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विमर्श: हिंदी आलोचना और गांधी

हिंदी आलोचना में गांधी प्रभाव से किनाराकशी की शुरुआत आचार्य रामचंद्र शुक्ल से ही हो गई थी, जिन्हें हिंदी आलोचना का सुदृढ़ स्थापत्य खड़ा करने का श्रेय है। अपने ‘इतिहास’ में साहित्य-सृजन के संदर्भ में सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों और आंदोलनों के प्रभाव को स्वीकार करने के बावजूद आचार्य शुक्ल समकालीन गांधी के प्रभाव को अनदेखा कर गए।

हिंदी आलोचना में गांधी प्रभाव से किनाराकशी की शुरुआत आचार्य रामचंद्र शुक्ल से ही हो गई थी, जिन्हें हिंदी आलोचना का सुदृढ़ स्थापत्य खड़ा करने का श्रेय है।

बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में भारत के राजनीतिक-सामाजिक जीवन को गांधी के विचारों और कार्यों ने इतना अधिक प्रभावित किया कि न केवल हिंदी, बल्कि अन्य भारतीय भाशाओं में भी उससे प्रेरित जितना सृजनात्मक साहित्य हुआ, उतना मार्क्सवाद से प्रभावित साहित्य सृजन नहीं हुआ। पर विडंबना यह रही कि समाज और राजनीति-सापेक्ष साहित्य सिद्धांत पर बल देने वाली हिंदी आलोचना में जितनी चर्चा मार्क्सवाद के प्रभाव को लेकर हुई, उसकी तुलना में गांधी प्रभाव की चर्चा इतनी कम हुई कि वह आलोचना की मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ी रही।

दरअसल, हिंदी आलोचना में गांधी प्रभाव से किनाराकशी की शुरुआत आचार्य रामचंद्र शुक्ल से ही हो गई थी, जिन्हें हिंदी आलोचना का सुदृढ़ स्थापत्य खड़ा करने का श्रेय है। अपने ‘इतिहास’ में साहित्य-सृजन के संदर्भ में सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों और आंदोलनों के प्रभाव को स्वीकार करने के बावजूद आचार्य शुक्ल समकालीन गांधी के प्रभाव को अनदेखा कर गए। ‘कामायनी’ में शुक्ल जी को ‘वर्गहीन समाज की साम्यवादी पुकार की भी दबी-सी गूंज दो-तीन जगह’ सुनाई दे जाती है और ‘विज्ञान द्वारा सुख साधनों की वृद्धि के साथ-साथ विलासिता और लोभ की असीम वृद्धि तथा यंत्रों के परिचालन से जनता के बीच फैली घोर अशक्तता, दरिद्रता’ आदि के चित्र भी दिखाई दे जाते हैं, लेकिन उन्हें वह गांधी याद नहीं आते जो 1909 में ही अपनी ‘पुस्तक हिंद स्वराज’ में कह चुके थे कि अगर मशीनों की हवा ज्यादा चली तो भारत की दुर्दशा होगी। दरअसल, शुक्ल जी लोकमान्य तिलक के उग्र राष्ट्रवाद से अधिक प्रभावित थे, इसलिए उन्हें गांधी का सत्य-अहिंसा वाला आग्रह भी पसंद नहीं था। फलस्वरूप गांधी से प्रभावित रचनाओं के प्रति उनमें विरक्ति का भाव बना रहा। पर गांधी के सत्याग्रह-सिद्धांत और उसकी क्रियान्वति की भूमिका को लक्षित किया उनके ही सुयोग्य शिष्य नंददुलारे वाजपेयी ने जब वे इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक ‘भारत’ के संपादक रूप में (1930-32) लगातार गांधी की सत्याग्रह-वैचारिकी के पक्ष में लिखते रहे।
गांधी की अहिंसा नीति के प्रति वाजपेयी की गहरी आस्था का प्रमाण ‘भारत’ के 23 फरवरी 1931 अंक में छपा उनका यह कथन है- ‘महात्मा जी जिस अहिंसा का प्रचार करते हैं वह बड़ा ऊंचा आदर्श है। सत्य और अहिंसा के मार्ग में महात्मा जी इतने आगे बढ़ गए हैं कि उनके देशवासी पीछे छूटते जाते हैं। महात्मा जी की साधना बड़ी सच्ची है। वे इस युग के श्रेष्ठ योगी और महापुरुष हैं। पर उनकी महत्ता योगी होने के कारण नहीं है। कम से कम इतिहास में तो एक योगी होने की हैसियत से उतना स्मरण नहीं किए जाएंगे, जितना एक लोकनेता होने की हैसियत से किए जाएंगे। महात्मा जी ने लोकवाद पर बहुत जोर दिया है। उनका चरखा, कला, संबंधी विचार उनके भाषण इस बात के प्रमाण हैं कि वे व्यक्तिगत साधना को लोकहित के बराबर महत्त्व नहीं देते।’

गौरतलब है कि काव्य में लोक मंगल के प्रबल पैरोकार शुक्ल जी भी थे, पर दुर्भाग्य कि वे गांधी में ‘लोकवाद’ को नहीं देख सके और 1936 के बाद प्रगतिशील लेखक संघ की कोख से पैदा हुए प्रगतिवादियों को भी सोवियत संघ के ‘समाजवादी यथार्थवाद’ में तो जनवाद नजर आ रहा था, लेकिन उन्हें गांधी में व्याप्त यह ‘लोकवाद’ नजर नहीं आ सका। लेकिन नंददुलारे वाजपेयी की अंतर्दृष्टि ने गांधी के ‘लोकवाद’ को पहचाना और वे अपने परवर्ती आलोचनात्मक लेखन में गांधीवादी जीवन-दृष्टि को और परवान चढ़ाते गए। ऐसा नहीं कि नंददुलारे वाजपेयी को प्रगतिवाद से वितृष्णा थी। ‘आलोचक के स्वदेश’ में विजय बहादुर सिंह ने बताया है कि 1950 में बनारस में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के वाजपेयी जी संस्थापक अध्यक्ष थे। लेकिन प्रगतिवादी धारा जिस तरह मार्क्सवाद के भौतिकवादी आग्रहों से अनुशासनबद्ध होकर कदमताल करने लगी, वह वाजपेयी की दृष्टि में साहित्य सृजन और समीक्षा कार्य के व्यापक क्षेत्र के लिए उपयुक्त नहीं थी। जीवन के आर्थिक पक्ष पर अधिक बल देने के कारण मार्क्सवाद प्रेरित प्रगतिवाद के बरक्स उन्हें गांधी की जीवन-दृष्टि ज्यादा व्यापक होने के कारण अधिक ग्राह्य लगी। ‘नए साहित्य का विकास’ नामक निबंध में वे बहुत मजबूती से अपनी इस मान्यता को रखते हैं- ‘मेरे विचार से केवल आर्थिक स्वतंत्रता की लड़ाई जनवादी लड़ाई नहीं है। हमें जन-जीवन के सभी पहलुओं पर समान ध्यान देना होगा। हम जिस जनवादी राष्ट्र या मानव-समूह की कल्पना करते हैं, वह केवल आर्थिक दृष्टि से सुखी नहीं होगा, उसे पूर्णत: सांस्कृतिक और नैतिक मानव भी होना चाहिए। यहां भी मार्क्सवादी शिक्षाएं और उपचार मुझे तो अधूरे दिखाई देते हैं। उनसे गांधीजी का सर्वोदय सिद्धांत मुझे भारतीय जीवन के अधिक अनुरूप जान पड़ता है। अगर तुलसी, सूर और मीरा का आत्मोन्मुखी काव्य, उपनिषदों का दिव्य ज्ञान, शंकर, कबीर और विवेकानंद का महान दर्शन और उदात्त आदर्श हमारे तथाकथित जनवादी संघर्ष का अंग नहीं बन सकते, तो ऐसे जनवादी संघर्ष की सार्थकता ही मेरे लिए संदिग्ध है।’

उसी लेख में वे हिंदी साहित्य के विशेष संदर्भ में लिखते हैं- ‘गांधीजी द्वारा प्रवर्तित राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन की पहली ही हलचल में सियारामशरण जी के भावुकतापूर्ण आख्यान गीत और श्री रामनरेश त्रिपाठी की ‘सुमन’, पथिक और मिलन जैसी रचनाएं प्रकाशित हुई। ठाकुर गोपालशरण सिंह की रचनाओं में नया प्रभाव देखा गया और श्री गया प्रसाद ‘स्नेही’ तो अत्यंत सीधी और प्रभावपूर्ण राजनीतिक कविता करने लगे। राष्ट्रीय आंदोलन की इस पहली बहार में ही हिंदी साहित्य को इन नए कवियों और लेखकों का उपहार मिला।’ इसी क्रम में वाजपेयी जी गांधीवादी जीवन-मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में नवीन प्रणीत रूप, मुक्त-छंद, निराला, पंत की काव्यकृतियों, प्रसाद की ‘कामायनी’ दिनकर के कुरुक्षेत्र आदि पर विचार करते हुए हिंदी में जिस आगामी महाकाव्य की अपेक्षा करते हैं, वह ‘महात्मा गांधी के भारतीय रंगमंच पर किए गए महान सांस्कृतिक प्रवर्तन का ही काव्य प्रतिरूप होगा।’ नंददुलारे वाजपेयी अपने परवर्ती आलोचनात्मक लेखन में भी छायावाद समेत अन्य साहित्यिक प्रवृत्तियों का विवेचन करते रहे। मार्क्सवाद या प्रगतिवाद की अर्थ-संकुल, भौतिकता केंद्रित जीवन-दृष्टि की तुलना में गांधी की सर्वसमावेशी जीवन-दृष्टि उनके आलोचना कर्म के केंद्र में रही।

दरअसल, वाजपेयी जी ने ही हिंदी आलोचना में गांधीवादी मूल्यों की वह आधारशिला रखी, जिससे प्रेरित होकर रामविलास शर्मा छायावाद के साम्राज्यवाद और सामंतवाद विरोधी चरित्र की पहचान कर सके और नामवर सिंह यह स्वीकार कर सके कि ‘राजनीतिक ढंग से जो कार्य गांधीवाद ने किया, साहित्यिक ढंग से वही कार्य छायावाद ने किया। इसी से प्रेरित होकर गैर-मार्क्सवादी विजयदेव नारायण साही भी ‘लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर बहस’ निबंध में सत्याग्रह युग के मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में छायावाद का भाष्य कर सके। इतना होने के बाद भी वाजपेयी जी का प्रयास गांधीवाद को हिंदी आलोचना की मुख्यधारा में स्थान नहीं दिला सका। शुक्लोत्तर हिंदी आलोचना में वर्चस्व स्थापित करने वाली प्रगतिवादी धारा गांधी प्रभाव को साहित्य से बहिष्कृत करने में जोर लगाती रही, प्रेमचंद को गांधी विमुख सिद्ध करने में अपनी ऊर्जा खपाती रही, तो उसके बरक्स उभरी परिमलवादी, प्रयोगवादी आलोचना उदासीनता बरतती रही। हालांकि गांधी से परहेज करने के पीछे शुक्ल जी की ‘लोकमंगल’ के निमित्त सक्रिय प्रतिरोध को पसंद करने वाली अभिरुचि की भूमिका थी, जबकि प्रगतिवादी या अन्य वादियों पर पश्चिमी वादों, राजनीतिक विचारधाराओं का दबाव रहा। नतीजा यह हुआ कि देश-समाज के यथार्थ की बात करने वाली हिंदी आलोचना मार्क्सवाद से लेकर अस्तित्ववाद, संरचनावाद, विखंडनवाद जैसे विदेशी विमर्शों के जंजाल में उलझती हुई गांधी के देसज भावबोध से दूर होती जा रही है। हालांकि कुछेक नए-पुराने लेखक गांधी प्रभाव की चर्चा आलोचना में करते रहे हैं और अब तो एकाध पुराने मार्क्सवादी आलोचक गांधी पर भी भाषण देने लगे हैं, लेकिन अब भी गांधी-प्रभाव को हिंदी आलोचना की मुख्यधारा का अंग बनाने के लिए बहुत लंबी दूरी तय करना है।

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