिन्न हैं। कहीं ‘दही खाई जाती है’ तो कहीं ‘खाया जाता है’, कहीं ‘मैंने’ नहाना है शुद्ध है तो कहीं ‘मुझे’ नहाना है। यही हाल वर्तनी का है। दुकान-दूकान, गर्मी-गरमी, दिवार-दीवाल/ दीवार जैसे अनेक शब्द चिढ़ाते हैं। ऐसे में हिंदी से भिन्न मातृभाषा भाषी की हिंदी पर नाक-भौंह सिकोड़ने के बजाय हमें उसका स्वागत करना चाहिए कि वह, जैसे भी हो, हिंदी बोल तो रहा है।
यहां अभिप्राय छिद्रान्वेषण नहीं, बल्कि हिंदी सीखने वाले और संभावनाओं से परिचित कराना है, जहां अशुद्धियां हो सकती हैं, और हिंदीभाषियों को यह बताना भी कि किसी की भूलों पर मुस्कराने से पहले वे समझ सकें कि भूलों के पीछे कोई कारण होता है। हम उनकी भाषा सीख कर उसे समझ सकते हैं। ०

 

 

 

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