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ललित प्रसंग – सपने और सवाल

हमारी व्यवस्था का दावा है कि आजादी के बाद हमारे देश में शिशुओं की मृत्यु दर में बहुत कमी आई है। यह सच है। मगर इससे ज्यादा यह सच है कि हमारे देश में सपनों की मृत्यु दर में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इस विशाल स्वप्नदर्शी देश की अधिकांश आबादी सपनों के शिशुओं से वंचित आबादी बन गई है।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

कभी-कभी जब आसपास कोई आवाज नहीं होती है, बहुत-सी आवाजें आने लगती हैं। कानों में गूंजने लगती हैं। मन पर छाने लगती हैं। नींद उचट जाती है। मेरे गांव में कोई कब्र नहीं है। फिर भी लगता है पूरा गांव ही कब्रगाह है। घर-घर में कब्र है। बहुत कम लोग हैं, भाग्यशाली, जो शयनयान पर सोते हैं। हमारे देश में शयनागार में सोने वाले बड़े थोड़े-से लोग हैं। बड़े थोड़े से लोग हैं, जिन पर लोकतंत्र की कृपा है। पता नहीं क्यों हमारे देश में लोकतंत्र बहुत थोड़े-से लोगों पर कृपालु है? ऐसा क्यों है? बार-बार सवाल उठता है। मगर किससे पूछें? सवाल जनमता है, फिर तुरत मर जाता है। हम उसे दफन कर देते हैं। हम जहां रहते हैं, वहीं दफन कर देते हैं। हम जहां अपने सवाल दफन करते हैं, देखते हैं कि वहां पहले-से भी बहुत-सी लाशें दफन हैं। अपनी लालसा की तमाम लाशें वहां दफन हैं। अपने सपनों के तमाम शव वहां दफन हैं। अपने विरोध और विद्रोह के तमाम मुर्दे वहां गड़े हैं। अपनी जरूरतों का क्या कहना, उनके शव को दफनाने के लिए तो रोज-रोज गड्ढे खोदने पड़ते हैं। हम गड्ढे खोदते हैं, पाटते हैं फिर उन्हीं के ऊपर चारपाई डाल कर सोने का प्रयत्न करते हैं। नींद आए तो ठीक। न आए तो ठीक। आज हमारे देश का अधिकांश आदमी कब्र के ऊपर चारपाई बिछा कर सोने को अभिशप्त है। क्यों? आजादी तो सबके लिए आई थी। समूचे देश के लिए आई थी। लोकतंत्र तो सबका है? हां, हां, हां… सब कहते हैं। सब झूठ कहते हैं। जो भी कुछ कहना जानते हैं, झूठ कहते हैं। बड़ा गजब है। जो, कुछ कहना नहीं जानते, वे कुछ भी नहीं जानते हैं। न सच जानते हैं। न झूठ जानते हैं। वे सिर्फ कहने वालों का कहा मानते हैं।

हमारी व्यवस्था का दावा है कि आजादी के बाद हमारे देश में शिशुओं की मृत्यु दर में बहुत कमी आई है। यह सच है। मगर इससे ज्यादा यह सच है कि हमारे देश में सपनों की मृत्यु दर में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इस विशाल स्वप्नदर्शी देश की अधिकांश आबादी सपनों के शिशुओं से वंचित आबादी बन गई है। इस महान देश के समूचे गांव सपनों के पूतों से निपूते गांव बन गए हैं। वे सपनों के गर्भधारण के अयोग्य बनते जा रहे हैं। बंध्यापन की बीमारी आंख-आंख को अपनी गिरफ्त में लपेटती, लीलती जा रही है। सपना कहीं किसी की आंख में कोटि जतन से पैदा हो भी गया तो पैदा होते ही उसका मरना तय है। उसे जमुआ दबा देता है। सपना पैदा होता है, पैदा होते ही मर जाता है। माटी जगाने की नौबत ही नहीं आती। यह रोज-रोज की मृत्यु का अवसाद अब तो मातम मनाना भी भूल गया है। सपना देखने का अधिकार हर किसी का अधिकार हुआ करता था। मगर नहीं। अब ऐसा नहीं है। अब समूचे देश में यह अधिकार एक समय में केवल एक अदमी को होता है। वह समूचे देश और सारे देशवासियों के लिए सपना देखने का अकेला हकदार होता है। उसका ही सपना, सबका सपना होना चाहिए। सबके सपने, उसके सपने भले न हो सकें, मगर उसका सपना सबका सपना हो सके, इसका वह पक्का संजाल रचता है। चूंकि एक समय में एक आदमी के ऊपर काम का बड़ा भारी बोझ रहता है, इसलिए वह और सब जरूरी कामों को संभालने के लिए सपने देखने के अपने अधिकार को अपने विश्वस्त शुभेच्छुओं को सुपुर्द कर देता है। वह अपने निकट के थोड़े-से चुनिंदा लोगों को सपने देखने की खुली आजादी सौंप देता है। जो सपने देखने के हकदार चुने जाते है, उनकी आंखें बड़ी होती हैं। उनकी बुद्धि विचक्षण होती है। उनके इरादे पक्के होते हैं, फौलादी। उनकी भूख बड़ी विकराल होती है। उनका हाजमा दुर्दांत होता है। फिर वे इत्मिमान से सपने देखते हैं। दिन-रात देखते हैं। सपने में डूबते-उतराते हैं। अपने सपने पर इतराते हैं। उनका सपना समूचे देश को अपनी बड़ी-बड़ी आंखों में कैद कर लेता है। समूचा देश उनमें खो जाता है। बड़ी-बड़ी आंखों के बड़े-बड़े सपनों में समूचे देश के असंख्य छोटे-छोटे लोगों के छोटे-छोटे सपने विलीन होकर बिला जाते हैं। उनका कहना होता है कि छोटे-छोटे सपने देश को छोटा बना देते हैं। तुच्छ बना देते हैं। दुनिया में देश की गरिमा को बौना बना देते हैं। यह ठीक नहीं है। दुनिया के बीच देश की नाक का सवाल है। देश का हाथ कट जाए, तो कट जाए। पांव कट जाए चलेगा। कलेजा फट जाए, कोई बात नहीं। मगर नाक, साबूत रहनी चाहिए।

इधर हमारे गांव हैं, जिन्हें देश की आत्मा कहा जाता है, उनकी आत्मा न जाने कहां अलोप हो गई है। उनके प्राण उनके शरीर से प्रयाण कर चुके हैं। फिर भी वे जी रहे हैं। जीवित बचे हुए हैं। काहे लिए? क्या प्रयोजन है, उनके जीवित बचे रहने का? बिल्कुल बेशरम हैं क्या? बिल्कुल बेहया हैं क्या? कौन कहे भला! नहीं, वे जी रहे हैं, अपने सपनों के शिशु शवों की कब्रगाह बनाने के लिए। वे कब्र खोदने के लिए जी रहे हैं। इसके लिए उनका जिंदा रहना जरूरी है, इसलिए जी रहे हैं। जिंदा रहना उनकी मजबूरी है, इसलिए जी रहे हैं। अब हमारे गांव में अधिकतर के लिए घर बनाने का सपना अपने जनम के साथ ही मरा हुआ सपना है। अपनी संततियों के पोषण का सपना मरा हुआ सपना है। अपने बच्चों के लिए शिक्षा का सपना मरने के लिए बीमार सपना है, जिसके लिए कोई अस्पताल नहीं है। कोई डॉक्टर नहीं है। कोई दवा नहीं है। अपनी बेटियों के ब्याह का सपना इतना डरावना सपना है कि उसके खौफ में नींद फटकती ही नहीं। भर पेट खाने का सपना, मन मुताबिक खाने का सपना, जवान मौत का शिकार सपना है। कुछ खरीदने का सपना, कुछ जोड़ने का सपना? पूछिए मत। ऐसे सपने अव्वल तो गर्भ में ही नहीं आते। गलती से आ भी जाते हैं तो दुर्दांत नियति की गर्जना से गर्भपात को प्राप्त हो जाते हैं। हां, कुछ घटने के, कुछ हटाने के सपने जरूर बहुत-सी आंखों में उतराते हैं, जैसे विषैले पानी में मरी हुई मछली उतराई रहती है।

इन तमाम सपनों को रोज-रोज समाधि देनी होती है। कहां? यहां कोई मुर्दहिया नहीं है। कब्रगाह नहीं है। कुल मिलाकर एक गुजर करने भर की छोटी-सी जगह है। उसी जगह में कब्र खोदनी है। सपने दफनाने हैं। उसी कब्र पर नहाना है। खाना है। चारपाई डंसा कर सोना है। फिर चारपाई उठा कर, उड़ास कर फिर कब्र खोदना है। आसपास कहीं कोई आवाज नहीं है। न हंसी-दिल्लगी की। न विरोध की। न विद्रोह की। न प्रतिरोध की। न आक्रोश की। ऐसे में चारपाई के नीचे से कब्र से आवाज आती है। नींद से जगाती है। फिर नींद को भी कब्र में खींच ले जाती है।
हम कब्र में पांव लटकाए पड़े हैं। हम न सोए हैं, न जागे हैं। हम न सो पा रहे हैं, न जाग पा रहे हैं। हम केवल भाग पा रहे हैं। हम भाग रहे हैं। अपने से भाग रहे हैं। अपनों से भाग रहे हैं। सपनों से भाग रहे हैं। भाग-भाग कर भी वहीं हैं। वहीं कब्र पर खड़े। कब्र पर पड़े।
कब्र से आवाज उठ रही है। आवाज गूंज रही है- ‘छोटे-छोटे आदमी, आदमी नहीं हैं, क्या? छोटे आदमी देश के नहीं हैं, क्या? छोटी-छोटी आंखें, आंखें नहीं है, क्या? छोटे-छोटे सपने, सपने नहीं हैं, क्या? छोटी मछलियां, मछलियां नहीं है, क्या?’

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