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विमर्श: व्यंग्य की अस्मिता और स्थापना

सीधी बात कहने से भाषा में शक्ति नहीं आती, लेकिन जब भाषा के तेवर पैने व आक्रामक हों तो वे व्यंग्य बन जाते हैं। बस व्यंग्य की यही मौलिक पहचान मानी जा सकती है कि वह मानव को चुभता है और उसे भले-बुरे का भेद समझ में आने लगता है।

चित्र: वाजिदा खान

व्यंग्य को एक स्वतंत्र मान्यता और विधा रूप में उसकी स्थापना को लेकर तो अब कोई दो राय नहीं रह गई हैं। हिंदी के तमाम आलोचक इस विधा को लेकर जब-तब टिप्पणी करते रहे हैं व विधा रूप में मान्यता का दबा स्तर कहीं दब गया है और व्यंग्य विधा आज अपने समूचे सौष्ठम के साथ साहित्य में लोकप्रिय भी बनती जा रही है। व्यंग्य एक ऐसी दुधारी है, जिससे दोनों ओर से वार होता है और यह वार समाज सुधार के साथ-साथ एक जीवन दृष्टि की तलाश को भी पूरा करता है। अब व्यंग्य भाषाई लालित्य प्रसंगानुसार समायोजित होने का कोई ‘किलर’ नहीं है अपितु वह समग्रता से रचनाकारों के लिए योजनाबद्ध ढंग से काम करने की शालीन विधा है। व्यंग्य में जो नए-नए प्रयोग नौवें दशक से शुरू हुए हैं, वे अत्यंत आशाजनक और उत्साही हैं।

आजादी के बाद के दशकों में व्यंग्य लेखकों की न्यूनता ही इसकी समृद्धि में बाधा का सबसे बड़ा कारण रही इसके पीछे भी दो ही कारण मुख्य रूप से रहे एक तो इसकी मान्यता का अभाव और दूसरे व्यंग्य की पकड़ के प्रति दृष्टिहीनता। उस समय तक व्यंग्य कहानी में ही कहीं-कहीं प्रयोग रूप में लिया जाता था या रचना लालित्य के लिए बतौर भाषा में इसका इस्तेमाल हो पाता था। लेकिन आठवें दशक के आते-आते संभावनाशील रचनाकार पूरी तैयारी के साथ इसमें उतरे और उन्होंने नौवें दशक तक तो इसे परिपूर्ण बना दिया।सैकड़ों की संख्या में नए लेखक रचनाकार व्यंग्य कर्म को अपनाने लगे व साथ ही समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में इस विधा के कॉलम नियत किए जाने लगे। हालांकि यह अभियान बहुत ही सतही और सामयिक प्रसंगों तक सीमित रहा, लेकिन विधा के लिए बहुत लाभदायी भी रहा। इसके लेखकों ने जहां इसे स्वतंत्र रूप से अपनाया, वहीं वे इसमें गंभीर प्रयोगों की तरफ भी सचेष्ट रहे। इससे अच्छी व्यंग्य रचनाएं पाठकों के सामने आर्इं।

चूंकि व्यंग्य में विसंगतियों पर प्रखरता से भार होता है, इसलिए जहां इसकी चुटकियों से इसे रोचकता मिली, वहीं पठनीयता ने इसे लोकप्रिय भी बनाया। आलोचकों का यह तर्क स्वीकार्य नहीं कहा जा सकता कि सातवें दशक तक तो यह विधा सारवान और गंभीरता ग्रहण कर सकी, लेकिन धीरे-धीरे इसका अवमूल्यन होता चला गया और आज वह बहुत ही घटिया स्तर तक जा पहुंची है। युग परिवर्तन के साथ हमारे बदलते सांस्कृतिक मूल्यों ने नई विसंगतियों को जन्म दिया और पारंपरिक विषय व्यंग्यकारों की नजर से हटते चले गए। आठवें दशक तक जो रचनाकार इस विधा में लगे थे, उन्होंने भी नई दृष्टि से नए विषयों और विसंगतियों को देखा व अपनी रचनाओं में सूक्ष्मता से उभारा। इसके लेखक वर्ग प्रदेश की सीमाओं में बंधे नहीं रह सके और वे राष्ट्रीय स्तर पर ‘व्यंग्यकार’ के रूप में अपनी पहचान बनाने लगे। उसी का परिणाम हास्य-व्यंग्य के कवि सम्मेलन थे, जो जनता की ओर से बेहद पसंद किए गए। यही नहीं गद्य रचनाएं भी मंच पर पढ़ी जाने लगीं और सराही गर्इं। इससे यह तो पता चला कि व्यंग्य की मांग जनमानस में है। अत: नवीन प्रयोगों के जरिए इसे प्रस्तुत किया जाना चाहिए। आज कितनी साहित्य की दूसरी विधाएं हैं जो इतनी व्यापकता से राजनीति की बखिया उधेड़ सकी हैं? इसलिए व्यंग्य की पहचान का एक रास्ता प्रशस्त हुआ। नौवें दशक के व्यंग्यकारों के सामने नए सवाल और नई चुनौतियां थीं। मीडिया का लोकप्रिय होना व फिल्म दूरदर्शन और वीसीआर आदि के विस्तार से व्यंग्य पुस्तकाकार में कहीं मिटने न लगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और रचनाकार पूरे दम-खम से डटे रहे व सैकड़ों किताबें इस बीच व्यंग्य की आ सकीं। रहन-सहन, खान-पान, पहनावा, मध्यवर्गीय समाज का दिखावटीपन, ये इतने खुलकर बदले रूप में सामने आए कि व्यंग्यकारों ने जमकर अपनी कलम चलाई व व्यंग्य को समृद्ध किया। नई पीढ़ी ने नए प्रयोगों के जरिए दिया तथा व्यंग्य को जीवंत और ताजा बनाए रखा।

व्यंग्य की आलोचना का जो एक बिंदु दिखाई देता है, वह यह है कि दैनिक समाचार-पत्रों में जो व्यंग्य के नाम पर कॉलम छपते हैं उसमें जैसा भी एक व्यक्ति लिख देगा, वह छपेगा। इससे व्यंग्य की धार का पैनापन कमजोर हुआ और जनता में व्यंग्य की छवि सही रूप में नहीं बन पाई। अनेक समाचार-पत्रों ने इस तरह कठिनाइयों से पार पाने के लिए किसी स्तंभ को एक व्यक्ति से न लिखवाकर सबके लिए खोला। इससे व्यंग्य में प्रयोग सामने आए व विविध विषयों का नाना प्रकार से रसास्वादन भी हुआ। लिखने के प्रति नए लेखकों में चाव जगा और वे व्यंग्य के क्षेत्र में काम करने की सोचने लगे। लेकिन यह प्रयोग व्यापक रूप से न होने से आज भी समाचार-पत्रों को भी बीमार बनाए हुए हैं। व्यंग्य की अस्मिता और स्थापना का वृक्ष छायादार व घनेरा बन रहा है और वह दिन दूर नहीं है, जब यह और अधिक व्यापक संदर्भों और सरोकारों के साथ साहित्य से परिचय करेगा। सवाल व्यंग्यकारों की पकड़, उनकी दृष्टि और उसके प्रकाशन का है, अगर यह हुआ तो फिर उसे कोई खतरा नजर नहीं आता और यह निरंतर फलता-फूलता रहेगा। नौवें दशक के व्यंग्यकार इसके लिए जो अपना कार्य आगे बढ़ा रहे हैं, उसके सुपरिणाम इस शताब्दी के अंत तक और साफ दिखाई देंगे। व्यंग्य का धरातल ज्यादा ठोस रूप में सामने आ रहा है और वह ज्यादा ही आधार पाएगा, इसमें भी शक नहीं है।

व्यंग्य का फलक और स्वरूप
सीधी बात कहने से भाषा में शक्ति नहीं आती, लेकिन जब भाषा के तेवर पैने व आक्रामक हों तो वे व्यंग्य बन जाते हैं। बस व्यंग्य की यही मौलिक पहचान मानी जा सकती है कि वह मानव को चुभता है और उसे भले-बुरे का भेद समझ में आने लगता है। संस्कृति के बदलाव से राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों में जो परिवर्तन आया, इससे व्यंग्य विधा के माध्यम से जो काव्य कहा जाता है, वह सीने में तीर की तरह चुभ जाता है। इस तरह व्यंग्य सुधार का औजार बन जाता है। अगर सामाजिक सुधारों के लिए व्यंग्य इसी तरह का आधार तैयार करता है तो उसकी सफलता फिर संदिग्ध नहीं रहती। उपदेश आजकल माने नहीं जाते, इसलिए प्रतीक या माध्यम बनाकर कही गई बात का असर ज्यादा व्यापक होता है। आज स्वतंत्र विधा के रूप में व्यंग्य स्थापित है। लेखकों में व्यंग्य के प्रति लिखने की रुचि बढ़ी है तो पाठकों में भी निरंतर चाव बढ़ा है। व्यंग्य की पुस्तकें आ रही हैं। उसमें पैनापन बढ़ रहा है और दुगानुकूल विसंगतियां उसका विषय बनकर सोसायटी को दिशाबोध कराने का भी काम कर रही हैं। एक समय जरूर था, जब लेखक व्यंग्य से रूबरू कम थे और यह विधा उपेक्षा व उदासीनता की शिकार थी। लेकिन आज हालत सर्वथा अलग है। अब व्यंग्य को गंभीरता से लिया जा रहा है और इसमें फूहड़ता लाने वाले अलग हो रहे हैं। राजनीतिक और सामाजिक व्यंग्य रचनाओं के लेखन से जहां रास्ते बने हैं, उन विरोधाभासों को भी स्पष्टता मिली है। यह जरूर है कि अगर व्यंग्य रचनाओं को शिष्ट हास्य मिल जाए तो वह संजीदगी के साथ-साथ रोचकता भी पा लेती हैं और जीवंतता में वृद्धि भी हो जाती है। व्यंग्य का साहित्यिक स्वरूप बाद में आंका जाना चाहिए, पहले उसके कथ्य का वजन तोला जाना होगा। भाषा, बिंब या मिथकीय संरचनाएं उसकी बुनावट को पुष्ट तो करेंगी, लेकिन उद्देश्य का होना परम आवश्यकता है। सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक चेतना का कार्य सृजनशील विधाओं में मुख्य रूप से होता है। इसलिए सशक्त व्यंग्य रचना की पहचान समसामयिक सजगता और हालातों के सामर्थ्य पर निर्भर करती है। अपने परिवेश से कटकर वायावी साहित्य रचना का जीवित यथार्थ ही व्यंग्य की सार्थकता भी है। इसलिए व्यंग्य लेखक का सामाजिक सरोकारों से जुड़ा होना जरूरी होता है। व्यंग्य में आक्रामकता जरूरी तो है, लेकिन वह उबाऊ या एकरसता से बंधी नहीं होनी चाहिए। आज जो व्यंग्य लेखन हो रहा है वह नए कलेवर का है और उसमें मानसिक तोल का अर्थ बदले रूप में सामने आया है। व्यंग्यकार की दृष्टि पर निर्भर करता है कि वह व्यंग्य के फलक को कितना विस्तार दे सकता है। इसी विस्तार को व्यंग्य में गंभीरता से अपनाने के भी प्रयोग हो रहे हैं। श्रीलाल शुक्ल की रचनाएं इसका अद्भुत उदाहरण हैं। अब यह नव प्रयोग आधुनिक व्यंग्य लेखकों तक ही सीमित नहीं रहा है अपितु दूसरी विधाओं के रचनाकारों द्वारा भी व्यंग्यपरकता के साथ अपने लेखन में उतारा जा रहा है। इसलिए व्यंग्य की अस्मिता या पहचान का संकट अब नहीं रहा है। व्यंग्य का जो नुकसान हुआ है, वह हमारी गुटवादिता या उसे क्षेत्र विशेष या व्यक्ति विशेष की आंख से देखा जाना। व्यंग्य को देखने के लिए उदारवादी होना पड़ेगा और अपने समकालीनों में हमें और भी दूसरे लोग जोड़ने होंगे।

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