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कहानी: भुगतान

फोन की घंटी बजी। गांव से खबर मिली कि आज सुबह हवेली में भगतराम मर गया। आंखें जैसे चलचित्र हो गर्इं। रील चलने लगी अतीत की- अपने आप। पिछले पचास बरसों से भगतराम हमारे गांव की हवेली में था। वह बार-बार कहता था- लालाजी! आपकी तीन पीढ़ियों का नमक खाया है।

Author Published on: May 13, 2018 3:43 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

कमलेश भारतीय

फोन की घंटी बजी। गांव से खबर मिली कि आज सुबह हवेली में भगतराम मर गया। आंखें जैसे चलचित्र हो गर्इं। रील चलने लगी अतीत की- अपने आप।  पिछले पचास बरसों से भगतराम हमारे गांव की हवेली में था। वह बार-बार कहता था- लालाजी! आपकी तीन पीढ़ियों का नमक खाया है। दादा लाया था, अब पोता निभा जाए तो ठीक, वरना गुजर तो जाएगी यह जिंदगी।
पचास बरस यानी आधी सदी गुजर गई हमारे परिवार की भगतराम की निगाहों में। हमसे ज्यादा हमारे परिवार को जानता था भगतराम। सच कहूं तो हमारे परिवार के कच्चे चिट्ठे उसी के पास थे। कभी रौ में आकर वह कहता भी था- लालाजी, इतनी जानकारी आपके परिवार के बारे में हरिद्वार में बड़ी-बड़ी बहियां रखने वाले पंडे भी न दे सकेंगे, जितनी जानकारी मैं रखता हूं।
निरा अनपढ़! कोई डायरी, कोई संस्मरण नहीं लिखे। बस निगाहों में समाए था। पचास बरस का लंबा इतिहास। ‘ज्योतिषी ने बता रखा है मुझे। मेरी मौत बाग-बगीचे में होगी।’ जब पिता के निधन के बाद छोटी उम्र में गांव जाना शुरू किया, तब भगतराम अक्सर यह बात कहता था।  हमारी हवेली में बगीची छोड़ एक भी फूल नहीं था, फूल का पौधा तक नहीं था। दूसरी ओर भगतराम पूरी तरह तंदुरुस्त। भैंसों को चारा-पानी देने तक किसी का भरोसा नहीं करता था। अपने हाथों सारे काम करके उसे तसल्ली मिलती। कभी बीमार पड़ जाता या कहीं शादी-ब्याह में दूर-दराज जाना पड़ जाता तो आते ही भैंसों से इस तरह
बतियाता जैसे उसके बिना वे मरी जा रही हों- ‘हां फिर भूखी मर गई न मेरे बगैर, कौन पूछता तुम्हें? मैं जाना नहीं चाहता था। मुझे पहले ही पता था कि मेरी गैरहाजिरी में तुम्हें कोई भरपेट पानी भी न पिलाएगा। बस, बस अब ज्यादा घों-घों मत करो अब आ गया हूं न, सब ठीक हो जाएगा।’

‘सब ठीक हो जाएगा’ एक तरह से भगतराम का तकिया कलाम था। पिता के बाद दोनों बुआ जमीन पर निगाहें जमा बैठीं। दादा कोर्ट-कचहरी के जानकार थे। वक्त रहते वसीयत कर गए थे। इसी वजह से बेटियों के नाम कुछ लिखा नहीं गया था।
भगतराम ही सुनाता रहता था यह रामकहानी। बुआ पड़ोस के घर गई थीं। उन्हें झूठी वसीयत पर दस्तखत करने की मनुहार की थी। वे भगवान से डरने वाले लोग थे। हाथ जोड़ कर इस झंझट में न पड़ने की बात कह कर पीछे हट गए।इस दौरान अनपढ़ भगतराम ने पटवारी से सब कह-सुन कर वसीयत के मुताबिक हम बच्चों के नाम करवाया। बुआ ठगी-सी रह गर्इं। यों एक का घरवाला पुलिस में था दूसरी का स्कूल में। फिर भगतराम अलाप लेता- ‘लालाजी तुम्हारी दोनों बुआ मुझे गालियां देते न थकतीं। मुआ भगतराम बेड़ा गर्क हो इसका।’सच, अगर भगतराम की बातें झूठी होतीं तो बुआ कभी तो घर आतीं। वे फिर कभी मुंह दिखाने नहीं आर्इं। यहां तक कि हम भाई-बहनों के ब्याह-शादियों में भी नहीं आर्इं। गांव रोज जाता था मैं। हर सुख-दुख भगतराम से ही बांटता।‘आ गए लालाजी।’ ड्योढ़ी में पांव रखता, तो भगतराम की आवाज आती। साइकिल दीवार से टिकाता तब तक भगतराम नल के पास आ जाता- पानी के लिए, ताकि मैं मुंह-हाथ धो सकूं। फिर वह मेरी पढ़ाई के बारे में पूछता। मेरे दोस्तों के बारे में बातें कर अंदाजा लगाता कि मैं कैसी सोहबत कर रहा हूं। भाई-बहनों की खबर-सार लेता। इस सबके बीच अपना दुख छिपा जाता। कभी न कहता कि उसके कपड़े घिस गए हैं। आज शाम के लिए चाय-पत्ती नहीं है। सच। अभी हवेली में बाग-बगीचा लगा कहां था। मेरे पिता फुलवारी अधूरी छोड़ गए थे। मैं सबसे छोटा था और छोटा अभी इतना छोटा कि मां की गोद में शरारत कर रहा था। जहां से पिता काम अधूरा छोड़ गए थे, वहां से भगतराम ने बिना किसी के आदेश-निर्देश के काम संभाल लिया था। सच, अभी भगतराम कैसे मर सकता था? अभी तो उसे फुलवारी को हरा-भरा रखने, फूलने-फलने तक ले जाने की जिम्मेदारी सौंप गए थे मेरे पिता।

मिट्टी पुते चूल्हे के पास शाम के समय भगतराम अपनी रोटी खुद पकाता। हमारे यहां काम कर आने से पहले वह रसोइया ही तो था। वह छोटी जात से था, पर जात की पहचान-परख से बाहर उसके हाथ की मकई की रोटी जरूर खाता। वह मकई की रोटी पर मक्खन का पेड़ा रख देता। मिट्टी की कुंडी में पिसा नमक-मिर्च का मसाला सब्जी का काम देता। इसके बावजूद भगतराम को बातों को नमक मिर्च लगाना बिल्कुल नहीं सुहाता था। हमारे पिता को उधार की बड़ी बुरी बीमारी थी। जेब में ढेर सारे नोट होने पर भी खर्च न कर, उधार के खाते में रकम चढ़ा देने की कह कर हर दुकान से आगे बढ़ जाते। अब उनके निधन के बाद बाजार ही नहीं, शहर और गांव में कई लेनदार हवेली का रुख करने लगे थे। मैं हैरान-परेशान। यह क्या बुरी आदत थी मेरे पिता की? एक बड़ा जमींदार, गांव का नंबरदार, खूब शोहरत, नाम पर सबका देनदार… लेनी एक पाई भी किसी से नहीं। ऐसा क्या…
भगतराम ने चूल्हे के पास रोटियां पकाते-पकाते एक कहानी सुना डाली थी। ‘लालाजी! एक बड़े घराने का मुखिया मर गया। रस्मो-रिवाज से उसे दफनाया गया। बड़ा बेटा कब्र के पास उदास बैठा था। कुछ लोग आए। कब्र के पास खड़े होकर दहाड़ें
मार-मार कर रोने लगे। कुछ रंग-बिरंगे कागजों में लिपटी टोकरियां उनके नौकरों ने कब्र के पास रख दीं। वे आंसू बहाते कहने लगे- ‘बड़े मियां। हमें आपकी ये चीजें लौटानी थीं। अब आप नहीं रहे। किसे लौटाएं ये कीमती चीजें?’ कब्र के पास उदास बैठे बेटे की आंखें चमकीं। उसने कह दिया कि मैं इनका बेटा हूं। मुझे दे दीजिए सब कुछ। बस, लालाजी तभी उन लोगों ने कहा कि हमें इतनी-इतनी रकम तुम्हारे अब्बा से लेनी भी थी, उसे भी तुम ही चुकाओगे न छोटे मियां? सो, लालाजी मुंह मत खुलवाओ। साफ और सुथरी बात कहता हूं, गुस्सा करो चाहे खुशी से सुनो, जिसने नंबरदार की जमीनें संभाली हैं, वही तो उसका कर्ज भी चुकाएगा कि नहीं?’बिना नमक-मिर्च मसाले खरी-खरी बात उस छोटी उम्र में भी मेरी समझ में आ गई थी- एकदम! सबका कर्ज उतारा था एक-एक करके और यह सबक भी लिया था उधार प्रेम की कैंची है। आज तक किसी भी खाते में मेरे नाम उधार की रकम नहीं चढ़ी है, तो इसके पीछे बचपन का यह सबक ही छिपा है। हालांकि इस सबक में भगतराम का योगदान किसी तरह भी कम नहीं। जब किताबों का, फीस का, वर्दी का किसी भी तरह बोझ मेरे कंधों पर आ जाता, छोटे भाई-बहनों के
चेहरे मुर्झाए सारा दुख-दर्द बयान कर देते। भगतराम ही किसी के पास बही-खाते में अंगूठा छाप कर रकम ला देता, पर मेरा कवच बन जाता। फिर फसल आने पर रकम चुकता कर देता।

यों गांव में मेरे पिता के दान-पुण्य करने के किस्से भी दूर-दूर तक मशहूर थे। असल में उनका कर्ज तले दबे रहने का यह एक कारण रहा। ऐसा भगतराम का कहना है। यह बात भी तब खुली, जब सर्दियों की एक शाम मैं भगतराम के पास बैठा आग ताप रहा था कि गांव का एक मजदूर आकर मेरे पांव छूकर अपनी बेटी की शादी का न्योता देने के साथ-साथ मदद की गुहार करने लगा। मैं उस बड़ी उम्र वाले आदमी को अपने पांव पर झुकते देख एकाएक पीछे हट गया था- संकोचवश! भगतराम ने उसे मदद का भरोसा देकर भेज दिया था।‘हम इसकी मदद कहां से करेंगे?’ मैंने भगतराम से पूछा था। ‘लालाजी! गरीबों की बेटियां ऐसी मदद से ही ब्याही जाती हैं। आपके पिता गरीबों को गेहूं की बोरियां देते थे। भंडार में इतना अनाज तो होता ही है और कुछ तिल-फूल जो भेंट कर सकें, कर देंगे।’ ‘पर भगतराम, यह सब कैसे होगा? कैसे निभेगा?’‘लालाजी सच कहूं, अपने लिए तो दुनिया में सब जीते हैं, पर जो दूसरों के लिए जीते हैं, कितने लोग हैं?’ जीवन में दूसरों के दुख में झट से पिघल जाने और सामर्थ्य-भर मदद करने का पहला पाठ इस तरह अनजाने से ही भगतराम ने मुझे सिखा दिया था और यह रहस्य भी खोल दिया था कि पिता पर हर दुकान का कर्ज क्यों चढ़ा हुआ था। फिर तो समाज-सेवा की ऐसी चटक-लगन लगी कि स्कूल में सहपाठियों के साथ मिलकर एक लाइब्रेरी और एक छोटा-सा दवाखाना खुलवाया। पता नहीं, भगतराम ने कहां से ऐसे संस्कार लिए थे या बड़े घर के माहौल में वह इस तरह ढल गया था कि दूसरों की फिक्र करने में ही फख्र महसूस करता था। ‘किसका फोन था?’ पत्नी गुसलखाने से नहा कर आई, तो उसने पूछा। मैं अतीत की फिल्म रोक वर्तमान में लौट आया।
‘गांव से था!’
‘खैरियत तो है?’
‘नहीं। भगतराम…’ आगे मुझसे कहा नहीं गया।
‘वहां जाएंगे?’
‘नहीं गया तो अपने आप को कभी माफ नहीं कर सकूंगा।’
‘मैं भी चलूंगी।’
‘ठीक है। फिर तैयार हो जाओ।’

गांव की बस में बैठे तो अतीत की फिल्म फिर वहीं से शुरू हो गई, जहां रुक गई थी। ऐसा नहीं कि भगतराम में कमजोरियां नहीं थीं। वह भी हाड़-मांस का पुतला था और इसी धरती का वासी। हर शाम उसे शराब की तलब सताती। एक नौकर होकर मालिक
से उसने यह सब ऐब लगा लिया था। जब तक मैं छोटा था, तब तक वह इसे छिपाने में सफल रहा पर जब कुछ समझने लायक होने लगा, तब उसने इसे छिपाने की जरूरत ही नहीं समझी बल्कि मुझे भावुक बनाने के लिए कुछ ऐसी बात बनाता कि मुस्करा कर रह जाता मैं। ‘छोटे लालाजी। कल बड़े लालाजी मुझे सपने में दिखे थे। पता क्या कह रहे थे?… मैंने हाथ जोड़ कर कहा- लालाजी। मुझे शराब मत पिलाओ। मैं गरीब आदमी हूं। मेरे पास इतनी हिम्मत कहां कि रोज शराब पी सकूं। पर वे सपने में जोर देते ही रहे कि पी ले एक-दो पैग, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। हां मैं वादा करता हूं कि मेरी औलाद तुम्हारा पूरा-पूरा ख्याल रखेगी।’ ‘आगे क्या कहा?’ मैं हंस कर कहता। ‘छोटे लालाजी, उनसे मैंने विनती की, अरज की कि लालाजी। रोटी-पानी की फिक्र तो नहीं रहती, खूब भरपेट खाता हूं। पर इस तरह शराब का इंतजाम कौन करेगा। कहने लगे- तू फिक्र मत कर। चढ़ा जा।मेरी औलाद तुझे भूखे न मरने देगी, शराब के लिए भी नहीं तरसाएगी।’मैं मुस्कराता जाता। ‘लालाजी, हंस क्यों रहे हैं?’‘भगतराम! तू वैसे ही कह देता कि आज शाम कुछ पीने की तलब लगी है तो मैं मंगवा देता। इसके लिए ऐसा किस्सा गढ़ने की जरूरत कैसे आन पड़ी।’ ‘अब लालाजी, आप ठहरे बड़े किस्साकार, मैं तो एक अनपढ़-गंवार, कहां आपकी बराबरी कर सकता हूं। हां बात जैसी सपने में ठहरी, वैसी सुनाने से चूक गया होऊं तो माफ कर दीजिए और सपने में किए वादे कौन निभाता है?’ वह खचरी-सी हंसी हंसता इतना कह कर हुक्का गुडगुड़ाने लगता, मानो कह रहा हो कि इसी से काम चला लूंगा।मुझे मजबूर होकर उसकी इच्छा के आगे सिर झुकाना ही पड़ता। मैं अपने हलवाहे को आवाज लगाता कि इसकी शाम का प्रबंध कर देना भाई। भगतराम की दूसरी बड़ी कमजोरी कह लें या चाहत यह थी कि उसके एक बेटे-बहू को उसके बाद हवेली में वैसे ही रहने दिया जाए जैसे कि वह खुद रहा है। इस चाहत को उसने कभी छिपाया नहीं था। वह साफ-साफ कहता था। छोटे लालाजी। इस घर का नमक पचास वर्ष तक खाया है तो पचासों बार नमक का हक भी अदा किया है। अगर मैं सरकारी नौकर भी होता तो ज्यादा से ज्यादा पच्चीस-तीस बरस की नौकरी करके पेंशन तो पा ही जाता। अब पचास बरस पुराने इस नौकर की इतनी-सी अरज तो मान लीजिए।

‘क्या अरज है तुम्हारी?’ मैं हर बार पूछता। जैसे भूल जाने का बहाना कर रहा होऊं।‘मेरी तो एक ही पुरानी रट है। मेरे एक बेटे-बहू को हवेली में रहने को जगह मिल जाए।’ ‘भगतराम, तुम समझते क्यों नहीं? अब हवेली में इतनी ताकत कहां बची है कि किसी परिवार को पाल-पोस सके। जमीन बंटती और बिकती चली गई। अब तो बुजुर्गों की निशानी बची है। उससे इतनी आमदनी कहां होती है कि किसी को हवेली में बसाया जाए। न गाय-भैंस रख रहे हैं, न अनाज का भंडार कर रहे हैं और न ही शान-शौकत दिखाने के लिए किसी को रख सकते हैं। हां तुम भी हमारे बुजुर्गों की एक निशानी से कम नहीं हो। तुम्हारे साथ वचन निभा देंगे, पर आगे के लिए तो माफ कर दो।’‘तो ठीक है, लाला साहब। एक और काम कर दीजिए।’ वह हाथ जोड़ कर बैठ गया। उसके आंखों से पानी बहने लगा। ‘कहो?’मेरे बेटे के लिए सिर्फ दो मरले जगह दे दीजिए, इसी हवेली के किसी किनारे कमरा डाल कर रह लेंगे मेरे बेटा-बहू। ‘भगतराम! क्या कह रहे हो तुम होश में तो हो?’ मैं गुस्से से कांपने लगा। ‘क्यों होश की क्या बात है? आज तो मैंने एक घूंट भी नहीं पी है।’‘भगतराम! यह हवेली है, लाला इसमें बेशक कभी रहे नहीं और शायद अब कभी रहेंगे भी नहीं, पर उनका नाम जुड़ा है। हवेली का कोई टुकड़ा काट कर कैसे दिया जा सकता है?’‘मैं सब समझ गया छोटे लालाजी।’‘क्या समझ गए तुम?’ ‘अपने इन हाथों से पाला है तुम्हें। इन आंखों के सामने बड़े होते देखा है। इस दिल में हर खुशी में तुम्हारे लिए दुआएं निकलती रही हैं, पर इन पचास बरसों में इस घर का नौकर ही रहा, छोटी जात वाला एक छोटा-सा आदमी ही रहा।’मैं चुपचाप वहां से चल दिया था। इससे आगे हर बार हमारी बातचीत टूट जाती थी।

गांव में हवेली के आगे उदासी और सन्नाटा पसरा हुआ था। मैं और पत्नी पहुंचे तो आस-पड़ोस के घरों से कुछ लोग निकल आए।
‘बहुत याद करता था लालाजी आपको।’‘बस, एक बार मिल लेने की इच्छा उसके मन में ही रह गई।’ ‘उसका बेटा जिद करके अपने गांव ले गया है शव को, अंतिम संस्कार के लिए। कह रहा था कि इस गांव में हमारा क्या रखा है?’हम लोग भी उस गांव पहुंचे। फिर भागते-भागते श्मशान घाट। चिता को अग्नि दे रहे बेटे ने मेरी ओर देखा। ‘आ गए छोटे लालाजी’- फिर भगतराम की आवाज कानों में  गूंजी। अब हवेली में जाने कौन पुकारा करेगा? आंखों से झर-झर आंसू बह निकले। सभी भाई भी पहले से मौजूद थे। बेशक वे भगतराम के इतना निकट नहीं रहे, पर ऐसा कभी नहीं नहीं लगा कि वह हमारे परिवार का सदस्य नहीं था। दूर-दराज से आए  रिश्तेदार भी यही पूछते रहे हैं- अभी भगतराम है क्या? उसे बड़ा भुगतान करना है या किसी जन्म का कर्ज देना है उसे। चलते-चलते हम भाई इकट्ठा हुए। ‘भाई साहब! अब भगतराम तो रहा नहीं। आपका वचन निभा गया। अब क्या सोचा है आपने?’ ‘बस एकदम से इस हवेली को बेच दो।’‘क्यों?’ ‘समझते क्यों नहीं! कल भगतराम का कोई बेटा जिद कर बैठा कि उसे रहना है, तो गांव वालों का मुंह बंद नहीं कर सकोगे तुम लोग। इसलिए मामले को जड़ से ही मिटा दो।’ ‘ठीक है।’मैं खुद अपने पर हैरान था। यह कैसा फैसला सुनाया था मैंने और भगतराम की नेकदिली, ईमानदारी और पचास बरस की लंबी सेवाओं का कैसा भुगतान किया था मैंने?

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