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विमर्श: पाठक से दूर होती कविता

हिंदी की विभिन्न साहित्यिक विधाओं में कविता आज सर्वाधिक संकट के दौर में है।

Author February 5, 2017 5:01 AM
प्रतीकात्मक चीत्र।

हिंदी की विभिन्न साहित्यिक विधाओं में कविता आज सर्वाधिक संकट के दौर में है। हालांकि हिंदी में सबसे अधिक कविताएं ही लिखी जा रही हैं और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हो रही हैं। गद्य लेखकों की तुलना में कवियों की संख्या भी कम नहीं है। किसी भी विधा की तुलना में कविता के लिए मंच, अवसर और पुरस्कार त्अधिक हैं। ऊपर से बेहतर नजर आ रही इन स्थितियों ने कविता के वास्तविक संकट को कभी पहचानने ही नहीं दिया। मंचों, अवसरों और पुरस्कारों की संख्या बढ़ा कर कविता के असली संकट को ढंकने का प्रयास किया गया। पर जैसाकि अक्सर होता है, ढंकने से समस्या और बढ़ जाती है। यहां भी वैसा ही हुआ।

हिंदी कविता के पाठक क्रमश: कम होते गए और स्थिति यहां तक पहुंच गई कि आज लिखी जा रही हिंदी कविता का कोई स्वाभाविक पाठक है ही नहीं। वह लगभग पूरी तरह पाठक-विहीन हो गई है। प्रकाशक काफी मान-मनौवल के बाद या किसी साहित्येतर प्रलोभन में ही काव्य संकलन छापने को राजी होते हैं। एक ऐसा परिदृश्य बन गया है, जिसमें ढेर सारे कवि हैं, ढेर सारी कविताएं हैं, पर पाठक नदारद हैं। कविता के इस मूलभूत संकट यानी पाठक-विहीनता को इस तर्क से भी ढंकने का प्रयास किया जाता है कि बाजारवाद और उपभोक्तावाद के दौर में साहित्य मात्र के लिए संकट मंडरा रहा है। कविता के संकट को भी साहित्य के संकट के तौर पर ही देखना चाहिए। ऐसे में सवाल है कि आखिर इसी दौर में कहानी, उपन्यास आदि गद्य विधाओं के कम ही सही, पाठक तो हैं, लेकिन कविता के क्यों नहीं! कहानी, उपन्यास पढ़ने के लिए समय भी अधिक चाहिए होता है। कविता पढ़ने के लिए बहुत अधिक समय की जरूरत नहीं होती। समय की कमी को देखते हुए आज के पाठक के लिए कविता ही सर्वाधिक उपयुक्त होनी चाहिए, पर ऐसा नहीं है। इसके कुछ ठोस कारण हैं और उन पर गंभीरता से विचार की जरूरत है।

हजार वर्षों के साहित्य के इतिहास में कविता एकमात्र केंद्रीय और लोकप्रिय विधा रही है। यहां तक कि जब आचार्य शुक्ल ने आधुनिककाल को गद्यकाल कहा तब भी कविता की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई और द्विवेदी युग तक कविता लोकप्रिय बनी रही। इसलिए गद्य के उद्भव ने कविता को अलोकप्रिय बनाया हो, वैसी बात नहीं है। द्विवेदी युग के बाद भी कई कवि हुए, जो लोकप्रियता में किसी गद्यकार से कमतर नहीं हैं। मगर उनका दुर्भाग्य यह रहा कि उन्हें श्रेष्ठता के सिंहासन से नीचे उतार दिया गया और लोकप्रियता की एक निम्न कोटि बना कर उसमें डाल दिया गया।गौर करने लायक बात यह है कि हिंदी काव्य-परंपरा में लोकप्रियता और श्रेष्ठता में कभी विरोध रहा ही नहीं है। जो श्रेष्ठ है वही लोकप्रिय भी है। विरोध की शुरुआत असल में ‘छायावाद’ से होती है। पहला विरोध भाषा के स्तर पर दिखाई देता है। तत्सम प्रधान शब्दावली के साथ छायावाद ने अपने को जनता की भाषा ‘हिंदुस्तानी’ से अलग किया। दूसरा, उसने हिंदी के वाक्य विन्यास को कविता में पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। रही सही कसर उसकी लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता और रहस्यवादिता ने पूरी कर दी। फलस्वरूप हिंदी पाठक और हिंदी कविता में एक अलगाव की शुरुआत हो गई। आगे आधुनिकता और आधुनिक भावबोध के नाम पर प्रयोगवाद और फिर नई कविता के दौर में यह सिद्धांत के तौर पर स्वीकार कर लिया गया कि जो कविता लोकप्रिय होगी उसमें आधुनिक भावबोध की अभिव्यक्ति अनिवार्यत: नहीं होगी और इसीलिए वह श्रेष्ठ भी नहीं हो सकती है। यानी, किसी कवि या कविता की श्रेष्ठता को निर्धारित करने वाली विभिन्न कसौटियों में से लोकप्रियता को एक दुर्लभ कसौटी मानने की जगह लोकप्रियता को ही सबसे बड़ा अवगुण घोषित कर दिया गया।

कविता के इस रणनीतिक मानदंड का प्रभाव दूरगामी पड़ा जो आज तक है। अधिकतर कवियों ने स्वयं की लोकप्रियता रहित उस तथाकथित श्रेष्ठता की कसौटी पर कसना शुरू किया। इसका परिणाम यह हुआ कि वे अपनी छोटी-सी दुनिया में महान और श्रेष्ठ तो हो गए, लेकिन उन्होंने पाठकों को खो दिया। आज स्थिति यह है कि एक कवि ही दूसरे कवि की कविताओं को पढ़ता है। कविता की यह दुर्गति लोकप्रियता को खारिज करने के कारण ही हुई।
कविता के लिए लोकप्रियता को हेय मानने का दूसरा दुष्परिणाम यह हुआ कि कविता मंच से कट गई। मंच से कटना हिंदी कविता के लिए आत्मघाती साबित हुआ। कविता एक विशाल समूह तक पहुंचने से स्वत: वंचित हो गई। कवि सम्मेलनों के द्वारा जनता की साहित्यिक रुचि का परिष्कार होता था और उसका एक तरह से साहित्यिक प्रशिक्षण भी होता था। इससे एक साहित्यिक वातावरण का निर्माण होता था। नए लोगों में कविता के साथ-साथ अन्य साहित्य के प्रति रुचि भी पैदा होती थी। लेकिन, मुख्यधारा की कविता का मंच से कह जाने के कारण धीरे-धीरे उस पर धीरे-धीरे गैर-साहित्यिक रुचि के कवियों की रुचि परिष्कृत होती थी और साहित्य के प्रति प्यास जगती थी, वहां कविता अब सतही मनोरंजन की वस्तु बन गई, जो कई अवसरों पर अश्लील, सांप्रदायिक और स्त्री विरोधी भी होती है।

लोकप्रियता को देश निकाला देने का तीसरा दुष्परिणाम यह हुआ कि कविता की दुनिया एकदम अराजक हो गई। कविता के नाम पर कुछ भी लिखा जाने लगा। ऊपर-नीचे गद्य में पंक्तियां लिख कर उसे कविता घोषित किया जाने लगा। चाहें उसमें न कोई भाव हो न विचार हो। चूंकि पाठक कोई कसौटी न रहे, इसलिए कवि बनना सबसे आसान काम हो गया। यह अकारण नहीं है कि अधिकतर अधिकारी किस्म के लोग या साधन संपन्न लोग प्राय: कवि ही होते हैं। अगर आपके पास किसी भी कारण थोड़ी-सी सामाजिक प्रतिष्ठा है तो आप कवि आसानी से बन सकते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा की बदौलत साहित्यिक प्रतिष्ठा या मान्यता हासिल करने का सबसे आसान रास्ता कविता का है। आप कुछ भी लिख कर कविता के रूप में छपवा सकते हैं। पत्रिकाएं उसे बिना हिचक संबंधों को ध्यान में रख कर छाप भी देती हैं।

एक बड़ा प्रश्न है कि कविता की लोकप्रियता है क्या? दरअसल, जटिल से जटिल भावों और अनुभूतियों को सरलता और सहजता के साथ अभिव्यक्त करना ही कविता की लोकप्रियता है। भावों की जटिलता और अभिव्यक्ति की सरलता के मेल से कविता की लोकप्रियता पैदा होती है। अच्छी कविता वह है जो गहरी अनुभूतियों को सरलता से अभिव्यक्त कर दे। जटिल भावों को जटिल तरीके से अभिव्यक्त किया जाएगा तो कविता श्रेष्ठ भले हो जाए, पर लोकप्रिय नहीं हो सकती। इसी तरह सतही भावों को सतही या छिछले तरीके से अभिव्यक्त किया जाएगा, तो कविता लोकप्रिय हो जाएगी, पर श्रेष्ठ नहीं होगी। आज के मंचीय कवियों के साथ दिक्कत यही है कि अभिव्यक्ति विधान सरल होने के साथ-साथ उनके भाव भी बहुत सस्ते और निम्न कोटि के होते हैं।
लोकप्रिय कविता लिखना आसान है। श्रेष्ठ कविता लिखना भी बहुत मुश्किल नहीं है। मुश्किल है तो ऐसी कविता लिखना, जो श्रेष्ठ भी हो और लोकप्रिय भी। श्रेष्ठ-लोकप्रिय कविता लिखना कवि-प्रतिभा की सबसे बड़ी कसौटी है।

अगर कविता को अपने वर्तमान पाठकविहीन स्थिति से निकलना है तो उसे अपनी उस काव्य परंपरा की ओर लौटना ही होगा, जहां श्रेष्ठता और लोकप्रियता में बैर कभी नहीं रहा। वही रचना महान है, जो एक साथ बौद्धिक और लोकप्रिय दोनों हो। मैथिलीशरण गुप्त अब तक के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि हैं और प्रेमचंद सर्वाधिक लोकप्रिय गद्य लेखक। इनकी सबसे बड़ी खूबी यही है कि इनकी रचनाएं एक साथ बौद्धिक और लोकप्रिय दोनों विमर्शों में हस्तक्षेप करती हैं। आज के समय में सक्रिय शायद ही कोई रचनाकार हो, जिसकी एक ही रचना को स्कूल के विद्यार्थी भी पढ़ सकें और कॉलेज के विद्यार्थी भी पढ़ें। आम पाठक भी पढ़ सकें और साहित्य के गंभीर अध्येता भी। इसलिए आज पूरा साहित्य ही कुछ लोगों तक सिमट कर रह गया है। लेकिन इसमें कविता का संकट सर्वाधिक गहरा है।

 

 

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