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मजमे का बाजार

ये सब चमकते-दमते बाजार के समांतर पारंपरिक ढंग से अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। कारोबार जमाने के इनके नुस्खे अलग-अलग हैं। उसमें मनोरंजन भी है, लोगों का मनोविज्ञान समझने का हुनर भी है और भयादोहन करने का तिकड़म भी।
Author July 16, 2017 00:13 am
इस बाजार में यूनानी-आयुर्वेदिक दवाएं खानदानी नुस्खों की शर्त के साथ बेचते वैद्य हैं, जो हर मर्ज के शर्तिया इलाज का दावा करते हैं।

बाजार का लगातार विस्तार हो रहा है। विज्ञान रोज अपनी नई उपलब्धियां पेश कर रहा है। अंधविश्वास और जड़ मान्यताओं के विरुद्ध सरकारें लगातार जनजागरूकता अभियान चलाती रहती हैं। मगर इन सबके बावजूद तोते से भविष्य बंचवाने, सड़क किनारे के तथाकथित वैद्यों से नाड़ी दिखाने, हस्तरेखाएं पढ़वा कर भविष्य जानने की आदत लोगों में बनी हुई है। ये सब चमकते-दमते बाजार के समांतर पारंपरिक ढंग से अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। कारोबार जमाने के इनके नुस्खे अलग-अलग हैं। उसमें मनोरंजन भी है, लोगों का मनोविज्ञान समझने का हुनर भी है और भयादोहन करने का तिकड़म भी। इस मजमे के बाजार के बारे में बता रहे हैं अभिषेक कुमार सिंह।

कहा जाता है कि यह नया दौर बाजार का है। इधर जबसे देश में सेवा एवं वस्तु कर (जीएसटी) लागू हुआ है, दावा किया जा रहा है कि अब पूरा बाजार व्यवस्थित हो जाएगा। देश में कहीं भी जाएंगे, एक ही कीमत पर चीजें मिलेंगी। पर इस व्यवस्थित बाजार से बाहर भी एक बाजार है। रेहड़ी-पटरी, ठेले, खोमचे वालों का बाजार। इस बाजार में भी खरीदार और हजारों दुकानदार हैं। वे शायद कभी कोई जीएसटी न चुकाएं, पर दो वक्त की रोटी कमाने का प्रबंध कर ही लेंगे। पर इन सबसे हट कर एक बाजार और है। मजमे का बाजार।

इस बाजार में यूनानी-आयुर्वेदिक दवाएं खानदानी नुस्खों की शर्त के साथ बेचते वैद्य हैं, जो हर मर्ज के शर्तिया इलाज का दावा करते हैं। इस बाजार में वे भी हैं, जो नाड़ी और चेहरे की रंगत देख कर दवा की कोई पुड़िया थमाते हैं और उसके असर का दावा करते हैं। यहीं ऐसे दंत चिकित्सक भी मिल जाएंगे, जिनके पूरे शहर में चाहने वालों की कोई कमी नहीं है। हड्डी ठीक करने और जोड़ने वाले भी दिखते हैं, जिनके हाथों के जादू की चर्चा आसपास के मुहल्लों में मिल जाती है। दावा किया जाता है कि अच्छे से अच्छा हड्डी का डॉक्टर जो काम नहीं कर पाता, इनका हाथ लगते ही मरीज चंगा हो जाता है। मजमे के इसी बाजार में पटरी पर तोते से कुछ कार्ड निकलवा कर भविष्य बताने वाले भी हैं। हाथ देख कर किस्मत बांचने वाले भी और टैरो कार्ड पढ़ कर भविष्य की जानकारियां देने वाले ज्योतिषी भी। ऐसे भी मिल जाएंगे, जो गंगाजल और प्रसाद बांट कर लोगों के उज्ज्वल भविष्य की गारंटी देते हैं।

सड़क किनारे शाही दवाखाना

हैरत होती है जब किसी दवाखाने के नाम में शाही शब्द जुड़ा हो और वह बेहद पुराने, कटे-फटे तंबू में चल रहा हो। पर ऐसे तंबू आज भी गांवों से ज्यादा कस्बों और लखनऊ, पानीपत, कपूरथला से लेकर दिल्ली के नजदीक गाजियाबाद जैसे शहरों में लगे मिल जाएंगे, जहां खुद को वैद्य कहने वाला शख्स हड्डी टूटने से लेकर दमा, यहां तक कि जानलेवा कैंसर का इलाज बीस से डेढ़ सौ रुपए की खुराक में करने का दावा करता है। ये वैद्य खुद को खानदानी बताते हैं और बिना कोई जांच किए, सिर्फ नब्ज देख कर हर मर्ज के जड़ से खात्मे की गारंटी देते हैं। इनके पास न तो चिकित्सा की कोई डिग्री होती है और न किसी विभाग से इनका ताल्लुक होता है, पर तंबू में या पटरी पर बिछी दरी पर कुछ डिब्बों में जड़ी-बूटियां दिखती हैं।

इन्हें कूटने-पीसने में मगन रहने वाले ये वैद्य पास आए मरीज को शर्तिया इलाज की गारंटी के साथ चंद नुस्खे थमा देते हैं और मरीज की हैसियत के मुताबिक बीस रुपए से लेकर हजार-डेढ़ हजार रुपए तक वसूल लेते हैं। इनका पूरा कारोबार मरीज को उसकी बीमारी का भय दिखाने पर टिका होता है। बहरहाल, तंबू या पटरी पर चलने वाले ऐसे शाही दवाखाने या हिमालय आयुर्वेदिक दवाखाना, नवजीवन-जगजीवन, शिवशंकर या शिवशक्ति खानदानी दवाखाने दर्जनों की संख्या में लखनऊ, पानीपत, बंगलुरू, गाजियाबाद आदि जगहों पर मिल जाते हैं। लखनऊ में तिलक मार्ग, शिया कॉलेज, ताड़ीखाना, तिलक मार्ग, सरफराजगंज, हरदोई रोड, रायबरेली रोड तो पानीपत में हर चौक-चौराहे पर, जालंधर में कपूरथला रोड पर, तो गाजियाबाद में मेरठ जाने वाले हाइवे पर ऐसे झोलाछाप हकीम लोगों का इलाज करते मिल जाएंगे।इनमें से कुछ तो कथित तौर पर ऐसी ख्याति का दावा करते हैं कि उनके पास आया कोई मरीज आज तक निराश नहीं हुआ। लखनऊ में तंबू लगाकर शाही दावाखाना चलाने वाले सरदार वैद्य का दावा है कि पेट की बीमारियों के लिए उनके चूरन और मालिश के तेल का करिश्माई असर होता है।
राह के ज्योतिषी

देश में सड़क छाप ज्योतिष का भी खूब चलन है। किसी मेले-ठेले या छोटे शहरों-गांवों-कस्बों के मुकाबले सड़क किनारे हाथ बांचने, तोते से कार्ड निकलवाने या खुद टैरो कार्ड के जरिए व्यक्ति के भूत-भविष्य का खाका खींचने वालों की एक जमात बड़े शहरों के व्यस्त इलाकों में खूब देखने को मिलती है। सड़क किनारे भाग्य बांचने वालों में से कुछ तो मशहूर हस्ती जैसा दर्जा रखते हैं और उनकी चमचमाती दुकानें भी होती हैं। पिछले दिनों दिल्ली के पहाड़गंज स्थित एक मशहूर ज्योतिषी के बारे में कुछ रिपोर्टें अखबारों में प्रकाशित हुई थीं कि कैसे देश-विदेश के लोग उनसे अपना हाथ बंचवाने आते हैं। उनका दावा है कि उनके ग्राहकों में साठ फीसद विदेशी होते हैं। बताते हैं कि पहाड़गंज में तीस साल पहले सड़क किनारे उन्होंने लोगों से इस सवाल के साथ अपने कामकाज की शुरुआत की थी कि क्या आप अपना भविष्य जानना चाहते हैं।  बेशक, बहुत-से लोग अपना भविष्य जानना चाहते हैं, पर सवाल है कि क्या सच में ये ज्योतिषी भविष्य जानते हैं। इस बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला असल में मनोविज्ञान का है। घर-परिवार-रोजगार-बच्चों का भविष्य- ज्यादातर ऐसे ही मुद्दों से जुड़े सवालों के हल लोग जानना चाहते हैं और ज्योतिषी इन्हीं के इर्दगिर्द कोई गोलमाल-सा जवाब तैयार रखते हैं। विदेशी ग्राहक ज्यादातर अपने संबंधों के बारे में जानना चाहते हैं। सिर्फ हाथ पढ़ कर नहीं, तोते से कार्ड निकलवा कर भविष्य बताने की सटीकता की संभावना इसीलिए ज्यादा होती है, क्योंकि ज्यादातर लोगों का जीवन एक-सा होता है।

हालांकि कभी-कभी अद्भुत संयोग घटित हो जाते हैं, जिससे कोई ज्योतिषी या फिर तोता भी चर्चा में आ जाता है। जैसे, इस साल विधानसभा चुनावों के वक्त शिमला में लाल गर्दन वाले तोते से चुनावी भविष्य के कार्ड निकलवाए गए। गंगाराम नामक इस तोते ने चुनावी नतीजे आने से पहले जो कार्ड निकाले, उनमें विजेता पार्टी के रूप में कांग्रेस और मुख्यमंत्री के रूप में कैप्टन अमरिंदर सिंह के नाम का चयन किया था। यह रिपोर्ट एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक में नतीजों से पहले छपी थी, जिसमें अन्य नामी ज्योतिषियों ने अलग भविष्यवाणियां की थीं।
गंगाराम तोते की भविष्यवाणी के सही निकलने के पीछे विशेषज्ञों का मत है कि सारा खेल मानसिकता भांपने, गणित और तकनीक का है। सड़क किनारे बैठे ये ज्योतिषी अपने पास आने वाले व्यक्ति के हाव-भाव और पहनावे आदि से भांप जाते हैं कि आखिर वह क्या जानना चाहता है। इसके लिए वे पूरी तैयारी करके रखते हैं। किस वक्त कौन से ग्राहक उनके पास आ सकते हैं, इसका अंदाजा भी उन्हें रहता है। जैसे गृहणियां शाम चार से पांच बजे के बीच, तो कामकाजी नौजवान छह से सात बजे के बीच और पर्यटक अक्सर दोपहर में आते हैं।
तोते से कार्ड निकलवाने वाले ज्योतिषी स्थान विशेष के हिसाब से अपने कार्डों का चयन भी करके रखते हैं।

उस जगह आने वाले लोगों की आर्थिक हैसियत, वैवाहिक स्थिति, स्त्री-पुरुष का भेद, शिक्षा का स्तर क्या होता है- इस आधार पर कार्डों का संयोजन किया जाता है। यही वजह है कि जब तोता व्यक्ति की स्थितियों के अनुसार कोई कार्ड निकालता है, तो वह अचंभित और अवाक रह जाता है। तोते से भविष्य बताने वाले ज्योतिषियों के बारे में जानकारों का मत है कि वे ऐसा करिश्मा कबूतर या मुर्गे से नहीं कर सकते, क्योंकि भविष्य कार्ड में नहीं, तोते के प्रशिक्षण में छिपा होता है। तोते को ऐसा प्रशिक्षण दिया जाता है कि कार्डों को परखते हुए कहां रुकना है और कौन-सा कार्ड उठाना है। अपने मालिक की चुटकी, खांसी और हल्की-सी हुंकार को तोते आसानी से सुन कर उनका पालन करते हैं और व्यक्ति का मनचाहा कार्ड निकाल कर सामने रख देते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि शिमला के तोते ने इसलिए कांग्रेस और अमरिंदर सिंह का कार्ड निकाला था, क्योंकि रिपोर्टर यही कार्ड देखना चाहता होगा। कार्ड निकालने का काम ज्योतिषी खुद भी कर सकते हैं, पर वे ऐसा नहीं करते, क्योंकि तब एक पक्षी से भविष्य का कार्ड निकलवाने का अचंभा खत्म हो जाता है।

आसान कार्यशैली

कथित शाही दवाखानों, हाथ पढ़ कर या तोते से भविष्य बताने वालों की कार्यशैली प्राय: एक जैसी है। शुरुआत में बेहद कम फीस, हर बीमारी का इलाज, हर समस्या का समाधान और अचंभित करने वाली कोई बात या क्रिया लोगों को उनकी तरफ खींचती है। सड़क किनारे ऐसे दवाखानों के बाहर अक्सर पेट में गैस, दस्त से लेकर कमजोर इंद्रियों और बच्चे न होने की बीमारी के शर्तिया इलाज के लंबे-चौड़े दावे बैनर पर छपे मिल जाते हैं। ये कथित वैद्य अपने इन तंबुओं को कैंप कहते हैं और इनके खुलने-बंद होने का समय उसी तरह निर्धारित होता है, जैसे किसी अस्पताल या क्लीनिक का। अलबत्ता, रात-बिरात कोई मरीज उनके चंगुल में आकर फंस जाए, तो वे किसी को निराश नहीं करते। इनका प्रचार सिर्फ तंबुओं के बाहर लगे बैनर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शहरों के बाहर रेलमार्गों, हाइवे और संपर्क मार्गों के नजदीक मकानों-फैक्ट्रियों की दीवारों पर इनके शर्तिया इलाज के बारे में लिखा रहता है। जैसे, दिल्ली-पानीपत की रेललाइन के नजदीक दिखने वाली दीवारों यह संदेश बेहद आम था कि जो लोग बेऔलाद हैं, उन्हें किसी कारण बच्चा नहीं हो रहा और वे बच्चा पाने के लिए लाखों रुपये खर्च कर घर बैठ चुके हैं तो घबराएं नहीं, एक बार पानीपत जरूर जाएं, शर्तिया बच्चे होने की दवाई यहां पर मिलती है।

प्रचार का दूसरा तरीका है मजमा लगाना। ये वैद्य दिन की रोशनी में दो-चार लोगों के जुट जाने पर खीरेनुमा किसी वनस्पति का रस निकालते हैं। थोड़ी देर उसे एक कटोरे में रख कर दिखाते हैं कि कैसे वह जम कर सख्त हो गया है। इस आधार पर वे दावा करते हैं कि अगर कोई मर्द इस रस में उनके द्वारा सुझाई गई जड़ी-बूटी मिला कर सेवन करेगा, तो उसकी मर्दाना ताकत में रातोंरात दसियों गुना इजाफा हो जाएगा। यूट्यूब पर तो एक वीडियो ऐसा भी देखने को मिला है, जिसमें सड़क किनारे वैद्यकी करने वाले शख्स ने दो पिटारों में पनीले सांप रख रखे हैं। इन सांपों को खुले पिटारों में हरकत करते, यहां-वहां झांकते देख कर राहगीरों की भीड़ रुक जाती है, जिसके बाद वैद्यजी अपने करिश्मों को बखान शुरू कर देते हैं।
ऐसी दवाएं और इलाज साफ तौर पर लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ हैं, पर स्वास्थ्य विभाग की तरफ से इन नीम-हकीमों पर अंकुश लगाने की असरदार पहल कहीं नजर नहीं आती। तब तक कोई कार्रवाई नहीं होती, जब तक किसी मरीज की मौत न हो जाए या कोई जागरूक व्यक्ति हंगामा न कर दे। सड़क किनारे का एक हिस्सा अवैध रूप से कब्जाने वाले ये ज्यादातर वैद्य खुद अनपढ़ होते हैं, लेकिन संदिग्ध दवाएं बेच कर पैसे कमाने की कला में ये महारत रखते हैं।
दांतों के देसी डॉक्टर

तंबू लगा कर नीम-हकीमी करने वाले वैद्यों से थोड़ी अलग एक जमात दांतों के देसी डॉक्टरों और हड्डी, मोच सही करने वाले जानकारों की भी है। छोटे शहरों में इनकी संख्या काफी है, पर महानगरों में भी कुछ इलाके ऐसे हैं, जहां ऐसे चिकित्सक मिल जाते हैं। दिल्ली में मदर डेयरी इलाके में हड्डी-मोच के इलाज करने वाले ऐसे सिद्धों की काफी अरसे तक चर्चा थी। पर अभी जयपुर, बंगलुरू, अमदाबाद, पटियाला, जालंधर, लखनऊ आदि शहरों में ऐसे डॉक्टरों की डॉक्टरी चल रही है। बंगलुरू में बस अड्डे के पास करीब डेढ़ दशक पहले अपने देसी डेंटल क्लीनिक खोलने वाले अल्लाह बख्श की ख्याति इतनी है कि अब भी वहां रोजाना करीब बीस मरीजों का तसल्लीबख्श इलाज होता है। इनके क्लीनिक में लगाई जाने वाली नकली बत्तीसी या तो देश में बनती है या फिर चीन से मंगाई जाती है, पर कीमत महज साढ़े सात सौ रुपए। तीन से चार साल चलने वाली बत्तीसी की यह कीमत उस गरीब और मध्यवर्गीय शख्स की जेब के मुताबिक ही है, जो एक मान्यता प्राप्त अच्छे डेंटल क्लीनिक में सिर्फ जांच के लिए हजार-पांच सौ रुपए खर्च नहीं कर सकता। वैसे भी हमारे देश में इतने डेंटिस्ट और डेंटल क्लीनिक नहीं हैं, जो आबादी की जरूरत पूरी कर सकें। हर साल देश में तीस हजार डेंटिस्ट तैयार होते हैं, जो जरूरत के मुताबिक कम हैं, इस पर वे गांव-देहात में तो जाना ही नहीं चाहते। जाहिर है, ऐसे में सड़कछाप डेंटिस्टों पर लोगों की निर्भरता रहती है, जो लोगों की मजबूरी में बेहतरीन न सही, पर इलाज तो मुहैया कराते हैं।

क्या कहता है कानून

ज्योतिषियों के बारे में तो नहीं, लेकिन नीम-हकीमी के खिलाफ देश के कानून में स्पष्ट आदेश और धाराएं हैं। देश का आयुष मंत्रालय भी स्पष्ट कर चुका है कि बिना पंजीकरण कराए कोई भी डॉक्टर कैसी भी आयुर्वेदिक या यूनानी दवा और इलाज की प्रैक्टिस न करे। इस बारे में समाचारपत्रों में विज्ञप्ति प्रकाशित कर सूचित किया जा चुका है कि अगर कोई भी वैद्य आयुर्वेद या यूनानी चिकित्सा कर रहा है या ऐसा करना चाहता है, तो इसके लिए आयुर्वेदिक और यूनानी तिब्बती चिकित्सा पद्धति बोर्ड (पूर्व नाम- भारतीय चिकित्सा परिषद) कार्यालय में अपना आवेदन प्रस्तुत करे। आवेदन की जांच के बाद डॉक्टर की डिग्री और अनुभव आदि के आधार पर उन्हें पंजीकरण दिया जाता है, तभी वे इलाज कर सकते हैं। इसके बगैर इलाज करना ही गैरकानूनी नहीं है, बल्कि इलाज कराने वाले मरीज को भी इसके लिए दंडित किया जा सकता है।

भारतीय दंड संहिता के तहत कोई भी व्यक्ति डेंटिस्ट एक्ट आॅफ 1948 के मुताबिक, सड़क किनारे बैठ कर बिना योगयता प्राप्त डॉक्टर से दांत ठीक करवाता है तो उसे जेल जाना पड़ सकता है। इस तरह कान की सफाई करवाना भी गैरकानूनी है। पर ऐसी चेतावनियां और सूचनाएं देना एक बात है, हकीकत की जमीन पर उन्हें उतारना दूसरी। ऐसे ज्यादातर हकीम-वैद्य जांच के लिए आए इंस्पेक्टरों की जेब गरम करके मजे में अपना धंधा चलाते रहते हैं। एक अनुमान के मुताबिक देश में ऐसे करीब दो लाख नीमहकीम काम कर रहे हैं। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि कानून या प्रशासन उन पर अंकुश नहीं लगा पा रहा है, बल्कि यह भी है कि देश के ज्यादातर अस्पतालों में सस्ता इलाज मुहैया नहीं है या जरूरत के मुताबिक डॉक्टर नहीं हैं।

 

 

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