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कहानी: वसूली

वह सेवानिवृत हुआ था, तो अनेक एजेंट मधुमक्खियों की तरह उसके इर्द-गिर्द मंडराने लगे थे। वे इंवेस्टमेंट के नए-नए झांसे सुझा रहे थे। उसने उम्र भर सरकारी कंपनियों में ही पैसा लगाया था, पर अब निजी कंपनियों वाले भी ललचा रहे थे।

Author January 13, 2019 1:40 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

सुशील कुमार फुल्ल

बुढ़िया माई के झाटे की तरह संबंधों के तार उलझ गए थे। कभी-कभी छोटी-छोटी बातें मन की गांठें बन जाती हैं। ऐसा ही कुछ उन दोनों में प्रकट-अप्रकट में शीतयुद्ध की तरह चल रहा था। उधर से आवाज आई- ‘मैं पुनीत बोल रहा हूं।’ ‘कौन पुनीत?’ ‘वही पुनीत, विध्वंस का संपादक।’ स्वर में रुखापन उभर आया। ‘हां, तो?’ ‘आपसे बात करने की इच्छा हुई।’ मुझसे? विश्वास नहीं होता। आप तो कभी फोन करते ही नहीं, और अगर कोई दूसरा करे तो आप उठाते तक नहीं।’ मतिराम ने उलाहना देते हुए कहा। ‘नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। लेखकों के प्रति मेरे मन में अपार श्रद्धा है। और फिर आप तो मेरे पापा के दोस्त रहे हैं। लेखकों और संपादकों की एक ही बिरादरी तो है।’ ‘कहिए इस नाचीज को कैसे याद किया?’ वह मन ही मन कुनमुना रहा था। यह फोन उसे अवांछित लग रहा था। ‘आप जानते ही हैं कि मेरी धर्मपत्नी के भाई साहब ने रेत बजरी का धंधा शुरू किया है। वैसे तो उसने एमटेक की डिग्री हासिल की है, पर वह छोटी-मोटी नौकरी में नहीं फंसना चाहता, क्योंकि अगर एक बार नौकरी का चस्का पड़ गया तो वह कुछ बड़ा करने की सोच भी नहीं पाएगा। पिछले दो साल से हमने उसे खुली छूट दे रखी है कि वह खुद अपना बिजनेस संभाले। खुद कमाए और खुद बचाए। हां, उसे कभी कोई पुलिस वाले से या किसी इंस्पेक्टर से वास्ता पड़ जाए, तो मैं ‘विध्वंस’ का हवाला देकर उस की सहायता कर देता हूं। इतना तो मेरे यहां होने का बनता ही है।’ पुनीत पृष्ठभूमि बना रहा था और मतिराम बोर हो रहा था। दरअसल, उसे पुनीत में कोई रुचि नहीं थी। उसे वह सदा स्वार्थी किस्म का आदमी लगता था।

‘यह तो अच्छी बात है, लेकिन इसमें मैं क्या कर सकता हूं?’ ‘उसके कुछ पैसे फंस गए हैं।’ ‘किसके पास?’ ‘उसने आपको भी कन्सट्रक्शन मटीरियल सप्लाई किया था।’ ‘मैं तो साथ-साथ पेमेंट करता रहा हूं, लेकिन वह कोई बिल ही नहीं देता। हर बार जीएसटी का बहाना बना देता है। उसे ईमानदारी से व्यवसाय करना सिखाओ नहीं तो वह व्यर्थ के पचड़ों में ही फंसा रहेगा।’ ‘वह तो कह रहा है आपने उसकी पेमेंट रोक दी है।’ ‘उससे यह भी तो पूछो कि पेमेंट क्यों रोकी है। उसे क्या जरूरत थी कि वह टिप्पर को खुद चला कर मेरे आंगन में ले आए। उसके पास बड़ी गाड़ी का ड्राइविंग लाईसेंस ही नहीं। उसने मेरे घर की बीस फुट लंबी दीवार गिरा दी। सीधा बीस हजार का नुकसान। और उसने समझौता कर तो लिया है।’ ‘तो आप पेमेंट नहीं करेंगे?’ वह अपने रंग में आ गया था। मतिराम ने कभी विश्वास नहीं किया था, लोग जो उसके बारे में कहते थे। जबसे वह एक स्थानीय पत्र का संपादक बना है, उसमें औरंगजेब घुस गया है। वह किसी को कुछ मानता ही नहीं। मानो वह बाहुबलियों की तरह जेल में बैठ कर भी रंगदारी उगाहने में सक्षम हो। मतिराम सोचने लगा, अखबार की बड़ी ताकत होती है, पर अखबार तो अन्याय के विरुद्ध जनता की आवाज बनता है। रेत-बजरी का ट्रक पुलिस पकड़ ले, और साहब का फोन चला जाए, तो पुलिस छोड़ देती है। उसे याद आया, उसका एक मित्र कहा करता था कि कभी भी किसी वकील, पत्रकार या पुलिस वाले से दोस्ती न करो, ये किसी के नहीं होते। उसे लगा कि अगर लेखकों की संपादकों से ही जान-पहचान नहीं होगी, तो संवाद कैसे बनेगा। उसके कानों में पुनीत की ध्वनि गूंज रही थी- अखबार का धर्म है जनता की समस्याओं को उजागर और मैं इसे एक्सक्लूसिव स्टोरी के रूप में करवाऊंगा। फोन कट गया था। मतिराम को लगा कि कई नुकीली कीलें एक साथ उसको बींधनें लगी थीं।

समय की उलझनें भी कितनी विलक्षण हो सकती हैं, यह उसे नहीं पता था। वह विश्वविद्यालय की नौकरी में था, पेंशन का हकदार था और पेंशन भी खूब थी। जितना अंतिम वेतन मिला था, उससे भी कहीं ज्यादा पेंशन मिलने लगी। वह प्राय: सोचता कि 2003 के बाद वालों ने कौन से पाप किए थे, जो उन्हें पेंशन नहीं मिलती। अजीब विरोधाभास है कि आम आदमी के लिए पेंशन बंद और विधायकों-सांसदों के लिए भारी पेंशन का प्रावधान। क्या यही रामराज्य होता है। और नौकरियां भी कहां सहजता से मिल रही हैं। वह अपने बच्चों के बारे में चिंतित हो उठता। अचानक एक फोन ने उसे विचलित कर दिया। फोन किसी अजनबी का था। वह डांट-डपट के लहजे में कहने लगा- आपने दूसरी किश्त जमा नहीं करवाई। बस एक किश्त देकर भूल गए।
‘फिर?’
‘फिर क्या। तुरंत पंद्रह हजार रुपए जमा कराओ।’
‘आप हैं कौन?’ मतिराम ने घबराई आवाज में पूछा।
‘मैं रिकवरी एजेंट हूं कंपनी का।’
‘मैंने तो कोई लोन लिया ही नहीं। फिर रिकवरी किस बात की?’
‘आपने कंपनी से बीमा जो करवाया है। उसकी तो नियमित किश्त भरनी ही पड़ेगी।’
‘पता चला है कि कंपनी की अधिकतर स्कीमें फ्राड हैं, इसलिए मैं अपना बीमा रोक रहा हूं।’
‘क्या बकवास कर रहे हो? कंपनी सन 1947 से चल रही है। बीमे के अलावा भी और बहुत कुछ करती है। हजारों करोड़ का कारोबार है। तुरंत किश्त जमा कराओ। कंपनी को फ्राड कहने का हर्जाना भी तुम्हें भुगतना पड़ेगा।’
‘मैं किश्त जमा नहीं कराऊंगा।’
‘तो जो पंद्रह हजार रुपए जमा कराए हैं उसके पंद्रह साल बाद पंद्रह पैसे भी नहीं मिलेंगे।’ रिकवरी एजेंट धधक रहा था। ‘तब तो फ्रॉड ही हुई न तुम्हारी कंपनी? जब इन्वेस्टमेंट करवानी होती है, तो बार-बार तलवे चाटते हैं और बाद में… यह भी तो हफ्ता वसूली जैसा ही है।’ कह कर मतिराम ने फोन काट दिया।

वह सेवानिवृत हुआ था, तो अनेक एजेंट मधुमक्खियों की तरह उसके इर्द-गिर्द मंडराने लगे थे। वे इंवेस्टमेंट के नए-नए झांसे सुझा रहे थे। उसने उम्र भर सरकारी कंपनियों में ही पैसा लगाया था, पर अब निजी कंपनियों वाले भी ललचा रहे थे। बार-बार आकर एक एजेंट ने मतिराम को तंग कर दिया। थक-हार कर उसने बीमे के लिए हां कर दी थी। हालांकि साठ के बाद बीमे की ज्यादा गुंजाइश नहीं थी, पर वह निजी कंपनी के भ्रमजाल में फंस गया था और अब उससे पिंड छुड़ाना भी समस्या बन गया था। उसे लगा कि उसके इर्द-गिर्द रिकवरी एजेंट ही एजेंट घूम रहे हैं, जो उसे फुसला रहे हैं और साथ ही धमका भी रहे हैं।

वे कितने प्रसन्न थे। वर्षों बाद कोई स्कूल का सहपाठी मिल जाए, तो आनंदित होना स्वाभाविक है। छोटी उम्र के बड़े-बड़े सपने। वह तो बस किसी यूनिवर्सिटी में लेक्चरर लगना चाहता था। क्या रुतबा था प्रोफेसर एसी जोशी का या फिर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का। पर उसका दोस्त डंके की चोट पर कहता कि वह तो सिविल सर्विसेज में जाएगा। मतिराम ने कहा भी था कि आइएएस बनना तो बड़ा मुश्किल काम है। पर वह कहता, अगर मैं सिविल सर्विस में न जा सका तो पत्रकार बनूंगा। अब दोनों वर्षों बाद मिले, तो दानों ने एक-दूसरे का हालचाल पूछा। मतिराम ने पूछा- ‘हेतराम, क्या करते हो? यहां कैसे?’
‘मैं रिकवरी एजेंट हूं।’ हेतराम ने तपाक से कहा।
‘क्या कहा? रिकवरी एजेंट? मैंने तो सुना था, तुम एक बड़े अखबार के वरिष्ठ संवाददाता हो।
‘हां था। मैं आइएएस तो बन नहीं सका, पत्रकार बन गया। पत्रकार भी आइएएस से कम नहीं होते। मैंने बहुत प्रयत्न किया और अंतत: एक अंग्रेजी अखबार में घुस गया। बाप रे बाप इतना काम।’
‘काम होता है, तभी तो नाम होता है।’
‘हां, वह तो ठीक है, पर आजकल सब कुछ बदल गया है।’
‘कैसे?’
‘मोडम, वाट्सऐप, ई-मेल आदि के आने से खबरों का यहां से वहां पहुंचना बहुत आसान हो गया है। और कहीं भी बैठे आप अपना काम लैपटॉप या मोबाइल से कर सकते हैं।’
‘तो यह तो अच्छी बात है।’
‘हां, अच्छी भी है और बुरी भी। अच्छी इसलिए कि काम कम हो गया। हाथ से लिखना नहीं पड़ता और कंपोजिंग भी हाथ से नहीं करनी पड़ती पहले की तरह। पर बुराई यह हुई कि नौकरियां गधे की सींग हो गर्इं।’
‘मैं तो टीचिंग में चला गया था और मेरी पसंद भी वही थी।’
‘तुम दूरदर्शी निकले। मैं तो महत्त्वाकांक्षी था। पत्रकारिता में खूब सम्मान मिला। मंत्री-संतरी सब वाकिफ हो जाते हैं। छोटे-मोटे काम कराने आसान हो जाते हैं, लेकिन मैं एक गलती कर गया।’
‘क्या?’

‘नेशनल स्तर के पत्र की नियमित नौकरी छोड़ कर एक स्थानीय पत्र में संपादक लग गया। घर का लालच था, लेकिन मेरे इसी निर्णय ने मेरा कबाड़ा कर दिया। मैंने सोचा नौकरी नियमित होगी, जैसी बड़े समाचार पत्रों में होती है, पर जब नौकरी छोड़ कर आ गया तो पता चला, इन्हें तो एक रिकवरी एजेंट की जरूरत थी। इन्होंने कोई लिखित नियुक्ति पत्र नहीं दिया था। सो, फंस गया बुरी तरह से।’
‘हेतराम, तुम्हारी आदत नहीं गई बात का बतंगड़ बनाने की। साफ-साफ कहो।’ मतिराम ने कहा।
‘तो सुनो। अखबार के मालिक ने मुझे अपने कक्ष में बुला कर कहा- ‘आपको वेतन आपकी क्षमता के अनुसार मिलेगा। जितना गुड़ डालोगे उतना ही मीठा होगा। जानते हो अखबार आजकल मात्र विज्ञापन पर पलते हैं। आप जो भी विज्ञापन लाओगे उसका बीस प्रतिशत आपको मिल जाएगा। सुना है, आपने बड़े पत्र में काम किया है, सो आपकी सांठ-गांठ भी बड़ी होगी। आप ज्यादा काम करेंगे, ज्यादा वेतन मिलेगा। कमीशन बनाना आपके सामर्थ्य पर निर्भर करता है। उसी के अनुुसार आप का वेतन होगा।… मैं चौंक गया था। बोला, सर मैं पत्रकार हूं, मुझे रिकवरी एजेंट तो न बनाओ। विज्ञापन तो भीख मांगने वाली बात है।
अखबार के मालिक ने कहा- हेतराम। तुम्हारी बात में दम है, पर आज अर्थतंत्र ही ऐसा हो गया है कि ईमानदारी से पत्र चला पाना मुश्किल है। वैसे देखें तो क्या सारी व्यवस्था ही रिकवरी एजेंट नहीं हो गई है। राजनेता भी वोटों के लिए एक नरह से रिकवरी एजेंट ही तो हैं। तरह-तरह के झांसे, जुमले, वायदे, नारे लगा कर के वोटरों को लुभाते हैं। पैसा तो सरकारी ही होता है। कभी मुफ्त गैस सिलेंडर, कभी मुफ्त मोबाईल, कभी मुफ्त साईकल बांटते-लुभाते नेता। जनता के पैसे को कैसे पानी की तरह बहाते हैं। बड़ी बड़ी रैलियां, रथ यात्राएं, पता नहीं क्या क्या। यह सब बंद होना चाहिए। सो, अपने मन पर बोझ न रखो। खुले मन से तल्लीनता के साथ विज्ञापन जुटाने में लग जाओ। भगवान भली करेंगे और फिर यह आदत बन जाएगी और तुम्हें आनंद आने लगेगा।’ हेतराम ने कहा।
मतिराम ने कहा- ‘हेतराम, यह तो विचित्र गोरखधंधा है। फिर क्या विश्वसनीयता का संकट पैदा नहीं होगा।’ ‘विज्ञापन खींचने, छीनने का धंधा कोई अच्छा तो है नहीं।’ हेतराम ने वीभत्स मुद्रा बनाते हुए कहा। वे बड़ी देर तक वहां बैठे रहे थे। उठने लगे तो पुनीत के अखबार का एक संवाददाता मतिराम के सामने खड़ा था, उगाही के लिए आया हुआ एक और रिकवरी एजेंट। पुनीत रााक्षसी आकार लेने लगा था।

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