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सपनों से खेलते कोचिंग कारोबारी

जब लाख से ऊपर की संख्या में बाहर से ऐसे छात्र कोचिंग करने आने लगे तो पढ़ते तो 11वीं, 12वीं में कहीं और थे, लेकिन कोचिंग यहां करते थे।

कोटा लुभाता है। ठीक वैसे ही जैसे गांव हो या शहर, हर बच्चे और बड़े को ब्रांडेड चीजें लुभाती हैं।

कोटा के इंदिरा विहार में सिटी मॉल में पांच-छह बच्चों को रोक कर जब मैंने पूछा कि वे सब यहीं कोचिंग करने क्यों आए? उनमें से एक रूपेश रोनियार का जवाब था-‘ कोटा एक ‘रेस ट्रैक’ है और देश का हर छात्र इस रेस में शामिल होना चाहता है।’ वह पटना का रहने वाला है और यहां एलन कोचिंग संस्थान में ग्यारहवीं कक्षा से मेडिकल की कोचिंग करने इसी साल आया है। बिहार के ही गया से आई ईशानी डॉक्टर की बेटी हैं। उसका कहना था-‘बिहार में पढ़ाई नहीं। मैं जिद करके आई हूं। कोटा स्टूडेंट्स के सपनों का शहर है।’ 12वीं की छात्रा और इंजीनियरिंग की कोचिंग ले रही नागपुर की पलक रावत का कहना था- ‘मेरे लिए कोटा जीवन को स्वतंत्र रूप से जीने का जरिया है।’ मोतिहारी के सूरज मंडल के कहा, ‘मेरे पिता टैक्सी चलाते हैं। उनका सपना है मैं पढ़ंू और मेरा सपना है कि मैं आइआइटियन बनूं। इसीलिए यहां आ गया।’

…तो कोटा लुभाता है। ठीक वैसे ही जैसे गांव हो या शहर, हर बच्चे और बड़े को ब्रांडेड चीजें लुभाती हैं। जैसे भी हो उन्हें पाने की कोशिश रहती है। कोटा, आज एक ब्रांड है और उस ब्रांड की अपना एक मूल्य है। बंसल क्लासेज के विजिटर्स रूम में सोफे पर चार युवा महिलाएं आपस में बातचीत में मशगूल थीं। पूछने पर पता चला कि एक उत्तराखंड से है दूसरी मध्यप्रदेश, तीसरी झारखंड और चौथी असम से। वे अपने बच्चों को लेकर यहां रह रही हैं। यह पूछने पर वे अपने परिवार को छोड़कर यहां आई हैं, पर क्या जरूरी है कि बच्चा आइआइटी में चयनित हो ही जाए? जवाब था- होगा क्यों नहीं? इतनी मेहनत कर रहा है।’ आइआइटी में नहीं भी होगा तो भी किसी दूसरी अच्छी जगह पहुंच जाएगा। आखिर कोटा से कोचिंग ले रहा है।

यही है कोटा की ब्रांड वैल्यू। और कोचिंग संस्थान अपनी इस वैल्यू को बनाए रखने के लिए वह सब कुछ कर रहे हैं जो बच्चों और उनके मां-बाप को लुभाता रहे, उन्हें कोटा कोचिंग के सपने दिखाता रहे। सही है कि पिछले चार साल में बड़ी संख्या में कोचिंग के बच्चों ने आत्महत्याएं की हैं, लेकिन यह भी सच है कि मेडिकल और आइआइटी दोनों में ही यहां से छात्र बड़ी संख्या में चुने गए हैं और टॉप रैंकर भी रहे हैं। हालांकि, कोचिंग संस्थानों ने आत्महत्याओं से बिल्कुल पल्ला झाड़ लिया। ऐसा करना सचमुच उस पूंजीवादी संस्कृति का प्रतीक है, जिसमें धंधे की पहली शर्त किसी भी कीमत पर मुनाफा होती है। कोटा में कोचिंग के धंधे को जमाने वाले वीके बंसल का कहना था-‘टीचिंग कंपटीशन इज हेल्दी, नंबर कंपटीशन इज डेंजरस।’ और कोटा में आज ये दोनों ही कंपटीशन जोरों पर चल रहे हैं। पहले से उसकी बं्राड वैल्यू बनती है तो दूसरे की वजह से बच्चे आत्महत्याएं करने पर मजबूर हैं। सभी संस्थानों की नीति है- रिफाइंड माइंड्स पर जी जान लगा दो। टॉप वहीं करेंगे। उनके टॉप करने से कोटा भी टॉप पर रहेगा, जिससे देश के सर्वोत्तम प्रतिभाशाली लोग वहां आएंगे। और ये सपने ही उन्हें कोटा तक खींचकर लाएंगे। यहां तक न भी लाएं तो देश के हर बड़े शहरों में चल रहे उनके कोचिंग संस्थानों में दाखिले लेंगे। फायदा वहां भी होगा और यहां भी।

बंसल 1986 में एक बच्चे के ट्यूशन से शुरुआत की थी। 2000 में उनके पढ़ाए बच्चे ने आइआइटी में टॉप किया। इसके बाद उनके घर के बाहर एडमिशन के लिए लंबी लाइन लग गई। अठारह हजार बच्चों ने टैस्ट पास करके बंसल क्लासेस में दाखिला लिया। बंसल के अनुसार, ‘मुझे लगा कि अब पढ़ाने में मजा आएगा। क्योंकि अब मेरे पास देश के उम्दा दिमाग वाले बच्चे आएंगे। और वे आए भी।’ बंसल बताते हैं कि उनके मेन्टर ने उन्हें समझाया था कि बच्चों पर ध्यान देना। अगर इसमें कामयाब हो गए तो पैसा अपने आप बरसेगा। और वही हुआ भी। कहां तो मुझे मेरी नौकरी और गृहस्थी को चलाने की चिंता थी और कहां देखते ही देखते करोड़ों रुपए आने लगे।’  करोड़ों रुपए आने का ही लोभ था कि बंसल के जेके नगर कॉलोनी के पड़ोसी और आज के एलन कोचिंग के मालिक राजेश महेश्वरी को भी कोचिंग खोलने का चस्का लगा। बंसल के यहां पढ़ाने वाले प्रमोद माहेश्वरी और आरके वर्मा ने उनसे अलग होकर अपना अलग रास्ता तय किया। उस समय वे बंसल क्लासेज के और भी कई शिक्षकों और काबिल बच्चों को अपने यहां तोड़ लाए। ज्यादा पैसे देकर अच्छे ट्यूटरों को तोड़ने का सिलसिला आज गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा का रूप ले चुका है। उसी का नतीजा है कि आज कोटा के कोचिंगों में पढ़ाने वालों की सालाना तनख्वाहें पचास लाख से एक करोड़ या फिर उससे भी ज्यादा हैं। अपने को कोचिंग बाजार का डॉन मानने वाला एक संस्थान मानता है कि शिक्षक उसकी वजह से हैं, वह शिक्षकों की वजह से नहीं। यह अपने शिक्षकों को अपने वजूद के प्रति मानसिक तौर पर अचेत कर अचनी प्रभुता कायम करने का हथकंडा ही है।

बंसल की शुरुआत अच्छी रही। लेकिन, कोचिंग के बाजार में वह पीछे छूट गया है। प्रमुख कोचिंग संस्थानों में उसका नाम तो है पर उसका रुतबा गायब हो गया है। वहां पढ़ने वाले प्रतियोगियों में से कुछ आइआइटी वगैरह में चुन तो लिए जाते हैं, लेकिन वहां टॉपर नहीं दिखते। आज उसके पास प्रतियोगियों की संख्या काफी घट गई है। कारण? खुद बंसल के अनुसार, ‘हम मार्केटिंग में पीछे रह गए। बल्कि कहना चाहिए कि जो सस्ते तरीके कुछ संस्थानों ने अपनाए, हम अपना ही नहीं सकते थे। एलन व कुछ अन्य संस्थान बिहार और उत्तर प्रदेश में जाकर अपने बड़े- बड़े बोर्ड लगाते हैं। केंद्र खोलकर मां-बाप को बीस-बीस हजार में ही बच्चे को दाखिला देने का प्रलोभन देते हैं और उसके बाद उनके यहां बच्चों की लाइन लग जाती है। उसमें बच्चे का आई क्यू, रुझान, क्षमता किसी बात पर ध्यान नहीं दिया जाता। बच्चों की आत्महत्याओं के पीछे यही एक बड़ा कारण भी है। 2007 से पहले यहां किसी बच्चे ने आत्महत्या नहीं की। हम यह सब नहीं कर सकते। हमारे यहां आज भी उसी बच्चे को दाखिला मिलता है जो हमारे यहां की योग्यता परीक्षा पास कर लेता है।’

एलन के मीडिया सलाहकार प्रमोद मेवाड़ा से जब इस बारे में पूछा तो उनका कहना था, ‘पहले हमारे यहां भी योग्यता परीक्षा पास करने वाले बच्चों को ही लिया जाता था। पर जब देखा कि हमारे यहां से निरस्त हुए बच्चों को दूसरे संस्थान अपना लेते हैं तो फिर हमें लगा कि जब इनको एडमिशन लेना ही है तो क्यों न हमीं इन्हें अपने पास रखें।’ कुछ ऐसा ही जवाब ‘रेसोनेंस’ में भी मिला।कहने को तो ‘क्यों न हमीं’ मात्र तीन शब्द हैं, पर कोटा कोचिंग उद्योग का मुनाफाखोर चेहरा इन्हीं में छिपा है। यही वे शब्द या कहें कि सोच है जिससे कोटा का कोचिंग धंधा आज करीब पांच हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। और इसमें आत्महत्याएं करने वाले बच्चे वे हैं, जो अपनी या माता-पिता की जिद या सपने को पूरा करने के लिए आ तो जाते हैं पर यहां के हिसाब से खुद को ढाल नहीं पाते। चार साल से एलन में कोचिंग ले रही मानविकी बताती हैं कि कोई प्री-टैस्ट नहीं होने से मौैज मस्ती वाले और कमजोर छात्र भी भर्ती कर लिए जाते हैं। अगर एप्टीच्यूड टैस्ट और दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम पर आधारित टैस्ट लेकर कोचिंग में प्रवेश दिया जाए तो ‘स्क्रैप’ नहीं आएगा और संख्या भी अपने आप ही कम हो जाएगी।’

यह ‘स्क्रैप’ शब्द उसने अपने टीचर से सीखा है और कोचिंग संस्थानों को इसकी बहुत जरूरत है। एक बार दाखिला ले लेने के बाद ये आत्महत्याएं करें या नाकामयाब हो घर जाएं, उन्हें इससे मतलब नहीं। उनके लिए तो हर ‘स्क्रैप’ अस्सी हजार से सवा लाख रुपए का है। वह रकम मिल जाए बस उसके बाद क्या। अभी तक कोचिंग हो या छात्रावास, एक बार दाखिला हो जाने के बाद ली हुई फीस वापस नहीं की जाती थी। जिससे कोई बच्चा अपनी पढ़ाई छोड़ वापस जाना चाहता तो फीस वापस नहीं की जाती थी। आत्महत्या का यह एक बड़ा कारण था। प्रशासन की सख्ती के बाद अब इन संस्थानों ने बीच में छोड़कर जाने वाले बच्चों को पैसे वापस करने शुरू तो कर दिए हैं पर कोई भी संस्थान इस व्यवस्था से खुश नहीं। विडंबना यह है कि कोचिंग संस्थान हर छात्र को इंजीनियर, डॉक्टर बनाने का सपना दो दिखाते हैं, लेकिन असलियत यह है कि सरकारी कालेजों में सीटें बहुत सीमित हैं और प्रतियोगियों की तादाद बहुत ज्यादा। सारी मारामारी सरकारी कॉलेजों में पढ़ने की है।  बड़ी संख्या में दाखिले ने धंधे को और भी कई तरीके से बढ़ाया। सभी संस्थानों में बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ी और कोचिंग के लिए मौजूदा इमारतें कम पड़ने लगीं। तब एक से दो और दो से तीन यानी जरूरत के हिसाब से विस्तार होता चला गया और आज अकेले एलन की ही कोटा में बारह इमारतें हैं। सभी सेंट्रली कंट्रोल्ड। शहर में एलन का बोर्ड जहां कहीं भी लग जाता है, वहीं जमीनों के भाव बढ़ जाते हैं।

कोचिंग संस्थानों ने कोटा के बाकी शिक्षा जगत पर भी कब्जा कर लिया है। जब लाख से ऊपर की संख्या में बाहर से ऐसे छात्र कोचिंग करने आने लगे तो पढ़ते तो 11वीं, 12वीं में कहीं और थे, लेकिन कोचिंग यहां करते थे। शिक्षा-माफियाओं की नजर इस पड़ी तो उन्होंने अपने ही स्कूल खोल लिए। पर स्कूल में उतना पैसा कहां आता। ओलंपियाड और नेशनल टेलेंट हंट जैसी प्रतियोगी परीक्षा की कोचिंग भी शुरू कर दी। नतीजा, डमी एडमिशन की फीस, स्कूल की फीस और कोचिंग की फीस, सब अपनी ही झोली में आने लगी। करियर प्वाइंट ने तो पहली कक्षा से बारहवीं तक स्कूल और फिर अपनी ही यूनिवर्सिटी भी खोल ली है। अलबर्ट आइंस्टीन स्कूल के प्रधानाचार्य और भौतिक विज्ञान की तमाम किताबें लिख चुके गणेश तारे का कहना है, ‘कोटा में इन कोचिंग संस्थानों ने निजी स्कूलों के धंधे को निपटा दिया। मैंने इस बार ग्यारहवीं में बच्चों को एडमिशन नहीं दिए और अगले तीन चार साल में अपना स्कूल बंद कर दूंगा और उससे पहले सरकार को पत्र लिखकर बताऊंगा कि मुझे ऐसा क्यों करना पड़ रहा है।’ गणेश तारे ही नहीं, कोटा में और भी कई स्कूल बंद हो चुके हैं।
किसी-किसी ने तो अपने भवनों में अस्पताल ही खोल लिया है। कोटा में कोचिंग आज छात्रों का भविष्य सवांरने से ज्यादा मुनाफा कमाने का धंधा है। इसका एक बड़ा उदाहरण है लैंडमार्क सिटी।

कोटा में चंबल पार कुन्हाड़ी इलाके में कभी खेत ही खेत थे। पर आज इसे लैंडमार्क सिटी एरिया के नाम से जाना जाता है। भाजपा के पिछले शासन में इस जमीन का भू-प्रयोग बदल दिया गया था और आधी से ज्यादा जमीन यहीं के एक बड़े बिल्डर ने खरीद ली थी। फिर इस समूह के मालिक और एलन समूह के बीच एक समझौता हुआ। उसके मुताबिक एलन को काफी कम दाम पर जमीन दे दी गई और दो तीन जगह उसका बोर्ड लगा दिया गया। बोर्ड लगते ही पूरे इलाके की जमीन के दाम बढ़ गए। खरीदने वालों में अधिकतर राजनेता,
अधिकारी, आइएएस, आइपीएस, डॉक्टर, व्यापारी आदि थे। मकसद एक ही था। हॉस्टल बना कर लीज पर देना। आज यहां जिधर नजर दौड़ाओ बहुमंजिला छात्रावास ही दिखते हैं। मकान, जिनके नाम पर जमीन बेची और खरीदी गई, कोई इक्का-दुक्का ही हैं। कोटा हॉस्टल एसोसिएशन आत्महत्याओं के बारे में खबरों को दुष्प्रचार बताता है। उसे डर है कि अगर छात्र कम आएंगे तो उनका कारोबार मंदा हो जाएगा।

एसोसिएशन छात्रावासों के धंधे को व्यावसायिक गतिविधि नहीं मानता और इसके मुताबिक बिजली का बिल, सर्विस टैक्स और अन्य औपचारिकताएं भी पूरी करने को तैयार नहीं। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब जब प्रशासन इन पर सख्ती कर रहा है तो उन्होंने कोटा के तमाम विधायकों को अपने मांगपत्र देने शुरू कर दिए हैं। राजस्थान के पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता शांति धारीवाल के अनुसार लैंडमार्क सिटी में बनाए गए छात्रावास अवैध हैं। झालावाड़ रोड और रंगबाड़ी रोड पर भी तीन मंजिल से ज्यादा के छात्रावास अवैध हैं। इस बारे में जब कोटा के जिलाधिकारी रवि कुमार सुरपुर से पूछा गया तो उनका कहना था-इसे देखने की जिम्मेदारी नगर विकास न्यास की है।
पर क्या आपको नहीं लगता कि छात्रावास जरूरत से ज्यादा बन चुके हैं और क्योंकि छात्रों के हितों की रक्षा के लिए इनकी प्रबंधन व्यवस्था पर भी अब आपको निगरानी रखनी है तो आपकी भी कोई जिम्मेदारी बनती है? उनका जवाब था-अभी तक यह कारोबार बाजार की ताकतों से चल रहा था और अभी भी वही इसे नियंत्रित करेगा। अलबत्ता, उन्होंने माना कि छात्रावासों की संख्या जरूरत से कहीं ज्यादा हो गई है। १

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